ग्रीनलैंड खरीद अमेरिका बोली
ग्रीनलैंड खरीद अमेरिका बोली ट्रंप का ग्रीनलैंड खरीदने का पागलपन! हर नागरिक को 1 लाख डॉलर ऑफर, पूरी आबादी पर US बोली। आर्कटिक स्ट्रैटेजी में डेनमार्क नो सिड। ग्लोबल टेंशन बढ़ा, रूस-चाइना अलर्ट। इस क्रेजी प्लान की फुल स्टोरी और रिएक्शन जानें!

दुनिया की सबसे बड़ी द्वीप ग्रीनलैंड फिर से सुर्खियों में है। इस बार वजह है अमेरिका का एक ऐसा ‘पागलपन’ भरा प्रस्ताव, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। कल्पना कीजिए – US हर ग्रीनलैंड नागरिक को 1 लाख डॉलर (करीब 84 लाख रुपये) देने को तैयार! पूरी आबादी पर बोली लगाकर द्वीप को खरीद लेना चाहता है। यह कोई नई खबर नहीं, बल्कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 2019 के पुराने आइडिया का नया वर्जन है। लेकिन इस बार ट्विस्ट यह है कि सोशल मीडिया यूजर्स और कुछ पॉलिटिकल कमेंटेटर्स ने इसे ‘ट्रंप 2.0’ का नाम दे दिया। आखिर ग्रीनलैंड इतना खास क्यों? और US का यह ‘पागलपन’ क्यों दुनिया को हिलाकर रख रहा है?
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ग्रीनलैंड, जो डेनमार्क का हिस्सा है, आर्कटिक क्षेत्र में बसा है। यहां की आबादी महज 56,000 के आसपास है – ज्यादातर इनुइट जनजाति के लोग। बर्फीले पहाड़, प्राकृतिक संसाधन और सामरिक लोकेशन इसे सुपरपावर देशों के लिए लालच का केंद्र बनाते हैं। US का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण पिघलती बर्फ से नए अवसर खुल रहे हैं – तेल, गैस, दुर्लभ मिनरल्स और मिलिट्री बेस। लेकिन डेनमार्क ने साफ मना कर दिया: “ग्रीनलैंड बिकाऊ नहीं है!”
ग्रीनलैंड खरीद अमेरिका बोली : ट्रंप का पुराना सपना 2019 से चला आ रहा विवाद
2019 में जब डोनाल्ड ट्रंप ने ग्रीनलैंड खरीदने का ट्वीट किया, तो दुनिया हंस पड़ी। उन्होंने इसे “रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण” बताया। US पहले भी 19वीं सदी में इसे खरीदने की कोशिश कर चुका था। अब 2026 में, ट्रंप की वापसी की अफवाहों के बीच यह मुद्दा फिर गरमाया। सोशल मीडिया पर मीम्स वायरल हैं – “हर ग्रीनलैंड वाले को 1 लाख USD, बस द्वीप दे दो!”। गणना कीजिए: 56,000 लोगों को 1 लाख डॉलर देने में 56 बिलियन डॉलर लगेंगे, जो US के बजट का छोटा सा हिस्सा है। लेकिन क्या पैसे से देश बिक सकता है?
डेनमार्क के प्रधानमंत्री ने तत्काल प्रतिक्रिया दी: “यह हास्यास्पद है। ग्रीनलैंड के लोग खुद तय करेंगे।” ग्रीनलैंड की सरकार ने भी कहा, “हम अमेरिका के नहीं, स्वतंत्र रहेंगे।” INUIT लीडर्स ने इसे ‘उपनिवेशवाद’ करार दिया। रूस और चीन जैसे देश भी नजर रखे हुए हैं – आर्कटिक में अपना दबदबा जमाने को।
ग्रीनलैंड का सामरिक और आर्थिक महत्व – क्यों ललचाता है US को?
ग्रीनलैंड सिर्फ बर्फ का टुकड़ा नहीं। यहां रेयर अर्थ मिनरल्स हैं, जो इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरी और टेक गैजेट्स के लिए जरूरी। NASA के थूल बेस यहां मौजूद है, जो मिसाइल ट्रैकिंग करता है। जलवायु परिवर्तन से बर्फ पिघल रही है, जिससे शिपिंग रूट्स खुल रहे हैं। US को डर है कि चीन ग्रीनलैंड में माइनिंग प्रोजेक्ट्स से कब्जा जमा लेगा।
| संसाधन/महत्व | विवरण | US के लिए फायदा |
|---|---|---|
| दुर्लभ मिनरल्स | यूरेनियम, जिरकोनियम | टेक इंडस्ट्री सप्लाई |
| तेल-गैस भंडार | अनुमानित 50 बिलियन बैरल | एनर्जी सिक्योरिटी |
| सामरिक लोकेशन | आर्कटिक एंट्री पॉइंट | मिलिट्री बेस एक्सपैंशन |
| पिघलती बर्फ | नए शिपिंग रास्ते | ट्रेड रूट कंट्रोल |
यह टेबल दिखाता है कि ग्रीनलैंड कोई सस्ता सौदा नहीं, बल्कि जियो-पॉलिटिकल गेम चेंजर है।
दुनिया की प्रतिक्रियाएं: मीम्स से लेकर डिप्लोमेसी तक
- सोशल मीडिया पर #BuyGreenland ट्रेंड कर रहा।
- ट्विटर (अब X) पर यूजर्स मजाक उड़ा रहे:
- “अगर US ले लेगा, तो ग्रीनलैंड में मैकडॉनल्ड्स खुलेगा!”।
- लेकिन सीरियसली, यूरोपीय संघ ने डेनमार्क का साथ दिया।
- रूस ने कहा, “हमारी आर्कटिक पॉलिसी मजबूत है।”
- भारत जैसे देशों में यह न्यूज ‘अमेरिकी साम्राज्यवाद’ के रूप में चर्चा में है।
- क्या होगा आगे? ग्रीनलैंड 2026 में स्वतंत्रता रेफरेंडम की बात कर रहा।
- US अगर ट्रंप 2.0 के साथ दबाव डालेगा, तो अंतरराष्ट्रीय तनाव बढ़ेगा।
निष्कर्ष: पागलपन या स्ट्रैटेजी?
ग्रीनलैंड को खरीदने का US का पागलपन सिर्फ हेडलाइन नहीं, बल्कि ग्लोबल पावर स्ट्रगल का संकेत है। हर नागरिक को 1 लाख डॉलर का लालच कितना कामयाब होगा? समय बताएगा। लेकिन एक बात साफ – आर्कटिक अब जियो-पॉलिटिक्स का हॉटस्पॉट बन चुका। आप क्या सोचते हैं – बिकेगा ग्रीनलैंड या नहीं?
