जस्टिस वर्मा जांच
जस्टिस वर्मा जांच कैश कांड के आरोपी जस्टिस वर्मा मामले में जांच समिति में अहम बदलाव किया गया है। नए सदस्यों को शामिल कर जांच प्रक्रिया को तेज करने की तैयारी है। जानिए कौन हैं नई टीम में और क्या पड़ सकता है इसका असर।

भारतीय न्यायपालिका में भ्रष्टाचार के आरोपों का मामला हमेशा सुर्खियों में रहता है, क्योंकि यह न केवल एक व्यक्ति की छवि को प्रभावित करता है, बल्कि पूरे न्याय तंत्र की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। इसी कड़ी में इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा का कैश कांड (Cash-at-Home Controversy) पिछले एक साल से ज्यादा समय से चर्चा में है।
मार्च 2025 में दिल्ली में उनके आधिकारिक आवास पर लगी आग के दौरान स्टोर रूम से बड़ी मात्रा में आधे जले हुए नोटों के ढेर मिलने की खबर ने पूरे देश को हिला दिया था। इस घटना ने न्यायिक नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी। अब इस मामले में एक नया ट्विस्ट आया है – जांच पैनल में बदलाव! लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने तीन सदस्यीय जांच समिति का पुनर्गठन किया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह केस क्या है, जांच कैसे आगे बढ़ी और अब नई समिति में कौन-कौन शामिल हैं।
जस्टिस वर्मा जांच: पूरा मामला क्या है?
सबसे पहले घटना की पृष्ठभूमि समझते हैं। मार्च 2025 की 14 तारीख की रात को दिल्ली के तुगलक क्रिसेंट स्थित जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास में आग लग गई। फायर ब्रिगेड और पुलिस जब मौके पर पहुंचे, तो उन्होंने स्टोर रूम में बड़ी संख्या में जले हुए और आधे जले 500 रुपये के नोटों के ढेर देखे। यह रकम लाखों-करोड़ों में बताई गई। जस्टिस वर्मा उस समय दिल्ली हाईकोर्ट के जज थे, लेकिन इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट ट्रांसफर कर दिया। जस्टिस वर्मा ने दावा किया कि यह नकदी उनकी या उनके परिवार की नहीं थी, और स्टोर रूम पर उनका नियंत्रण नहीं था। लेकिन गवाहों के बयान, वीडियो फुटेज और अन्य सबूतों ने मामले को और जटिल बना दिया।
- सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने 22 मार्च 2025 को एक
- तीन सदस्यीय इन-हाउस जांच समिति गठित की।
- इस समिति में पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस शील नागू (अध्यक्ष),
- हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस जी.एस. संधवालिया और कर्नाटक
- हाईकोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल थीं।
- समिति ने 55 गवाहों के बयान दर्ज किए, मौके का निरीक्षण किया
- और 64 पेज की रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा को गंभीर कदाचार का दोषी पाया।
- रिपोर्ट में कहा गया कि स्टोर रूम पर उनका “सक्रिय या मौन नियंत्रण” था,
- और नकदी की मौजूदगी की कोई संतोषजनक व्याख्या नहीं दी गई।
- इस आधार पर पूर्व सीजेआई ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को जस्टिस वर्मा को हटाने की सिफारिश की।
महाभियोग की प्रक्रिया और संसदीय जांच
संविधान के अनुच्छेद 124(4) के तहत उच्च न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के जज को केवल “सिद्ध कदाचार या अक्षमता” के आधार पर संसद द्वारा महाभियोग से हटाया जा सकता है। इन-हाउस रिपोर्ट के बाद जुलाई 2025 में लोकसभा में 146 से ज्यादा सांसदों (राहुल गांधी, रविशंकर प्रसाद सहित) ने जस्टिस वर्मा को हटाने का प्रस्ताव पेश किया। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने 12 अगस्त 2025 को जजेस (इंक्वायरी) एक्ट, 1968 के तहत तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की।
इस मूल समिति में शामिल थे:
- सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार
- मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मनींद्र मोहन श्रीवास्तव
- कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य
जस्टिस वर्मा ने इस समिति की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इससे जांच आगे बढ़ी।
नई एंट्री: जांच पैनल में बदलाव क्यों और कौन शामिल?
- फरवरी 2026 में लोकसभा स्पीकर ने समिति का पुनर्गठन किया।
- कारण – मद्रास हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस मनींद्र मोहन श्रीवास्तव 6 मार्च 2026 को रिटायर होने वाले हैं।
- इसलिए उनकी जगह बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर को शामिल किया गया है।
अब नई जांच समिति में शामिल सदस्य:
- सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार (जारी रहेंगे)
- बॉम्बे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर (नए सदस्य)
- वरिष्ठ अधिवक्ता बी.वी. आचार्य (जारी रहेंगे)
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि समिति अब नए सिरे से या मौजूदा सबूतों पर आगे बढ़ेगी। सवाल उठ रहा है कि क्या पहले दर्ज बयानों को दोबारा जांचा जाएगा या पुरानी प्रक्रिया जारी रहेगी। यह महाभियोग प्रक्रिया को और मजबूत बनाएगा, क्योंकि जजेस (इंक्वायरी) एक्ट के तहत समिति की रिपोर्ट संसद में पेश की जाएगी और दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत से हटाने का फैसला होगा।
न्यायपालिका की छवि पर असर
- यह मामला न्यायपालिका की स्वच्छता और जनता के भरोसे से जुड़ा है।
- एक तरफ जस्टिस वर्मा जांच में सहयोग कर रहे हैं और कानूनी प्रक्रिया का पालन कर रहे हैं,
- वहीं दूसरी तरफ सबूतों की गंभीरता ने सवाल खड़े किए हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि जजों से नैतिकता की उम्मीद बहुत ऊंची होती है।
- यह केस न केवल जस्टिस वर्मा के भविष्य को प्रभावित करेगा,
- बल्कि भविष्य में ऐसे मामलों के लिए मिसाल भी बनेगा।
अंत में, जांच समिति का पुनर्गठन दिखाता है कि प्रक्रिया निष्पक्ष और तेजी से चल रही है। उम्मीद है कि जल्द ही सच्चाई सामने आएगी और न्याय होगा। न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
