नेहरू पंचशील तिब्बत राज
नेहरू पंचशील तिब्बत राज CDS जनरल अनिल चौहान ने नेहरू के पंचशील समझौते और 1962 युद्ध पर बड़ा खुलासा किया। तिब्बत पर चीन को क्यों छूट दी? एयर फोर्स इस्तेमाल न करने का राज क्या था? ऐतिहासिक भूलें उजागर।

देहरादून में भारत हिमालयन स्ट्रैटेजी फोरम में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) जनरल अनिल चौहान ने एक ऐसा बयान दिया, जिसने भारत-चीन संबंधों के ऐतिहासिक संदर्भ को फिर से सुर्खियों में ला दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि 1954 के पंचशील समझौते में भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था, और इसका मुख्य उद्देश्य क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना था। CDS चौहान के इस खुलासे को कई लोग “तिब्बत का सबसे बड़ा राज” मान रहे हैं, क्योंकि यह नेहरू युग की विदेश नीति की कमजोरियों को उजागर करता है।
नेहरू पंचशील तिब्बत राज: पंचशील समझौता, क्या था और कब हुआ?
29 अप्रैल 1954 को भारत और चीन के बीच “तिब्बत क्षेत्र के साथ व्यापार और अंतर्संबंध पर समझौता” हुआ, जिसे पंचशील के नाम से जाना जाता है। यह समझौता जवाहरलाल नेहरू और चीन के प्रधानमंत्री चाऊ एन लाई के बीच हुआ। इसमें पांच सिद्धांत शामिल थे:
- एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का पारस्परिक सम्मान
- पारस्परिक गैर-आक्रमण
- एक-दूसरे के आंतरिक मामलों में गैर-हस्तक्षेप
- समानता और पारस्परिक लाभ
- शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व
यह समझौता शुरू में व्यापार और तीर्थयात्रा से जुड़ा था, लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि भारत ने पहली बार आधिकारिक रूप से तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया। इससे पहले 1950 में चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया था, और 1951 में दलाई लामा को 17-सूत्रीय समझौते के तहत चीन की संप्रभुता स्वीकार करनी पड़ी थी।
नेहरू ने पंचशील क्यों किया? – CDS चौहान का खुलासा
- CDS जनरल अनिल चौहान ने अपने भाषण में कहा कि
- आजाद भारत चीन के साथ अच्छे संबंध बनाने के लिए उत्सुक था।
- 1954 में भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया और पंचशील पर हस्ताक्षर किए।
- नेहरू को लगता था कि इससे उत्तरी सीमा (उत्तराखंड, हिमाचल आदि क्षेत्र) का विवाद सुलझ जाएगा।
- उन्होंने समझा कि औपचारिक संधि से सीमा सुरक्षित हो जाएगी।
चीन के लिए भी यह महत्वपूर्ण था। चीन ने हाल ही में तिब्बत को “मुक्त” किया था (उनके शब्दों में), और ल्हासा पर नियंत्रण स्थापित किया था। वे इस क्षेत्र में स्थिरता चाहते थे। CDS ने कहा, “भारत ने सोचा कि उत्तरी सीमा का मुद्दा सुलझ गया, लेकिन चीन ने इसे सिर्फ व्यापारिक समझौता माना।” यह बयान नेहरू की रणनीति को एक बड़ी गलती के रूप में पेश करता है, क्योंकि 1962 के युद्ध में चीन ने इसी समझौते को दरकिनार कर हमला कर दिया।
तिब्बत का सबसे बड़ा राज: नेहरू की भूल या रणनीतिक मजबूरी?
CDS चौहान के बयान से साफ होता है कि नेहरू ने तिब्बत को चीन के हवाले करने का फैसला स्थिरता के लिए लिया। सरदार पटेल ने 1950 में तिब्बत के पक्ष में चेतावनी दी थी, लेकिन नेहरू ने चीन का साथ चुना। कई इतिहासकार इसे नेहरू की अति-आदर्शवादी नीति मानते हैं, जहां उन्होंने माओ के साथ “हिंदी-चीनी भाई-भाई” का नारा दिया, लेकिन चीन ने इसे कमजोरी समझा।
- परिणामस्वरूप, तिब्बत बफर जोन के रूप में खो गया।
- आज LAC पर विवाद इसी तिब्बत क्षेत्र से जुड़ा है।
- CDS ने कहा कि उत्तराखंड जैसे मिडिल सेक्टर में विवाद पंचशील से पहले और बाद में भी शुरू हो चुके थे।
- यह “राज” इसलिए बड़ा है क्योंकि यह दिखाता है कि 1954 का फैसला आज भी भारत-चीन तनाव की जड़ है।
आज के संदर्भ में क्या सबक?
- CDS चौहान का बयान वर्तमान सीमा विवाद को ऐतिहासिक नजरिए से देखने की जरूरत बताता है।
- आज चीन LAC पर आक्रामक है, जबकि भारत अपनी सीमाओं को मजबूत कर रहा है।
- 1962 की गलतियां दोहराई नहीं जानी चाहिए।
- नेहरू के समय शांति की चाह में तिब्बत छोड़ दिया गया,
- लेकिन अब भारत मजबूत स्थिति में है।
यह घटना सिखाती है कि विदेश नीति में आदर्शवाद के साथ यथार्थवाद जरूरी है। CDS के इस खुलासे से बहस फिर शुरू हो गई है – क्या नेहरू की नीति ने भारत को कमजोर बनाया? या यह उस समय की मजबूरी थी? समय बताएगा, लेकिन तिब्बत का यह “सबसे बड़ा राज” अब खुल चुका है।
