NATO यूरोप अमेरिका बगावत
NATO यूरोप अमेरिका बगावत NATO में यूरोप-अमेरिका तनाव, जर्मनी अपनी सेना को सबसे खतरनाक बनाने में जुटा। ट्रंप के खिलाफ बगावत, रूस में खलबली। यूरोपीय मिलिट्री पावर बढ़ रही।

2025-2026 का दौर वैश्विक सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक नया टर्निंग पॉइंट साबित हो रहा है। NATO (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) में दरार की खबरें तेजी से फैल रही हैं। यूरोपीय देश, खासकर जर्मनी, अब अमेरिका पर पूरी तरह निर्भर रहने की बजाय अपनी स्वतंत्र सैन्य ताकत बढ़ाने की राह पर हैं।
- जर्मन चांसलर फ्रीडरिख मर्ज (Friedrich Merz) ने स्पष्ट घोषणा की है
- कि जर्मनी “यूरोप की सबसे ताकतवर पारंपरिक सेना”
- (most capable conventional army in Europe) बनाएगा।
- यह कदम रूस के बढ़ते खतरे और अमेरिका की बदलती नीतियों के बीच उठाया गया है,
- जिससे मॉस्को में खलबली मच गई है।
जर्मनी का बड़ा प्लान: यूरोप की सबसे मजबूत आर्मी
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जर्मनी ने अपनी सेना (Bundeswehr) को काफी सीमित रखा था। लेकिन रूस के यूक्रेन पर हमले (2022 से जारी) ने सब बदल दिया। चांसलर मर्ज ने कहा है कि जर्मनी को अपनी आर्थिक ताकत के अनुरूप सैन्य क्षमता विकसित करनी होगी।
- रक्षा बजट में भारी बढ़ोतरी: जर्मनी ने €100 बिलियन का स्पेशल फंड पहले ही शुरू किया था, अब इसे और बढ़ाकर ट्रिलियन यूरो स्तर तक ले जाने की योजना है।
- सैनिकों की संख्या बढ़ाना: नए कानून से अनिवार्य सैन्य सेवा या वैकल्पिक भर्ती की प्रक्रिया तेज हो रही है।
- आधुनिक हथियार: टैंक, फाइटर जेट, मिसाइल सिस्टम और साइबर डिफेंस में बड़े निवेश।
- लक्ष्य: 2029 तक जर्मनी की सेना यूरोप की सबसे मजबूत और चौथी सबसे बड़ी वैश्विक सेना बन सकती है।
#NATO के सेक्रेटरी जनरल मार्क रुट्टे ने जर्मनी की इस पहल की तारीफ की है, इसे “ट्रांसअटलांटिक पार्टनरशिप में अच्छा उदाहरण” बताया। लेकिन असल मकसद साफ है – अमेरिका पर निर्भरता कम करना। ट्रंप प्रशासन के दौरान अमेरिका ने NATO सहयोगियों पर दबाव डाला कि वे 5% GDP तक रक्षा खर्च बढ़ाएं, लेकिन यूरोप अब खुद को “अमेरिका के बिना भी मजबूत” बनाने की सोच रहा है।
NATO में बगावत: यूरोप-अमेरिका तनाव
NATO की स्थापना के समय इसका मकसद था – “रूस को बाहर रखना, अमेरिका को अंदर रखना और जर्मनी को नीचे रखना” (Lord Ismay का प्रसिद्ध कथन)। लेकिन अब हालात उलट गए हैं।
- ट्रंप के रूस के प्रति नरम रुख और यूक्रेन युद्ध में कम समर्थन से यूरोपीय देश चिंतित हैं।
- जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन जैसे देश अब EU आर्मी या स्वतंत्र यूरोपीय डिफेंस की बात कर रहे हैं।
- ग्रीनलैंड विवाद में अमेरिका और डेनमार्क (NATO सदस्य) के बीच टकराव,
- जहां यूरोपीय देशों ने अपनी छोटी टुकड़ियां भेजीं, लेकिन अमेरिकी दबाव के खिलाफ खड़े हुए।
- यह “बगावत” पूरी तरह खुली नहीं है,
- लेकिन दरार साफ दिख रही है।
- यूरोप अब समझ रहा है कि अमेरिका की प्राथमिकताएं बदल सकती हैं,
- इसलिए खुद को तैयार करना जरूरी है।
रूस में खलबली: लावरोव की चिंता
#रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने जर्मनी के इस प्लान को “बहुत चिंताजनक” बताया। मॉस्को का मानना है कि जर्मनी की सेना का विस्तार “यूरोप में नई सैन्य ताकत” पैदा कर रहा है, जो रूस के लिए खतरा है।
- पुतिन ने पहले ही चेतावनी दी है कि यूरोप अगर रूस के खिलाफ बड़ा कदम उठाएगा, तो परिणाम भारी होंगे।
- ब्रिटेन और जर्मनी पर परमाणु हमले की धमकियां (रूसी मीडिया में चर्चा) से माहौल और गरम है।
- रूस यूक्रेन युद्ध में थका हुआ है, लेकिन NATO की मजबूती उसे और सतर्क कर रही है।
रूस का दावा है कि जर्मनी की यह सेना “हिटलर युग” की याद दिलाती है, जबकि जर्मनी इसे “रूस के खतरे” से निपटने का जरिया बता रहा है।
NATO यूरोप अमेरिका बगावत : आगे क्या?
- यह स्थिति वैश्विक शक्ति संतुलन को बदल सकती है।
- अगर यूरोप अमेरिका से अलग होकर मजबूत हुआ,
- तो NATO की एकता पर सवाल उठेंगे।
- रूस के लिए यह नया चैलेंज है,
- जबकि अमेरिका को अपने प्रभाव को बनाए रखने की चुनौती मिलेगी।
क्या यह NATO का अंत होगा या नया रूप? समय बताएगा, लेकिन फिलहाल जर्मनी की “सबसे खतरनाक सेना” बनाने की खबर ने दुनिया में हलचल मचा दी है। रूस में खलबली बढ़ी है, यूरोप में आत्मविश्वास और अमेरिका में सवाल – यही आज का नया जियोपॉलिटिकल रियलिटी है।
