बौद्ध आरक्षण फ्रॉड सुप्रीम
बौद्ध आरक्षण फ्रॉड सुप्रीम कोर्ट में हंगामा! CJI ने हिंदू से बौद्ध बनकर आरक्षण मांगने को ‘नया फ्रॉड’ बताया। याचिका खारिज, धर्मांतरण और आरक्षण के नियमों पर बड़ा बयान।

सुप्रीम कोर्ट में 28 जनवरी 2026 को एक ऐसा मामला सुनाई दिया, जिसने न सिर्फ कोर्ट रूम में हंगामा मचा दिया, बल्कि पूरे देश में आरक्षण, धर्मांतरण और सामाजिक न्याय की बहस को नई हवा दी। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने एक याचिकाकर्ता के वकील पर तीखा हमला करते हुए कहा, “वाह! ये तो धोखाधड़ी का नया तरीका है… ये नया फ्रॉड है!” यह टिप्पणी तब आई जब एक जाट समुदाय (सामान्य वर्ग) के व्यक्ति ने बौद्ध धर्म अपनाकर अल्पसंख्यक आरक्षण का लाभ मांगने की कोशिश की। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को स्पष्ट रूप से “धोखा” करार दिया और हरियाणा सरकार से जवाब तलब किया। यह घटना आरक्षण व्यवस्था के दुरुपयोग पर न्यायपालिका की बढ़ती नाराजगी को बयां करती है।
बौद्ध आरक्षण फ्रॉड: मामला क्या है?
- याचिका हरियाणा के एक परिवार से जुड़ी है,
- जिसमें जाट समुदाय के कुछ भाई-बहनों ने हाल ही में बौद्ध धर्म अपनाया।
- उन्होंने दावा किया कि अब वे अल्पसंख्यक हैं,
- इसलिए उन्हें शिक्षा और नौकरी में अल्पसंख्यक कोटे का लाभ मिलना चाहिए।
- परिवार ने राज्य सरकार से अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र भी प्राप्त कर लिया था।
- इस प्रमाण पत्र के आधार पर वे विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं और प्रवेश प्रक्रियाओं में विशेष लाभ की मांग कर रहे थे।
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि “धर्म अपनाना उनका मौलिक अधिकार है” (अनुच्छेद 25 के तहत)। लेकिन CJI सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने इसे सीधे चुनौती दी। CJI ने पूछा, “आप पुनिया (जाट उपजाति) हैं, फिर अल्पसंख्यक कैसे?” वकील ने जवाब दिया, “बौद्ध धर्म अपना लिया है, यह हमारा अधिकार है।” इस पर CJI ने तीखी टिप्पणी की – “वाह! ये धोखाधड़ी है… ये नया फ्रॉड है!” कोर्ट ने इसे “आरक्षण का दुरुपयोग” और “संवैधानिक प्रावधानों के साथ छल” बताया।
कोर्ट ने क्या कहा और क्यों?
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में हरियाणा के मुख्य सचिव से जवाब मांगा है कि ऐसे प्रमाण पत्र कैसे जारी किए गए। पीठ ने स्पष्ट किया कि धर्मांतरण का अधिकार तो है, लेकिन इसका इस्तेमाल आरक्षण या अल्पसंख्यक लाभ हासिल करने के लिए “छल” के रूप में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति उच्च जाति से आता है और सिर्फ आरक्षण के लिए बौद्ध (या किसी अन्य अल्पसंख्यक धर्म) अपनाता है, तो यह सामाजिक न्याय की भावना के खिलाफ है।
- यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में SC/ST आरक्षण सिर्फ हिंदू,
- सिख और बौद्ध धर्म के लोगों को मिलता है (राष्ट्रपति आदेश 1950 के तहत),
- लेकिन अल्पसंख्यक संस्थानों में आरक्षण अलग नियमों से चलता है।
- याचिकाकर्ता इसी loophole का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे थे।
- कोर्ट ने इसे “नया फ्रॉड” कहकर स्पष्ट संदेश दिया कि ऐसी रणनीतियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी।
इस मामले के व्यापक प्रभाव
आरक्षण दुरुपयोग पर लगाम:
यह फैसला उन लोगों के लिए चेतावनी है जो धर्मांतरण को आरक्षण का हथियार बनाते हैं। पहले भी कई मामलों में (जैसे ईसाई धर्म अपनाकर SC/ST लाभ मांगने पर) अदालतें सख्त रुख अपना चुकी हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी हाल ही में कहा था कि SC/ST लाभ सिर्फ हिंदू/सिख/बौद्ध को मिल सकता है, अन्य धर्मों में नहीं।
हरियाणा सरकार पर दबाव:
- राज्य को अब प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया की जांच करनी होगी।
- अगर प्रमाण पत्र फर्जी या गलत आधार पर दिए गए,
- तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है।
सामाजिक बहस:
- यह मामला आरक्षण विरोधियों को नया हथियार दे सकता है,
- जो कहते हैं कि “आरक्षण का दुरुपयोग हो रहा है”।
- वहीं, सामाजिक न्याय के समर्थक इसे “
- अल्पसंख्यक अधिकारों पर हमला” मान सकते हैं।
- लेकिन कोर्ट का फोकस स्पष्ट है –
- संविधान का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
निष्कर्ष
CJI सूर्यकांत का “ये नया फ्रॉड है!” वाला बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि न्यायपालिका की सख्ती का प्रतीक है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि धर्मांतरण मौलिक अधिकार है, लेकिन आरक्षण या लाभ हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल “छल” नहीं बन सकता। यह मामला आने वाले समय में कई समान याचिकाओं पर असर डालेगा और शायद सरकार को अल्पसंख्यक प्रमाण पत्र जारी करने के नियमों में बदलाव करने की जरूरत पड़े।
आरक्षण व्यवस्था सामाजिक न्याय के लिए बनी है, न कि व्यक्तिगत लाभ के लिए। CJI का तीखा हमला इसी सिद्धांत की रक्षा करता है। अब हरियाणा सरकार का जवाब और कोर्ट की आगे की सुनवाई तय करेगी कि इस “नए फ्रॉड” पर क्या अंतिम फैसला होता है।
