भोजशाला मस्जिद विवाद
भोजशाला मस्जिद विवाद धार की 1000 साल पुरानी भोजशाला (माँ सरस्वती मंदिर) में कमाल मौला मस्जिद का विवाद, ASI रिपोर्ट में मंदिर अवशेषों से निर्माण का खुलासा। मुस्लिम शासकों के आगमन से शुरू टकराव की पूरी कहानी।

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद कॉम्प्लेक्स भारत की साझा सांस्कृतिक विरासत का एक जीवंत प्रमाण है। यह जगह करीब 1000 साल पुरानी है और राजा भोज की बौद्धिक परंपरा का प्रतीक मानी जाती है। हिंदू समुदाय इसे मां सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर और ज्ञान का केंद्र ‘भोजशाला’ मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमाल मौला मस्जिद कहता है। पिछले कुछ दशकों से यह स्थल कानूनी, ऐतिहासिक और धार्मिक विवाद का केंद्र बना हुआ है। हाल ही में पुरातत्व सर्वेक्षण ऑफ इंडिया (ASI) की रिपोर्ट ने इस बहस को नई दिशा दी है। इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि यह 1000 साल पुरानी संरचना मूल रूप से क्या थी, कमाल मौला मस्जिद कब और कैसे आई, और हिंदू-मुस्लिम टकराव के पीछे क्या कारण हैं।
भोजशाला का गौरवशाली इतिहास
भोजशाला की नींव परमार वंश के महान राजा भोज (शासनकाल लगभग 1000-1055 ई.) ने रखी। राजा भोज को 72 कलाओं और 36 शस्त्र विद्याओं का ज्ञाता माना जाता था। उन्होंने धार को शिक्षा और संस्कृति का केंद्र बनाया। 1034 ई. के आसपास स्थापित यह भवन एक विशाल ज्ञान मंदिर और संस्कृत विश्वविद्यालय की तरह था, जहां व्याकरण, काव्य, ज्योतिष, वास्तुशास्त्र जैसी विद्याएं पढ़ाई जाती थीं।
यहां मां सरस्वती की मूर्ति स्थापित थी। वसंत पंचमी पर विशेष पूजा होती थी। पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के अनुसार, भवन में लाल बलुआ पत्थर के नक्काशीदार स्तंभ, जालीदार खिड़कियां, यज्ञ कुंड और देवी-देवताओं की मूर्तियां थीं। 1903 में शिक्षा अधिकारी के.के. लेल ने यहां संस्कृत और प्राकृत शिलालेखों की खोज की, जिनमें नागकर्णिका (सर्पाकार) शिलालेख व्याकरण के नियमों को दर्शाते हैं। इनमें राजा नरवर्मन और उदयादित्य के काल के शिलालेख भी हैं।
भोजशाला को ‘भोज का हॉल’ या ‘सरस्वती मंदिर’ कहा जाता था। मेरुतुंग के प्रबंधचिंतामणि ग्रंथ में राजा भोज की विद्वता का उल्लेख है। यह स्थान नालंदा और तक्षशिला जैसा शिक्षा केंद्र था, जहां जैन, शैव और वैष्णव विद्वान आते थे। 12वीं-13वीं शताब्दी तक यह फल-फूल रहा। परमार वंश के पतन के बाद क्षेत्र में सल्तनत का प्रभाव बढ़ा।
कमाल मौला मस्जिद कब आई?
मूल संरचना हिंदू मंदिर/शिक्षा केंद्र थी, लेकिन 14वीं शताब्दी में इसे मस्जिद में बदला गया। दिल्ली सल्तनत के अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण (1305 ई.) के बाद मालवा क्षेत्र पर मुस्लिम शासन स्थापित हुआ। चिश्ती सूफी संत कमालुद्दीन (मृत्यु लगभग 1331 ई.) का मकबरा भवन के पास बनाया गया। इसी कारण यह ‘कमाल मौला मस्जिद’ कहलाने लगा।
विकिपीडिया और ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार, मस्जिद का निर्माण 1304-1331 ई. के बीच हुआ। 1392-93 ई. (हिजरी 795) में दिलावर खान (मालवा सल्तनत के पहले शासक) ने मस्जिद की मरम्मत कराई। उनके शिलालेख में मिहराब और मिंबर जोड़ने का उल्लेख है। मूल स्तंभ 12वीं-13वीं शताब्दी के हिंदू काल के हैं, जिन्हें दोबारा इस्तेमाल किया गया। गुंबद और इस्लामी तत्व बाद में जोड़े गए।
- 1514 ई. में महमूद शाह खिलजी द्वितीय ने इसे मस्जिद बनाने का प्रयास किया।
- संत कमाल मौला की मौत 1331 में हुई थी, लेकिन बाद में मकबरा जुड़ा।
- इस तरह मूल भवन (भोजशाला) को मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया।
- ASI के अनुसार, यह परिवर्तन पुरानी संरचना को तोड़कर उसके हिस्सों से किया गया।
भोजशाला मस्जिद विवाद: ASI सर्वे रिपोर्ट
मार्च 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट (इंदौर बेंच) के आदेश पर ASI ने 98 दिन का वैज्ञानिक सर्वे किया। जुलाई 2024 में 10 खंडों वाली 2000 पृष्ठों की रिपोर्ट सौंपी गई। फरवरी 2026 में रिपोर्ट की डिटेल्स सार्वजनिक चर्चा में आईं।
ASI की मुख्य निष्कर्ष:
- मौजूदा मस्जिद संरचना परमार काल (950-1000 साल पुरानी) की पूर्व-मौजूद मंदिर संरचना के हिस्सों से बनी।
- 94 मूर्तियां और टुकड़े मिले – गणेश, ब्रह्मा, नरसिंह, भैरव आदि देवी-देवता, पशु-पक्षी। कई मूर्तियां तोड़ी या चेहरे मिटाए गए।
- संस्कृत-प्राकृत शिलालेख, ‘ॐ नमः शिवाय’ जैसे अंकन।
- मस्जिद बिना समरूपता, डिजाइन या यूनिफॉर्मिटी के बनाई गई – पुरानी सामग्री का पुन: उपयोग।
- स्थल पर साहित्यिक-शैक्षिक गतिविधियां होती थीं, जो सरस्वती मंदिर से जुड़ी हो सकती हैं।
यह रिपोर्ट हिंदू पक्ष के दावे को मजबूत करती है कि मूल रूप से यह मंदिर था, जिसे बाद में मस्जिद बनाया गया। मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद मानता है और रिपोर्ट पर आपत्ति दर्ज करने की तैयारी में है। कोर्ट ने दोनों पक्षों को 2 सप्ताह में जवाब दाखिल करने को कहा है (अगली सुनवाई मार्च 2026)।
हिंदू-मुस्लिम टकराव के कारण
- टकराव की जड़ ऐतिहासिक, धार्मिक और राजनीतिक है।
- हिंदू पक्ष कहता है – राजा भोज का मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाई गई,
- सरस्वती मूर्ति 1857 में ब्रिटिश ले गए (अब लंदन में)।
- वे पूर्ण पूजा अधिकार और मूल स्वरूप बहाली चाहते हैं।
- मुस्लिम पक्ष का तर्क – यह 14वीं शताब्दी की मस्जिद है,
- सूफी संत कमाल मौला से जुड़ी।
- 1902 से ASI रिकॉर्ड में मस्जिद दर्ज। वे कहते हैं कि कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया,
- बल्कि जगह साझा रही।
- 2003 के ASI आदेश से मंगलवार को हिंदू पूजा,
- शुक्रवार को मुस्लिम नमाज (1-3 बजे)। वसंत पंचमी पर हिंदू पूर्ण अधिकार।
- लेकिन जब तिथियां टकराती हैं, तो तनाव बढ़ जाता है –
- 2013, 2016 में झड़पें हुईं। लाठीचार्ज और पुलिस फायरिंग के मामले भी दर्ज।
विवाद राजनीतिक रूप ले लेता है। एक तरफ सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक न्याय की मांग, दूसरी तरफ धार्मिक स्थल की रक्षा। Places of Worship Act 1991 और ASI नियम भी लागू हैं। ASI रिपोर्ट के बाद बहस तेज हुई है।
वर्तमान स्थिति और भविष्य
- आज भोजशाला ASI संरक्षित राष्ट्रीय स्मारक है।
- दोनों समुदाय सीमित पूजा करते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने भी 2026 में साझा पूजा की अनुमति दी।
- लेकिन रिपोर्ट के बाद हिंदू संगठन पूर्ण अधिकार की मांग कर रहे हैं,
- मुस्लिम पक्ष कानूनी लड़ाई जारी रखेगा।
- यह विवाद सिर्फ एक इमारत का नहीं, बल्कि भारत की साझा विरासत का है।
- इतिहास में आक्रमण, परिवर्तन और पुनर्निर्माण आम थे।
- आज जरूरत है संवाद, कानूनी प्रक्रिया और सौहार्द की।
- ASI रिपोर्ट तथ्यों पर रोशनी डाल रही है।
- कोर्ट जो फैसला देगा, उसे दोनों पक्ष सम्मान दें।
भोजशाला हमें सिखाती है कि ज्ञान और आस्था साझा हो सकती है। राजा भोज की विरासत को संरक्षित रखते हुए, हम एकता का संदेश दे सकते हैं। वसंत पंचमी पर सरस्वती पूजा और शुक्रवार की नमाज – दोनों जगह शांति से हों, यही सच्ची विरासत होगी।
