कठपुतली गवर्नर सिद्धारमैया
कठपुतली गवर्नर सिद्धारमैया कर्नाटक गवर्नर थावरचंद गहलोत ने कैबिनेट स्पीच की सिर्फ 2 लाइन पढ़ीं और वॉकआउट किया, CM सिद्धारमैया ने केंद्र की कठपुतली बताया, संविधान उल्लंघन पर SC जाने की धमकी।

कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर तूफान मच गया है। हाल ही में विधानसभा के संयुक्त सत्र में राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सिर्फ दो लाइनें पढ़कर सदन से वॉकआउट कर दिया, जिससे पूरा सदन हंगामे में डूब गया। मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इसे संविधान का घोर उल्लंघन बताते हुए राज्यपाल को केंद्र सरकार की कठपुतली करार दिया और ऐलान किया कि उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में लड़ाई लड़ी जाएगी। यह घटना न सिर्फ कर्नाटक की राजनीति में नया मोड़ लाई है, बल्कि केंद्र-राज्य संबंधों में गहराते तनाव को भी उजागर करती है।
कठपुतली गवर्नर सिद्धारमैया : घटना का पूरा विवरण
- 22 जनवरी 2026 को कर्नाटक विधानसभा का बजट सत्र शुरू हुआ।
- संवैधानिक प्रथा के अनुसार,
- राज्यपाल को सदन के संयुक्त सत्र में सरकार द्वारा तैयार किया गया अभिभाषण पढ़ना होता है।
- यह अभिभाषण सरकार की नीतियों,
- उपलब्धियों और आने वाली योजनाओं का आधिकारिक बयान होता है।
- अनुच्छेद 176 के तहत राज्यपाल को यह दायित्व निभाना अनिवार्य है,
- जिसमें कैबिनेट द्वारा अनुमोदित भाषण ही पढ़ा जाता है।
लेकिन राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने सरकार द्वारा तैयार भाषण के 11 पैराग्राफ पर आपत्ति जताई। इनमें केंद्र सरकार की कुछ योजनाओं, जैसे MGNREGA को हटाकर लागू किए गए VB-G RAM G एक्ट पर कड़ी आलोचना शामिल थी। राज्य सरकार ने इन पैराग्राफ को हटाने से इनकार कर दिया। नतीजा? राज्यपाल सदन पहुंचे, सिर्फ दो शुरुआती लाइनें पढ़ीं और बिना पूरा भाषण पढ़े चले गए। सदन में कांग्रेस विधायकों ने “शर्म करो, शर्म करो” के नारे लगाए और हंगामा मचा। राष्ट्रीय गान बजते समय भी राज्यपाल के जाने से विवाद और बढ़ गया।
सिद्धारमैया का तीखा हमला
- घटना के तुरंत बाद मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने पत्रकारों से बातचीत में कहा,
- “राज्यपाल ने संविधान का उल्लंघन किया है।
- अनुच्छेद 176 और 163 के तहत उन्हें कैबिनेट द्वारा तैयार भाषण पढ़ना अनिवार्य था।
- उन्होंने अपना खुद का भाषण पढ़ा और कर्तव्य से विमुख हो गए।
- ” उन्होंने आगे कहा, “यह केंद्र सरकार की कठपुतली जैसा व्यवहार है।
- केंद्र अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए राज्यपाल को इस्तेमाल कर रहा है।
- हम उनके इस रवैये के खिलाफ विरोध करेंगे और सुप्रीम कोर्ट जाने पर विचार कर रहे हैं।”
सिद्धारमैया ने इसे लोकतंत्र के लिए काला दिन बताया। उन्होंने कहा कि राज्यपाल का यह कदम विधायकों का अपमान है और संवैधानिक पद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। कांग्रेस ने इसे केंद्र द्वारा राज्य सरकार को अस्थिर करने की साजिश करार दिया।
राज्यपाल की भूमिका और विवाद का इतिहास
भारतीय संविधान में राज्यपाल को केंद्र और राज्य के बीच सेतु माना जाता है, लेकिन कई गैर-बीजेपी शासित राज्यों में राज्यपालों पर केंद्र के इशारे पर काम करने का आरोप लगता रहा है। तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में भी राज्यपाल-सरकार टकराव की कई घटनाएं सामने आई हैं। कर्नाटक में भी यह पहली बार नहीं है। पहले भी बिलों पर हस्ताक्षर में देरी, विधेयकों को लंबित रखने जैसे मुद्दों पर विवाद हुआ है।
- इस घटना में राज्यपाल ने भाषण में केंद्र की आलोचना वाले हिस्सों को हटाने की मांग की,
- जो उनकी स्वतंत्रता दर्शाता है,
- लेकिन संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि अभिभाषण सरकार का होता है
- और राज्यपाल को इसे पढ़ना चाहिए। यदि असहमति है तो अन्य रास्ते अपनाए जा सकते थे, न कि सदन से वॉकआउट।
राजनीतिक प्रभाव और आगे क्या?
यह घटना कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और केंद्र की बीजेपी सरकार के बीच टकराव को और गहरा करेगी। विपक्षी बीजेपी ने राज्यपाल का समर्थन किया और कहा कि कांग्रेस सदन का दुरुपयोग कर रही है। बीजेपी नेता ने कहा कि राज्यपाल को कठपुतली बनाने की कोशिश कांग्रेस की है।
- यदि सिद्धारमैया सरकार सुप्रीम कोर्ट जाती है,
- तो यह मामला संवैधानिक व्याख्या का बड़ा मुद्दा बन सकता है।
- कोर्ट पहले भी राज्यपालों की भूमिका पर कई फैसले दे चुका है,
- जैसे बिलों पर समय सीमा और उनकी निष्क्रियता पर।
- यह फैसला अन्य राज्यों के लिए भी मिसाल बनेगा।
कर्नाटक की जनता इस राजनीतिक ड्रामे को देख रही है। विकास, बजट और योजनाओं पर चर्चा होनी चाहिए, लेकिन राज्यपाल-मुख्यमंत्री टकराव से विधायी कार्यवाही प्रभावित हो रही है। लोकतंत्र में संवैधानिक पदों की गरिमा बनाए रखना सभी की जिम्मेदारी है। उम्मीद है कि यह विवाद जल्द सुलझे और राजनीति विकास की राह पर लौटे।
