अमित शाह बंगाल अभियान
अमित शाह बंगाल अभियान पश्चिम बंगाल में भाजपा ने चुनावी रणनीति में बड़ा बदलाव किया। अमित शाह अब खुद अभियान की कमान संभाल रहे हैं, जबकि पार्टी दिलीप घोष समेत कई नेताओं को साधने में लगी है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर से गरमाती दिख रही है। 2026 के विधानसभा चुनावों की आहट से पहले भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपनी तैयारियों को गति दे दी है। सूत्रों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्री और पार्टी के रणनीतिकार अमित शाह ने खुद बंगाल अभियान की कमान संभाल ली है। अमित शाह के एक्शन मोड में आते ही बंगाल भाजपा में नई हलचल मच गई है। वहीं, दूसरी ओर पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष की नाराज़गी भी भाजपा के लिए चुनौती का विषय बन गई है, जिसे शांत करने के लिए संगठन हरसंभव प्रयास कर रहा है।
अमित शाह की एंट्री से बदली सियासी हवा
भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में अपेक्षा से कम सीटें हासिल की थीं। उस समय भी पार्टी ने बंगाल में “अबकी बार 200 पार” का नारा दिया था, लेकिन ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए सत्ता बरकरार रखी थी। हार के बाद भाजपा की राज्य इकाई गुटबाजी, संगठनात्मक ढिलाई और नेतृत्व संघर्ष से जूझती रही।
इसी पृष्ठभूमि में अमित शाह का दोबारा सक्रिय होना यह संकेत देता है कि पार्टी अब बंगाल में “डैमेज कंट्रोल” और “मिशन रिवाइवल” पर उतर आई है। शाह ने पिछले कुछ हफ्तों में प्रदेश नेतृत्व, आरएसएस कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं के साथ कई बैठकें की हैं। उनका फोकस संगठन को फिर से मजबूत करना, जमीनी कार्यकर्ताओं में जोश भरना और नाराज़ नेताओं को मनाना है।
दिलीप घोष की नाराज़गी क्यों मायने रखती है
दिलीप घोष, जो कभी बंगाल भाजपा का सबसे ताकतवर चेहरा माने जाते थे, हाल के महीनों में पार्टी की दिशा और नेतृत्व को लेकर खुलकर असंतोष जता चुके हैं। उनके बयानों से यह स्पष्ट हो गया है कि वे पार्टी के अंदर के निर्णयों से नाखुश हैं।
- घोष का प्रभाव बंगाल के खासकर जंगलमहल और दक्षिण बंगाल के कई जिलों में है।
- उन्होंने विधानसभा चुनावों में भाजपा को मजबूत जनाधार दिलाने में अहम भूमिका निभाई थी।
- ऐसे में उनका असंतोष पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है।
- यही कारण है कि अब अमित शाह ने खुद उन्हें मनाने की जिम्मेदारी ली है।
- बताया जा रहा है कि केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें आश्वासन दिया है कि उनकी
- भूमिका को फिर से सम्मानजनक तरीके से तय किया जाएगा।
अमित शाह बंगाल अभियान : समझौते और नई रणनीति की तलाश
- भाजपा इस बार बंगाल में “नेतृत्व और संगठन दोनों का संतुलन” साधने की कोशिश में है।
- एक ओर सुभेंदु अधिकारी जैसे नेताओं की सक्रियता बढ़ाई जा रही है,
- वहीं दूसरी ओर पुराने चेहरों को साथ बनाए रखने की कवायद भी जारी है।
- पार्टी की रणनीति अब यह है कि केंद्रीय नेतृत्व “एकजुट चेहरा” पेश करे।
अमित शाह की योजना के अनुसार, भाजपा इस बार अधिक लोकल इश्यूज़ पर ध्यान देगी — जैसे बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कटमनी (गैरकानूनी कमीशन), और कानून-व्यवस्था के मुद्दे। इसके अलावा, हिंदुत्व और केंद्र की योजनाओं का प्रचार भी एक बड़ा चुनावी हथियार बनेगा।
संगठन में फेरबदल के संकेत
- सूत्रों का मानना है कि आने वाले हफ्तों में बंगाल भाजपा के संगठन में फेरबदल भी किए जा सकते हैं।
- अमित शाह के करीबी नेताओं को ज़मीनी स्तर पर बड़े पदों पर लाया जा सकता है
- ताकि चुनाव से पहले पार्टी की आंतरिक मशीनरी चुस्त-दुरुस्त हो सके।
- शाह यह भी सुनिश्चित करना चाहते हैं कि राज्य नेतृत्व और दिल्ली के निर्देशों में तालमेल बना रहे।
- भाजपा को इस बात का अहसास है कि 2021 की हार के पीछे जिस समन्वय की कमी थी,
- वह दोहराई नहीं जानी चाहिए।
टीएमसी पर निशाना साधने की तैयारी
अमित शाह ने अपने हालिया बयानों में साफ संकेत दिया है कि भाजपा ममता बनर्जी सरकार पर सीधे हमले करेगी। भ्रष्टाचार, राशन घोटाला, एसएससी भर्ती घोटाला और कानून व्यवस्था जैसे मुद्दों को केंद्र बिंदु बनाया जाएगा। भाजपा का लक्ष्य होगा कि जनता के बीच यह बात स्थापित की जाए कि “परिवर्तन अभी अधूरा है” और यही 2026 के चुनाव का नारा बनेगा।
निष्कर्ष: भाजपा में एकता या फिर नई चुनौती?
- अमित शाह के सक्रिय होने के साथ बंगाल भाजपा में जोश तो लौटता दिख रहा है,
- लेकिन दिलीप घोष जैसे नेताओं की नाराज़गी को दूर किए बिना पार्टी के लिए सफलता की राह आसान नहीं होगी।
- अगर भाजपा पुराने नेताओं और नए संगठन के बीच संतुलन बना लेती है,
- तो ममता बनर्जी के गढ़ में एक बार फिर से राजनीतिक मुकाबला दिलचस्प हो सकता है।
अगले कुछ महीनों में बंगाल की सियासत में कई बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं — और इन सबकी दिशा तय करेगा अमित शाह की रणनीति और पार्टी की एकता।
