मॉरीशस मालदीव कूटनीति संकट
मॉरीशस मालदीव कूटनीति संकट मॉरीशस ने अचानक मालदीव के साथ अपने कूटनीतिक रिश्ते तोड़ दिए। जानें इसके पीछे की वजह, संभावित अंतरराष्ट्रीय नतीजे और भारत-सीनेट्रिक क्षेत्र पर इसका असर।

हाल ही में हिंद महासागर के दो छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों, मॉरीशस और मालदीव के बीच संबंधों में अचानक दरार आ गई है। 27 फरवरी 2026 को मॉरीशस ने मालदीव के साथ सभी राजनयिक संबंधों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। यह फैसला चागोस द्वीपसमूह (Chagos Archipelago) को लेकर मालदीव की हालिया आपत्ति के कारण लिया गया, जहां मालदीव ने मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता देने से इनकार कर दिया है। यह विवाद लंबे समय से चला आ रहा है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने इसे एक बड़े संकट में बदल दिया है।
चागोस द्वीपसमूह हिंद महासागर में स्थित है, जो मालदीव से लगभग 500 किलोमीटर दक्षिण में है। यह क्षेत्र सामरिक महत्व का है क्योंकि यहां अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा डिएगो गार्सिया स्थित है। ब्रिटेन ने 2025 में मॉरीशस के साथ एक समझौता किया था, जिसमें चागोस की संप्रभुता मॉरीशस को सौंपी गई, लेकिन अड्डे को 99 वर्षों के लिए लीज पर रखा गया। मालदीव की आपत्ति ने इस समझौते को चुनौती दी है, जिससे मॉरीशस नाराज हो गया। इस ब्लॉग पोस्ट में हम इस विवाद की पृष्ठभूमि, कारण, प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे। क्या यह संकट क्षेत्रीय स्थिरता को प्रभावित करेगा? आइए जानते हैं।
मॉरीशस मालदीव कूटनीति संकट: चागोस विवाद की पृष्ठभूमि
- चागोस द्वीपसमूह का इतिहास औपनिवेशिक काल से जुड़ा है।
- 1960 के दशक में ब्रिटेन ने मॉरीशस से अलग करके इसे
- ब्रिटिश इंडियन ओशन टेरिटरी (BIOT) बनाया,
- ताकि अमेरिका वहां सैन्य अड्डा स्थापित कर सके।
- मॉरीशस की आजादी के समय (1968) में चागोस को अलग रखा गया,
- और मूल निवासियों को जबरन हटाया गया।
- मॉरीशस ने हमेशा चागोस पर अपनी संप्रभुता का दावा किया है।
- अंतरराष्ट्रीय अदालतों जैसे आईसीजे और आईटीएलओएस ने मॉरीशस के पक्ष में फैसले दिए हैं।
मॉरीशस मालदीव कूटनीति संकट : मालदीव का दावा भी पुराना है। मालदीव चागोस को ‘फोअल्हावाही’ कहता है और दावा करता है कि ऐतिहासिक, भौगोलिक और कानूनी रूप से यह उनका हिस्सा है। 2023 में आईटीएलओएस ने मॉरीशस और मालदीव के बीच समुद्री सीमा का फैसला किया, जिसमें मालदीव को 47,232 वर्ग किलोमीटर और मॉरीशस को 45,331 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र दिया गया। लेकिन मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने 2026 में इस फैसले को अस्वीकार कर दिया और चागोस के उत्तरी हिस्से पर नियंत्रण का दावा किया।
पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम सोलिह के समय मालदीव ने मॉरीशस की संप्रभुता को मान्यता दी थी, लेकिन मुइज्जू ने इसे उलट दिया। यह बदलाव चीन के साथ मालदीव के बढ़ते संबंधों से जुड़ा माना जा रहा है, क्योंकि चीन हिंद महासागर में अपनी उपस्थिति बढ़ाना चाहता है।
मालदीव की आपत्ति और मॉरीशस की नाराजगी
5 फरवरी 2026 को मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू ने संसद में घोषणा की कि उनका देश आईटीएलओएस के 2023 के फैसले को अस्वीकार करता है और चागोस के आसपास के समुद्री क्षेत्र पर नियंत्रण करेगा। उन्होंने कहा कि मालदीव का ऐतिहासिक दावा मजबूत है। इसके अलावा, मालदीव ने ब्रिटेन को 8 नवंबर 2024 और 18 जनवरी 2026 को औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई, जिसमें ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते को अस्वीकार किया गया।
- मॉरीशस के लिए यह एक बड़ा झटका था।
- मॉरीशस के प्रधानमंत्री नवीन रामगुलाम ने इसे राष्ट्रीय हितों पर हमला बताया।
- 27 फरवरी 2026 को कैबिनेट बैठक के बाद
- मॉरीशस ने मालदीव के साथ राजनयिक संबंध निलंबित करने का फैसला लिया।
- मॉरीशस का कहना है कि मालदीव का रुख संयुक्त राष्ट्र चार्टर,
- अंतरराष्ट्रीय कानून और क्षेत्रीय शांति को चुनौती देता है।
- यह फैसला ‘रातों-रात’ इसलिए लगता है क्योंकि आपत्ति के कुछ दिनों बाद ही संबंध टूट गए।
मालदीव की यह कार्रवाई आंतरिक राजनीति से भी जुड़ी है। मुइज्जू ‘इंडिया आउट’ कैंपेन से सत्ता में आए थे, लेकिन हाल में भारत के साथ संबंध सुधरे हैं। फिर भी, चागोस विवाद में मालदीव की आक्रामकता चीन की रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।
विवाद का विश्लेषण
यह विवाद सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं है। चागोस की रणनीतिक स्थिति के कारण अमेरिका, ब्रिटेन, भारत और चीन जैसे बड़े खिलाड़ी प्रभावित हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते की आलोचना की थी, इसे ‘कमजोरी’ बताया। लेकिन बाद में अमेरिका ने समझौते का समर्थन किया। ट्रंप ने मालदीव से भी बात की, जहां मुइज्जू ने डिएगो गार्सिया पर अमेरिकी उपस्थिति जारी रखने की पेशकश की।
- ब्रिटेन ने कहा कि चागोस संप्रभुता का मुद्दा सिर्फ ब्रिटेन और मॉरीशस के बीच है।
- लेकिन मालदीव की आपत्ति ने समझौते को रोक दिया है।
- ब्रिटेन ने विधेयक को अमेरिका के साथ चर्चा के लिए रोक दिया है।
- भारत के लिए यह जटिल है।
- मॉरीशस भारत का करीबी सहयोगी है,
- जबकि मालदीव के साथ संबंध सुधार रहे हैं।
- यदि विवाद बढ़ा, तो हिंद महासागर में भारत-चीन प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है।
- मालदीव की कार्रवाई से समुद्री संसाधन जैसे मछली पकड़ना और तेल खोज प्रभावित होंगे।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएं
- अंतरराष्ट्रीय समुदाय की प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं।
- ब्रिटेन ने मालदीव की आपत्ति को खारिज किया।
- अमेरिका ने समझौते को सुरक्षित बताया,
- लेकिन ट्रंप की आलोचना ने अनिश्चितता पैदा की।
- नाइजेल फराज जैसे ब्रिटिश नेता ने मालदीव के संभावित आईसीजे दावे का जिक्र किया।
चीन ने मॉरीशस और मालदीव को अपने महत्वपूर्ण भागीदार बताया। भारत ने तटस्थ रुख अपनाया, लेकिन क्षेत्रीय स्थिरता पर चिंता जताई। सोशल मीडिया पर जैसे इंस्टाग्राम पर यह ब्रेकिंग न्यूज के रूप में वायरल हुआ।
निष्कर्ष
मॉरीशस की नाराजगी का मुख्य कारण मालदीव का चागोस पर दावा और ब्रिटेन-मॉरीशस समझौते की आपत्ति है। यह रातों-रात टूटे संबंध क्षेत्रीय राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। यदि मालदीव आईसीजे जाता है, तो विवाद लंबा खिंच सकता है। अंतरराष्ट्रीय कानून और कूटनीति से समाधान जरूरी है। हिंद महासागर की शांति बड़े शक्तियों के हाथ में है। क्या ट्रंप की भूमिका बदलाव लाएगी? समय बताएगा
