Mani Shankar Aiyar Statement
Mani Shankar Aiyar Statement कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर ने बड़ा बयान दिया- मैं नेहरूवादी, राजीववादी और गांधीवादी हूं, लेकिन राहुलवादी नहीं। राहुल गांधी पर तंज, पार्टी में बगावत के सुर। खेड़ा-रमेश पर भी निशाना।

कांग्रेस पार्टी, जो कभी एकजुटता और अनुशासन के लिए जानी जाती थी, आजकल आंतरिक कलह और विवादों से जूझ रही है। हाल ही में वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री मणि शंकर अय्यर ने एक ऐसा बयान दिया है, जिसने पार्टी में तहलका मचा दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “मैं गांधीवादी हूं, नेहरूवादी हूं, राजीववादी हूं, लेकिन राहुलवादी नहीं हूं!” यह बयान न केवल राहुल गांधी की नेतृत्व शैली पर सीधा हमला है, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ते असंतोष को उजागर करता है। यह घटना केरल विधानसभा चुनावों से ठीक पहले आई है, जहां कांग्रेस पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रही है। अय्यर के इस बयान ने पार्टी के प्रवक्ताओं और नेताओं को बचाव में ला दिया है, जबकि बीजेपी इसे कांग्रेस की कमजोरी के रूप में पेश कर रही है।
मणि शंकर अय्यर का राजनीतिक सफर – एक विवादास्पद लेकिन अनुभवी चेहरा
- मणि शंकर अय्यर कांग्रेस के उन पुराने रक्षकों में से हैं,
- जिन्होंने पार्टी के साथ लंबा जुड़ाव रखा है।
- वे पूर्व राजनयिक, लेखक और राजीव गांधी के करीबी रहे हैं।
- 1980 के दशक में वे राजीव गांधी के साथ काम करते थे
- और बाद में पंचायती राज मंत्री भी बने।
- अय्यर हमेशा से अपने बेबाक बयानों के लिए जाने जाते हैं।
- चाहे मोदी को “नीच आदमी” कहना हो या पाकिस्तान के साथ बातचीत की वकालत करना, वे कभी पीछे नहीं हटे।
हाल के वर्षों में अय्यर ने कई बार पार्टी लाइन से अलग राय रखी है। केरल में पिनाराई विजयन की लेफ्ट सरकार की तारीफ करने से लेकर एमके स्टालिन को INDIA गठबंधन का चेयरमैन बनाने की सलाह देने तक, उनके बयान अक्सर विवादास्पद रहे हैं। इस बार का बयान पवन खेड़ा और केसी वेणुगोपाल जैसे नेताओं की आलोचना के जवाब में आया, जब उन्होंने अय्यर को पार्टी से निकालने की बात कही। अय्यर ने तीखे अंदाज में कहा कि अगर उन्हें निकाला गया तो वे “पीछे से लात मारेंगे”। यह उनकी नाराजगी और असंतोष की गहराई दिखाता है।
Mani Shankar Aiyar Statement: बयान का पूरा संदर्भ – क्या कहा अय्यर?
- अय्यर का यह बयान मीडिया से बातचीत के दौरान आया,
- जब उनसे पार्टी में उनकी स्थिति और हालिया विवादों पर सवाल किया गया।
- उन्होंने कहा, “राहुल गांधी भूल गए हैं कि मैं पार्टी का सदस्य हूं।
- इसलिए मैं गांधीवादी हूं, नेहरूवादी हूं, राजीववादी हूं, लेकिन राहुलवादी नहीं हूं।”
- यह बयान राहुल गांधी के नेतृत्व को सीधे चुनौती देता है।
- अय्यर ने नेहरू और राजीव गांधी की विचारधारा को पार्टी की मूल पहचान बताया,
- लेकिन राहुल गांधी की शैली से खुद को अलग कर लिया।
यह बयान केरल के संदर्भ में और महत्वपूर्ण है, जहां अय्यर ने लेफ्ट सरकार की सफलताओं की सराहना की थी, जिससे कांग्रेस के यूडीएफ को नुकसान पहुंच सकता है। पार्टी के भीतर कुछ नेता इसे व्यक्तिगत राय मानकर टालना चाहते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का असंतोष पार्टी की एकजुटता पर सवाल उठाता है।
कांग्रेस में हलचल – आंतरिक असंतोष की वजहें
- कांग्रेस में यह पहली बार नहीं है जब नेतृत्व पर सवाल उठे हैं।
- राहुल गांधी के फैसलों, जैसे भारत जोड़ो यात्रा के बाद भी पार्टी की स्थिति में सुधार न होना,
- कई पुराने नेताओं को खटकता है।
- अय्यर जैसे नेता मानते हैं कि पार्टी नेहरू-गांधी परिवार की विचारधारा से दूर हो रही है
- या राहुल गांधी की छवि पार्टी को नुकसान पहुंचा रही है।
पार्टी में गुटबाजी बढ़ रही है। एक तरफ राहुल गांधी के करीबी, दूसरी तरफ पुराने नेता जो सोनिया-राजीव युग की याद करते हैं। अय्यर का बयान इस विभाजन को और गहरा करता है। पार्टी प्रवक्ता पवन खेड़ा को “तोता” और वेणुगोपाल को “गुंडा” कहकर अय्यर ने और तेल डाला है। कांग्रेस को अब इस विवाद को संभालने की चुनौती है, वरना चुनावी मौसम में यह नुकसानदायक साबित हो सकता है।
राजनीतिक प्रभाव – बीजेपी को फायदा, कांग्रेस को नुकसान
- बीजेपी ने इस बयान को हाथों-हाथ लिया है।
- अमित मालवीय जैसे नेता इसे कांग्रेस की “आंतरिक कलह” के सबूत के रूप में पेश कर रहे हैं।
- राहुल गांधी की छवि पहले से ही “अनुभवहीन” बताई जाती है,
- और अय्यर जैसे राजीव के करीबी का बयान इसे मजबूत करता है।
Mani Shankar Aiyar Statement कांग्रेस के लिए यह समय आत्ममंथन का है। अगर पार्टी नेहरू-राजीव की विरासत को मजबूत करना चाहती है, तो राहुल गांधी को अधिक समावेशी नेतृत्व दिखाना होगा। अन्यथा ऐसे बयान पार्टी को और कमजोर करेंगे।
निष्कर्ष
मणि शंकर अय्यर का “मैं नेहरू-राजीववादी हूं, राहुलवादी नहीं” बयान सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि कांग्रेस की मौजूदा संकट की झलक है। पार्टी को पुराने और नए के बीच संतुलन बनाना होगा। अगर नहीं, तो आने वाले चुनावों में यह आंतरिक कलह भारी पड़ सकती है। राजनीति में बेबाकी अच्छी है, लेकिन जब वह पार्टी के खिलाफ जाती है, तो नुकसान तय है। क्या कांग्रेस इस हलचल को संभाल पाएगी? समय बताएगा।
