तारिक रहमान BNP जीत
तारिक रहमान BNP जीत बांग्लादेश में तारिक रहमान की BNP ने भारी जीत हासिल की। भारत-बांग्ला संबंधों में रीसेट? हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर सवाल, सीमा और प्रवासन के मुद्दे गरमाए। क्या ये नया मौका या खतरा?

12 फरवरी 2026 को बांग्लादेश में हुए ऐतिहासिक संसदीय चुनावों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक बड़ा बदलाव ला दिया है। तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने भारी बहुमत के साथ जीत हासिल की है। यह चुनाव 2024 के छात्र-नेतृत्व वाले आंदोलन के बाद पहला बड़ा लोकतांत्रिक प्रयोग था, जिसने शेख हसीना की सरकार को उखाड़ फेंका था। BNP ने लगभग 209-212 सीटें जीतकर दो-तिहाई बहुमत हासिल किया है, जबकि जमात-ए-इस्लामी को करीब 68-70 सीटें मिली हैं। तारिक रहमान, जो 17 साल के निर्वासन के बाद दिसंबर 2025 में वापस लौटे थे, अब बांग्लादेश के नए प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं।
चुनावी पृष्ठभूमि: छात्र क्रांति से नई शुरुआत तक
2024 में छात्रों और युवाओं के बड़े आंदोलन ने अवामी लीग की लंबी सत्ता को समाप्त कर दिया। शेख हसीना देश छोड़कर भाग गईं और मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। अवामी लीग चुनाव लड़ने से वंचित रही। ऐसे में BNP ने खुद को परिवर्तन का चेहरा बताया। तारिक रहमान ने भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन, आर्थिक सुधार और युवाओं को रोजगार देने जैसे वादे किए। चुनाव में उच्च मतदान प्रतिशत और शांतिपूर्ण माहौल ने इस जीत को और मजबूत बनाया।
तारिक रहमान BNP जीत: भारत के लिए खतरा या नया मौका?
- भारत के नजरिए से यह नतीजा मिश्रित भावनाएं पैदा करता है।
- पिछले दो दशकों में शेख हसीना भारत की सबसे करीबी सहयोगी रहीं।
- उन्होंने सीमा सुरक्षा, आतंकवाद विरोध और व्यापार में भारत के साथ मजबूत सहयोग किया।
- BNP का इतिहास थोड़ा अलग रहा है।
- 2001-2006 में BNP की सरकार के दौरान भारत-बांग्लादेश संबंध तनावपूर्ण रहे थे,
- खासकर उग्रवादी समूहों को पनाह देने के आरोपों के कारण।
लेकिन इस बार स्थिति अलग दिख रही है। तारिक रहमान ने चुनाव से पहले संतुलित विदेश नीति की बात की है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी तुरंत बधाई दी, जो संकेत है कि भारत संबंध सुधारने के लिए तैयार है। यदि BNP भारत के साथ आर्थिक सहयोग (जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स, ऊर्जा और व्यापार) को प्राथमिकता देती है, तो यह दोनों देशों के लिए नया मौका साबित हो सकता है। हालांकि, यदि पुराने तत्व हावी हुए या जमात-ए-इस्लामी का प्रभाव बढ़ा, तो सीमा पर तनाव और रोहिंग्या मुद्दे पर असहमति बढ़ सकती है। कुल मिलाकर, यह खतरे से ज्यादा अवसर की स्थिति लगती है, बशर्ते दोनों पक्ष सतर्क रहें।
हिंदुओं पर क्या बीतेगा? – चिंता और वास्तविकता
बांग्लादेश के हिंदू समुदाय (करीब 8-10% आबादी) में इस जीत को लेकर गहरी चिंता है। 2024 के आंदोलन के दौरान और उसके बाद कई मंदिरों पर हमले, संपत्ति लूट और हिंसा की घटनाएं हुईं। जमात-ए-इस्लामी, जो BNP के साथ गठबंधन में थी लेकिन चुनाव में कमजोर रही, को कट्टरपंथी माना जाता है। कई विश्लेषकों का मानना है कि BNP की जीत से अल्पसंख्यकों पर दबाव बढ़ सकता है।
- हालांकि, तारिक रहमान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि
- उनकी सरकार सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करेगी।
- उन्होंने संविधान में संशोधन और समावेशी नीतियों का वादा किया है।
- चुनाव में हिंदू बहुल इलाकों में भी BNP को अच्छा समर्थन मिला,
- जो संकेत देता है कि लोग बदलाव चाहते थे।
- फिर भी, जमात के कुछ प्रभावशाली नेता सरकार में शामिल हो सकते हैं,
- जिससे अल्पसंख्यक सुरक्षा को लेकर सतर्कता बरतनी होगी।
- अंतरराष्ट्रीय समुदाय, खासकर भारत और अमेरिका, इस पर नजर रख रहे हैं।
- यदि BNP संतुलित नीति अपनाती है, तो हिंदू समुदाय को राहत मिल सकती है;
- अन्यथा पुरानी चिंताएं फिर उभर सकती हैं।
आगे की राह: चुनौतियां और उम्मीदें
तारिक रहमान के सामने बड़ी चुनौतियां हैं – आर्थिक संकट, बेरोजगारी, बाढ़-प्रभावित क्षेत्रों का पुनर्वास और राजनीतिक स्थिरता। दो-तिहाई बहुमत से वे संविधान संशोधन कर सकते हैं, जैसे प्रधानमंत्री का दो कार्यकाल सीमित करना। यदि वे युवाओं के सपनों को पूरा करते हैं, तो बांग्लादेश नया दौर देख सकता है।
यह जीत बांग्लादेश के लोकतंत्र के लिए मील का पत्थर है, लेकिन सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि नई सरकार कितनी समावेशी और संतुलित साबित होती है। भारत सहित पड़ोसी देशों को सकारात्मक जुड़ाव बनाए रखना चाहिए। आखिरकार, एक स्थिर और समृद्ध बांग्लादेश ही क्षेत्र के लिए सबसे बड़ा फायदा है।
