दिल्ली नाम बदलने मांग
दिल्ली नाम बदलने मांग केरलम नाम बदलाव के बाद अब दिल्ली को ‘इंद्रप्रस्थ’ करने की मांग, भाजपा सांसद प्रवीन खंडेलवाल ने अमित शाह और CM को पत्र लिखा। ऐतिहासिक दलीलें और सांस्कृतिक पहचान पर जोर।

भारत में सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान को पुनर्स्थापित करने का सिलसिला तेज हो गया है। 24 फरवरी 2026 को केंद्र सरकार ने केरल राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव मंजूर कर लिया। मलयालम भाषा में राज्य को ‘केरलम’ ही कहा जाता है और यह मांग लंबे समय से चली आ रही थी। इस फैसले के ठीक एक दिन बाद, 25 फरवरी 2026 को दिल्ली के चांदनी चौक से भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने केंद्र सरकार के सामने एक ऐतिहासिक मांग रख दी। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का नाम बदलकर ‘इंद्रप्रस्थ’ करने का आग्रह किया। साथ ही दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता को भी पत्र भेजा और विधानसभा में प्रस्ताव पास करने की सिफारिश की।
यह मांग सिर्फ नाम बदलने की नहीं, बल्कि भारत की प्राचीन सभ्यता से जुड़ाव को मजबूत करने की है। सांसद खंडेलवाल का तर्क है कि ‘इंद्रप्रस्थ’ नाम महाभारत काल से जुड़ा है, जबकि ‘दिल्ली’ नाम अपेक्षाकृत बाद का मध्यकालीन नाम है। क्या यह मांग पूरी होगी? क्या दलीलें मजबूत हैं? और आगे की प्रक्रिया क्या है? आइए विस्तार से समझते हैं।
दिल्ली नाम बदलने मांग: केरल से ‘केरलम’ तक
केरल विधानसभा ने 2023 और 2024 में दो बार सर्वसम्मति से नाम बदलने का प्रस्ताव पास किया था। मलयालम में राज्य को हमेशा ‘केरलम’ कहा जाता रहा है। केंद्र की मंजूरी के बाद अब औपचारिक रूप से ‘केरल (नाम परिवर्तन) विधेयक, 2026’ संसद में आएगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “राज्य की जनता की इच्छा और सांस्कृतिक जुड़ाव” का प्रतीक बताया। इस फैसले ने पूरे देश में चर्चा छेड़ दी। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तुरंत सवाल उठाया कि उनका ‘बंगला’ या ‘बंग’ नाम बदलने का प्रस्ताव क्यों लंबित है। ठीक इसी माहौल में दिल्ली की मांग सामने आई।
प्रवीण खंडेलवाल की मांग और उनकी दलीलें
भाजपा सांसद प्रवीण खंडेलवाल, जो चांदनी चौक क्षेत्र से सांसद हैं और कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं, ने अपने पत्र में स्पष्ट लिखा:
“भारत विश्व की सबसे प्राचीन जीवित सभ्यताओं में से एक है। उसकी राष्ट्रीय राजधानी का नाम उसके गहरे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक मूल्यों को प्रतिबिंबित करना चाहिए। इंद्रप्रस्थ राजधानी की मूल सभ्यतागत पहचान का प्रतीक है, जबकि दिल्ली इतिहास के एक बाद के चरण को दर्शाता है।”
उनकी मुख्य दलीलें इस प्रकार हैं:
महाभारत से जुड़ाव:
- महाभारत के अनुसार पांडवों ने यमुना के किनारे इंद्रप्रस्थ नामक भव्य नगर बसाया था।
- युधिष्ठिर की राजधानी यहीं थी।
- पुराना किला आज भी उसी प्राचीन स्थल पर माना जाता है।
पुरातात्विक प्रमाण:
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की खुदाई में पुराना किला क्षेत्र से पेंटेड ग्रे वेयर (PGW) संस्कृति के अवशेष मिले हैं, जो लगभग 1000 ईसा पूर्व के हैं – यानी महाभारत काल से मेल खाते हैं।
नाम की ऐतिहासिक परतें:
‘दिल्ली’ नाम 12वीं-13वीं शताब्दी में प्रचलित हुआ। इसे ढिल्लिका, देहली या दिल्लू से जोड़ा जाता है। यह तुर्क-मुगल-ब्रिटिश काल की देन है। जबकि इंद्रप्रस्थ हजारों साल पुरानी सभ्यता की जड़ है।
राष्ट्रीय गौरव और सांस्कृतिक निरंतरता:
नाम बदलने से आधुनिक भारत अपनी प्राचीन विरासत से जुड़ेगा। दुनिया के सामने भारत की सभ्यतागत गौरव गाथा और मजबूत होगी।
अन्य सुझाव:
- सांसद ने पुराना किला में पांचों पांडवों की प्रतिमाएं लगाने का प्रस्ताव दिया।
- साथ ही दिल्ली विधानसभा को ‘इंद्रप्रस्थ विधानसभा’ नाम देने और वहां प्रस्ताव पास करने को कहा।
- उन्होंने अमित शाह से इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और हितधारकों से परामर्श कर प्रक्रिया शुरू करने का आग्रह किया।
खंडेलवाल ने याद दिलाया कि मुंबई (बॉम्बे), कोलकाता (कलकत्ता), चेन्नई (मद्रास), प्रयागराज (इलाहाबाद), गुरुग्राम (गुड़गांव) जैसे कई नाम पहले बदल चुके हैं। इंद्रप्रस्थ नाम पहले से दिल्ली के कई संस्थानों, रोड और कॉलोनियों में इस्तेमाल होता है, इसलिए समाज में स्वीकार्यता पहले से है।
क्या यह मांग नई है?
- नहीं। इंद्रप्रस्थ नाम की मांग दशकों पुरानी है।
- 2014 के बाद मोदी सरकार में सांस्कृतिक पुनरुत्थान के कई कदम उठे हैं –
- राजपथ को कर्तव्य पथ, ऑगस्ट क्रांति मैदान, आदि।
- दिल्ली का नाम बदलने की बात पहले भी उठी थी,
- लेकिन केरलम फैसले ने इसे नई गति दी।
नाम बदलने की प्रक्रिया क्या है?
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCT) है, जिसमें विधानसभा है लेकिन पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं। नाम बदलने के लिए:
- दिल्ली विधानसभा में प्रस्ताव पास होना चाहिए।
- केंद्र गृह मंत्रालय प्रस्ताव को मंजूरी दे।
- संसद में ‘दिल्ली (नाम परिवर्तन) विधेयक’ लाना पड़ेगा।
- राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद गजट नोटिफिकेशन।
यह प्रक्रिया केरल जैसी ही है। चूंकि दिल्ली केंद्र शासित है, केंद्र की भूमिका निर्णायक होगी।
विपक्ष और अन्य प्रतिक्रियाएं
- अभी तक बड़े विपक्षी दलों की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है।
- लेकिन कुछ लोग व्यावहारिक सवाल उठा रहे हैं – करोड़ों दस्तावेज, पासपोर्ट,
- मानचित्र, साइनबोर्ड, अंतरराष्ट्रीय समझौते, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन
- आदि में बदलाव का खर्च कितना आएगा? क्या यह जरूरी है?
- कुछ इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ भी बता रहे हैं, हालांकि केरलम मांग लेफ्ट-कांग्रेस वाली सरकार ने ही की थी।
दूसरी ओर, भाजपा समर्थक इसे ‘सभ्यता का गौरव’ बता रहे हैं।
क्या बदलेगा नाम? भविष्य क्या कहता है
अभी यह सिर्फ एक मांग है। अमित शाह या केंद्र सरकार ने कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की। लेकिन मोदी सरकार के पिछले 11 सालों में 20 से ज्यादा जगहों के नाम बदले गए हैं। अगर दिल्ली विधानसभा (जिसमें भाजपा की सरकार है) प्रस्ताव पास कर देती है और केंद्र सहमत होता है, तो 2026-27 में यह संभव है।
इंद्रप्रस्थ नाम बदलने से दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं रहेगा, बल्कि महाभारत की उस भव्य नगरी का प्रतीक बन जाएगा जहां पांडवों ने न्याय और धर्म की स्थापना की थी। पुराना किला, लौह स्तंभ, कुतुब मीनार – सब कुछ एक नई रोशनी में दिखेगा।
निष्कर्ष
- नाम बदलना सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है। यह पहचान का सवाल है।
- केरलम फैसला दिखाता है कि लोकप्रिय मांग और सांस्कृतिक तर्क पर केंद्र गंभीरता से विचार करता है।
- दिल्ली की मांग भी उसी श्रेणी में आती है।
- प्रवीण खंडेलवाल की दलीलें ऐतिहासिक तथ्यों, पुरातत्व और महाकाव्य पर टिकी हैं।
हां, चुनौतियां हैं – प्रशासनिक खर्च, अंतरराष्ट्रीय समन्वय, पुरानी आदतें। लेकिन भारत जैसे सभ्यता-गौरव वाले देश के लिए अपनी राजधानी को उसकी सबसे पुरानी पहचान लौटाना गलत नहीं कहा जा सकता।
अगर यह मांग पूरी होती है तो दिल्ली ‘इंद्रप्रस्थ’ बनकर न सिर्फ भारत की, बल्कि पूरी दुनिया की सबसे प्राचीन राजधानियों में से एक के रूप में चमकेगा। फिलहाल इंतजार है – केंद्र के फैसले का।
भारत अपनी जड़ों की ओर लौट रहा है। केरलम के बाद इंद्रप्रस्थ – क्या यह अगला पड़ाव होगा? समय बताएगा। लेकिन बहस जरूर शुरू हो गई है।
