गाजा पीस बोर्ड भारत
गाजा पीस बोर्ड भारत ट्रंप के गाजा पीस बोर्ड में भारत को $1 बिलियन योगदान के साथ इनवाइट, लेकिन भारत ने इनकार किया। पीएम मोदी का वैकल्पिक प्लान क्या? मध्य पूर्व शांति में भारत की भूमिका।

भारतीय विदेश नीति में एक बार फिर पीएम नरेंद्र मोदी की रणनीतिक दूरदर्शिता सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित गाजा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ (Board of Peace) में शामिल होने के निमंत्रण को भारत ने विनम्रता से इनकार कर दिया है। इस बोर्ड में स्थायी सदस्यता के लिए $1 बिलियन (करीब 9,000 करोड़ रुपये) की भारी-भरकम राशि का योगदान मांगा जा रहा था, जिसे भारत ने अस्वीकार कर दिया।
यह फैसला न केवल मिडिल ईस्ट की जटिल राजनीति में भारत की स्वतंत्र भूमिका को रेखांकित करता है, बल्कि पीएम मोदी के ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ के सिद्धांत को भी मजबूत करता है। ट्रंप प्रशासन की इस पहल को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 2803 से समर्थन मिला है, लेकिन भारत का इनकार वैश्विक कूटनीति में एक बड़ा संदेश देता है। आइए इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा करें – क्या है यह बोर्ड, भारत ने क्यों ठुकराया, और पीएम मोदी का आगे का प्लान क्या हो सकता है?
गाजा ‘बोर्ड ऑफ पीस’ क्या है? ट्रंप का महत्वाकांक्षी प्लान
डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही गाजा पट्टी के पुनर्निर्माण और शांति स्थापना के लिए ‘बोर्ड ऑफ पीस’ की घोषणा की गई। दो साल से चले आ रहे इजराइल-हमास युद्ध के बाद, ट्रंप प्रशासन ने इस बोर्ड को गाजा के पुनर्निर्माण, हमास के निरस्त्रीकरण और प्रशासनिक ढांचे की निगरानी के लिए गठित किया है। बोर्ड में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो, विशेष दूत स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुश्नर और टोनी ब्लेयर जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं। ट्रंप खुद इसकी अध्यक्षता करेंगे।
- ब्लूमबर्ग न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार,
- बोर्ड का ड्राफ्ट चार्टर में सदस्य देशों से तीन साल की सदस्यता के लिए योगदान मांगा गया है,
- लेकिन स्थायी सीट के लिए $1 बिलियन से ज्यादा नकद योगदान की शर्त रखी गई है।
- द अरब वीकली ने भी इसकी पुष्टि की है कि
- पहले साल में $1 बिलियन देने वाले देशों को टर्म लिमिट से छूट मिलेगी।
- ट्रंप ने 60 से ज्यादा देशों के नेताओं को निमंत्रण भेजा है,
- जिसमें भारत के पीएम मोदी, पाकिस्तान के पीएम शहबाज शरीफ,
- रूस और अन्य शामिल हैं। बोर्ड का फोकस गाजा में सेवाओं की बहाली,
- संस्थानों का पुनर्निर्माण, फंडिंग और एक अंतरराष्ट्रीय स्थिरीकरण फोर्स पर है।
- लेकिन आलोचक इसे ‘पे-टू-प्ले’ सिस्टम बता रहे हैं, जहां शांति को पैसे से खरीदा जा रहा है।
यह प्लान ट्रंप की ‘डील ऑफ द सेंचुरी’ की याद दिलाता है, लेकिन इस बार यूएन का समर्थन इसे वैधता देता है। गाजा में बाढ़, विनाश और मानवीय संकट के बीच यह बोर्ड एक तीन-स्तरीय संरचना पर काम करेगा – ट्रंप की लीडरशिप, फिलिस्तीनी टेक्नोक्रेट कमिटी और गाजा एक्जीक्यूटिव बोर्ड। इजराइल ने कुछ आपत्तियां जताई हैं, लेकिन ट्रंप इसे आगे बढ़ा रहे हैं।
गाजा पीस बोर्ड भारत: भारत का इनकार ठेंगा दिखाने की वजहें
भारत को ट्रंप द्वारा व्यक्तिगत रूप से निमंत्रण मिला था, लेकिन सरकारी सूत्रों के अनुसार, नई दिल्ली ने इसे अस्वीकार कर दिया। द न्यू यॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि स्थायी सदस्यता के लिए $1 बिलियन की मांग एक बड़ी बाधा थी। भारत के पूर्व राजनयिक केपी फेबियन ने सुझाव दिया कि भारत को विनम्रता से इनकार करना चाहिए, क्योंकि यह बोर्ड मिडिल ईस्ट की जटिलताओं में भारत को फंसा सकता है।
- भारत की विदेश नीति हमेशा से बहुपक्षीय रही है,
- लेकिन वह किसी भी ऐसे गठबंधन से दूर रहता है
- जो उसके हितों से मेल न खाए।
- गाजा मुद्दे पर भारत का स्टैंड संतुलित है –
- वह इजराइल के साथ मजबूत रिश्ते रखता है,
- लेकिन फिलिस्तीन के दो-राष्ट्र समाधान का समर्थक भी है।
- $1 बिलियन की राशि भारत के लिए आर्थिक बोझ नहीं है,
- लेकिन यह राशि गाजा के पुनर्निर्माण में इस्तेमाल होगी,
- जहां हमास जैसे तत्वों का खतरा बरकरार है।
- भारत नहीं चाहता कि उसका पैसा ऐसी जगह लगे जहां रिटर्न अनिश्चित हो।
इसके अलावा, ट्रंप का प्लान अमेरिका-केंद्रित लगता है, जहां ट्रंप अंतिम फैसले लेंगे। भारत जैसा देश, जो क्वाड, ब्रिक्स और जी20 जैसे मंचों में सक्रिय है, किसी ‘पेड मेंबरशिप’ वाले बोर्ड में फंसना नहीं चाहता। रेडिट पर चर्चा में भी कई यूजर्स ने कहा कि यह ‘रेड फ्लैग’ है और भारत को दूरी बनानी चाहिए। पाकिस्तान को भी निमंत्रण मिला है, जो भारत के लिए और असहज स्थिति पैदा कर सकता है।
पीएम मोदी का प्लान: स्वतंत्र कूटनीति और वैकल्पिक रास्ते
पीएम मोदी का इनकार कोई जल्दबाजी नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति है। मोदी सरकार मिडिल ईस्ट में भारत की भूमिका को मजबूत करने पर फोकस कर रही है, लेकिन अमेरिका के छाते के नीचे नहीं। भारत पहले से ही गाजा में मानवीय सहायता भेज रहा है – दवाएं, भोजन और मेडिकल सप्लाई। 2025 में भारत ने गाजा रिलीफ फंड में 50 मिलियन डॉलर का योगदान दिया था। मोदी का प्लान है कि भारत यूएन के जरिए या द्विपक्षीय रूप से मदद करे, न कि किसी विवादास्पद बोर्ड के माध्यम से।
आगे चलकर, मोदी IMEEC (इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर) को मजबूत करेंगे, जो गाजा के स्थिर होने पर भारत को आर्थिक लाभ देगा। भारत इजराइल के साथ रक्षा और टेक सहयोग बढ़ाएगा, जबकि फिलिस्तीन के साथ राजनयिक रिश्ते बनाए रखेगा। ट्रंप के साथ मोदी के व्यक्तिगत रिश्ते अच्छे हैं, लेकिन राष्ट्रीय हित सर्वोपरि है। फर्स्टपोस्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत रूस को भी आमंत्रित किया गया है, जो भारत की मल्टिपोलर वर्ल्ड की सोच से मेल खाता है।
मोदी का बड़ा प्लान ‘वसुधैव कुटुंबकम’ पर आधारित है – वैश्विक शांति में योगदान, लेकिन बिना किसी दबाव के। 2026 में जी20 की मेजबानी के दौरान मोदी गाजा मुद्दे पर एक अलग फोरम का प्रस्ताव कर सकते हैं, जहां सभी पक्ष बराबरी से शामिल हों।
वैश्विक प्रभाव और निष्कर्ष
- भारत के इनकार से ट्रंप के प्लान को झटका लगा है,
- क्योंकि भारत की भागीदारी बोर्ड को वैश्विक वैधता देती।
- लेकिन यह फैसला भारत की बढ़ती वैश्विक ताकत को दिखाता है –
- वह अब किसी के दबाव में नहीं आता।
- पाकिस्तान ने भी निमंत्रण पर विचार कर रहा है,
- जो क्षेत्रीय तनाव बढ़ा सकता है।
- कुल मिलाकर, मोदी का यह कदम भारत को मिडिल ईस्ट की राजनीति में एक संतुलित खिलाड़ी बनाता है।
यह घटना बताती है कि वैश्विक कूटनीति में पैसे की भूमिका बढ़ रही है, लेकिन भारत जैसे देश अपनी शर्तों पर खेलेंगे। क्या आपको लगता है कि भारत का फैसला सही है? कमेंट्स में बताएं!
