Ripon Bora Resignation
Ripon Bora Resignation असम CM हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस से इस्तीफा देने वाले रिपुन बोरा पर तंज कसा- कांग्रेस का आखिरी हिंदू चेहरा भी चला गया। बोरा ने पार्टी में गुटबाजी का आरोप लगाया था, अब TMC में शामिल।

असम की राजनीति हमेशा से ही गतिशील और विवादास्पद रही है। जहां एक तरफ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) मजबूत आधार बना रही है, वहीं कांग्रेस पार्टी लगातार चुनौतियों का सामना कर रही है। हाल ही में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व राज्य अध्यक्ष रिपुन बोरा के इस्तीफे ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने इस घटना पर तीखा तंज कसते हुए कहा, “कांग्रेस का आखिरी हिंदू चेहरा भी गया!” यह बयान न केवल व्यंग्यात्मक है, बल्कि असम कांग्रेस की मौजूदा स्थिति पर गहरी चोट करता है। यह घटना कांग्रेस के लिए एक बड़ा झटका है, खासकर जब पार्टी पहले से ही आंतरिक कलह और नेतृत्व संकट से जूझ रही है।
Ripon Bora Resignation: रिपुन बोरा कौन हैं? – एक लंबा राजनीतिक सफर
रिपुन बोरा असम कांग्रेस के उन चंद नेताओं में से एक थे, जिन्हें हिंदू समुदाय के बीच अपेक्षाकृत स्वीकार्यता प्राप्त थी। वे 1976 से छात्र जीवन से ही कांग्रेस से जुड़े हुए थे। विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने पार्टी के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे पूर्व राज्य मंत्री, राज्यसभा सांसद और असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (एपीसीसी) के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। बोरा की राजनीतिक छवि एक अनुभवी और जमीनी नेता की रही है, जो असम की स्थानीय समस्याओं से अच्छी तरह वाकिफ थे।
हालांकि, 2022 में उन्होंने कांग्रेस से इस्तीफा देकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जॉइन कर लिया था। उस समय उन्होंने पार्टी में आंतरिक कलह और कुछ नेताओं की बीजेपी से कथित साठगांठ का आरोप लगाया था। लेकिन टीएमसी में भी उन्हें अपेक्षित समर्थन नहीं मिला। असम के लोगों ने टीएमसी को बंगाल की क्षेत्रीय पार्टी मानकर इसे स्वीकार नहीं किया। नतीजतन, हाल ही में बोरा ने टीएमसी से भी इस्तीफा दे दिया। अब खबरें हैं कि वे दोबारा कांग्रेस में वापसी या किसी अन्य विकल्प की तलाश में हैं, लेकिन उनका हालिया इस्तीफा (या संभावित कांग्रेस से अलगाव) ने हिमंत सरमा को मौका दिया व्यंग्य करने का।
हिमंत बिस्वा सरमा का तंज – राजनीतिक मायने
- हिमंत बिस्वा सरमा, जो खुद एक समय कांग्रेस के प्रमुख नेता थे,
- लेकिन बाद में बीजेपी में शामिल हो गए,
- असम में कांग्रेस के खिलाफ सबसे आक्रामक चेहरा बने हुए हैं।
- उनका यह बयान “कांग्रेस का आखिरी हिंदू चेहरा भी गया”
- असम की सांप्रदायिक राजनीति को रेखांकित करता है।
- सरमा का इशारा इस ओर है कि कांग्रेस अब असम में हिंदू वोटरों के बीच अपनी पकड़ खो चुकी है।
- कई विश्लेषकों का मानना है कि रिपुन बोरा जैसे नेता,
- जो हिंदू समुदाय से आते हैं और पार्टी में प्रमुख भूमिका निभाते थे,
- उनके जाने से कांग्रेस की स्थिति और कमजोर हो गई है।
यह तंज इसलिए भी प्रभावी है क्योंकि हिमंत सरमा खुद कांग्रेस छोड़कर आए हैं और उन्होंने बीजेपी के लिए असम में हिंदुत्व आधारित राजनीति को मजबूत किया है। उनका यह बयान कांग्रेस को “अल्पसंख्यक-केंद्रित” या “हिंदू-विरोधी” के रूप में चित्रित करने की कोशिश है, जो बीजेपी की चुनावी रणनीति का हिस्सा है। असम जैसे राज्य में, जहां हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण एक बड़ा मुद्दा है, ऐसे बयान राजनीतिक लाभ उठाने का माध्यम बन जाते हैं।
कांग्रेस की असम में चुनौतियां – आंतरिक कलह और नेतृत्व संकट
- असम कांग्रेस लंबे समय से आंतरिक गुटबाजी से जूझ रही है।
- भूपेन बोरा जैसे नेताओं के इस्तीफे,
- गौरव गोगोई पर विवाद और अन्य मुद्दों ने पार्टी को कमजोर किया है।
- रिपुन बोरा का मामला इसकी मिसाल है – पहले कांग्रेस छोड़ी, टीएमसी गई, अब वहां भी असफल।
- पार्टी में हिंदू चेहरों की कमी और मुस्लिम-केंद्रित छवि ने हिंदू वोट बैंक को बीजेपी की ओर धकेल दिया है।
- हिमंत सरमा की सरकार ने विकास,
- चाय बागानों के श्रमिकों के मुद्दे और अवैध घुसपैठ जैसे स्थानीय एजेंडे पर काम किया है,
- जिससे बीजेपी मजबूत हुई है। कांग्रेस को अब नए चेहरों और रणनीति की जरूरत है,
- वरना असम में उसका भविष्य और धूमिल हो सकता है।
निष्कर्ष
Ripon Bora Resignation पर हिमंत बिस्वा सरमा का तंज असम की राजनीति की कड़वी सच्चाई दर्शाता है। यह सिर्फ एक नेता का जाना नहीं, बल्कि एक विचारधारा और वोट बैंक की लड़ाई है। कांग्रेस को आत्ममंथन की जरूरत है, जबकि बीजेपी ऐसे मौकों का फायदा उठाकर अपनी स्थिति मजबूत कर रही है। आने वाले समय में असम विधानसभा चुनाव इसकी असली परीक्षा होंगे। राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता – सिर्फ स्थायी हित होते हैं। और फिलहाल, हिमंत सरमा के तंज से लगता है कि कांग्रेस का “हिंदू चेहरा” वाकई खत्म होने की कगार पर है।
