ट्रंप सोलर एलायंस छोड़ना
ट्रंप सोलर एलायंस छोड़ना ट्रंप प्रशासन ने इंटरनेशनल सोलर एलायंस से अमेरिका को हटाया! भारत बिंदास, क्लाइमेट चेंज पर बड़ा झटका। ग्रीन एनर्जी गोल्स पर US को भारी नुकसान, भारत का सोलर मिशन मजबूत। ट्रंप की पॉलिसी से ग्लोबल सोलर अलायंस कमजोर, भारत लीडरशिप में आगे। पूरी डिटेल पढ़ें!

अमेरिका ने भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) से अपनी सदस्यता वापस ले ली है, जिसे ट्रंप प्रशासन की “अमेरिका फर्स्ट” नीति का हिस्सा बताया जा रहा है। इस फैसले से भारत के लिए एक तरह से चुनौती आई है, लेकिन दूसरी तरफ यह भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व की भूमिका और मजबूत करने का भी बड़ा मौका है।
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ट्रंप सोलर एलायंस छोड़ना : ट्रंप ने क्या फैसला लिया?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक राष्ट्रपति मेमोरेंडम पर हस्ताक्षर करते हुए अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, समझौतों और एजेंसियों से बाहर निकालने का आदेश दिया है। इनमें भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी शामिल है। व्हाइट हाउस के मुताबिक, ये संगठन “अमेरिका विरोधी”, “बेकार” या “फिजूलखर्ची वाले” हैं और अमेरिकी संप्रभुता, आर्थिक हितों और टैक्सपेयर्स के पैसे के खिलाफ काम करते हैं।
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि अमेरिकी करदाताओं का पैसा ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खर्च हो रहा था, जिससे सीधे अमेरिका को फायदा नहीं मिल रहा था। इसलिए अब इन संगठनों में अमेरिकी फंडिंग और भागीदारी तत्काल प्रभाव से बंद कर दी गई है।
इंटरनेशनल सोलर अलायंस क्या है?
- इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भारत और फ्रांस की संयुक्त पहल है,
- जिसकी शुरुआत 2015 में पेरिस में क्लाइमेट समिट के दौरान,
- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन फ्रांसीसी राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांदे ने की थी।
- इसका मुख्य उद्देश्य सौर ऊर्जा को सस्ती, स्वच्छ और टिकाऊ बनाना है।
- ISA के 111 से ज्यादा देश सदस्य हैं,
- जो विशेष रूप से सूर्य की रोशनी वाले देशों पर केंद्रित हैं।
- इसके लक्ष्यों में सोलर तकनीक की लागत कम करना,
- निवेश और वित्तीय सुविधाएं जुटाना, सौर परियोजनाओं में तकनीकी सहयोग बढ़ाना,
- और वैश्विक स्तर पर सौर ऊर्जा अपनाने को प्रोत्साहित करना शामिल है।
अमेरिका के बाहर जाने का मतलब
America के ISA से बाहर निकलने का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक असर भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाली इस पहल पर पड़ा है। यह न सिर्फ एक पर्यावरणीय मंच से बाहर निकलना है, बल्कि जलवायु और स्वच्छ ऊर्जा जैसे वैश्विक मुद्दों पर अमेरिका की प्रतिबद्धता पर भी सवाल खड़े करता है।
अमेरिका के बाहर जाने से ISA की फंडिंग और ग्लोबल सहयोग पर असर पड़ सकता है। अमेरिका एक बड़ी अर्थव्यवस्था और तकनीकी शक्ति है, इसलिए उसकी अनुपस्थिति से तकनीकी सहयोग और बड़े निवेश के अवसर सीमित हो सकते हैं।
भारत के लिए चुनौती और मौका
- India के लिए यह फैसला इसलिए
- अहम है क्योंकि ISA नई दिल्ली की प्रमुख कूटनीतिक पहल रही है।
- अमेरिका का बाहर जाना इस मंच की ताकत को कम कर सकता है,
- लेकिन साथ ही भारत के लिए नेतृत्व की भूमिका और मजबूत करने का मौका भी है।
भारत अब फ्रांस के साथ मिलकर यह दिखा सकता है कि वैश्विक सहयोग अमेरिका के बिना भी आगे बढ़ सकता है। भारत के लिए यह एक बड़ा अवसर है कि वह विकासशील देशों के बीच अपनी आवाज़ मजबूत करे और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व की भूमिका निभाए।
अमेरिका को क्या नुकसान?
- ट्रंप प्रशासन का दावा है कि,
- यह फैसला अमेरिकी राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने के लिए लिया गया है।
- लेकिन आलोचकों का मानना है कि इससे अमेरिका की वैश्विक छवि और नेतृत्व क्षमता को नुकसान पहुँचेगा।
अमेरिका के बाहर जाने से उसकी जलवायु नीतियों पर भरोसा कम हो सकता है और अन्य देश उसके साथ लंबी अवधि के सहयोग पर सवाल उठा सकते हैं। इसके अलावा, अमेरिकी कंपनियों के लिए भी यह नुकसानदायक हो सकता है, क्योंकि वे अंतरराष्ट्रीय सौर परियोजनाओं और निवेश के अवसरों से दूर रह सकती हैं।
भारत को अब क्या करना चाहिए?
- भारत को अब इस चुनौती को अपने लिए एक अवसर में बदलना होगा।
- भारत को फ्रांस और अन्य सहयोगी देशों के साथ मिलकर,
- ISA को और मजबूत करना होगा और नए निवेशकों और तकनीकी भागीदारों को आकर्षित करना होगा।
साथ ही, भारत को अपने घरेलू सौर लक्ष्यों पर ध्यान केंद्रित रखना होगा, जैसे 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा तक पहुँचना और सौर उद्योग में घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना। इस तरह भारत न केवल अपनी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी एक विश्वसनीय नेता के रूप में उभर सकता है।
