CJI Midnight Petition Row
CJI Midnight Petition Row आधी रात को दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI ने तीखी टिप्पणी करते हुए वकील से बड़ा सवाल पूछा। कोर्ट ने न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर नाराजगी जताई। मामले ने कानूनी हलकों और राजनीति में नई बहस छेड़ दी।

सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया में एक बार फिर न्यायिक समय की कीमत और PIL संस्कृति पर गंभीर सवाल उठे हैं। सोमवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने एक वकील द्वारा दायर की गई जनहित याचिका (PIL) को सुनते-सुनते भड़क गए। याचिका का विषय था – प्याज और लहसुन में ‘तामसिक’ (तमोगुणी या नेगेटिव) तत्व हैं या नहीं, इसकी वैज्ञानिक रिसर्च कराने के लिए कमिटी गठित करना। CJI ने साफ कहा, “आधी रात को ये सब याचिकाएं ड्राफ्ट करते हो क्या?” यह टिप्पणी न सिर्फ उस याचिकाकर्ता के लिए, बल्कि पूरे बार और PIL दाखिल करने वालों के लिए एक चेतावनी बन गई।
CJI Midnight Petition Row : घटना का पूरा विवरण
- मामला CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोयमलया बागची की बेंच के सामने आया।
- याचिकाकर्ता एक वकील थे, जो पार्टी-इन-पर्सन (खुद अपनी तरफ से) पेश हुए।
- याचिका में मांग की गई थी कि सरकार एक विशेषज्ञ समिति बनाए
- जो यह रिसर्च करे कि प्याज-लहसुन जैन समुदाय की भावनाओं के अनुरूप ‘तामसिक’ हैं या नहीं।
- याचिकाकर्ता ने गुजरात हाईकोर्ट में हाल ही हुए एक डिवोर्स केस का हवाला दिया,
- जिसमें प्याज खाने को लेकर पति-पत्नी में विवाद हुआ था।
CJI सूर्यकांत ने तुरंत सवाल दागा – “आप जैन लोगों की भावनाओं को ठेस क्यों पहुंचाना चाहते हैं?” याचिकाकर्ता ने जवाब दिया कि यह मुद्दा आम है और समाज में चर्चा में है। लेकिन कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ। CJI ने याचिका को “नॉन-एप्लिकेशन ऑफ माइंड” (दिमाग न लगाकर लिखी गई) करार दिया। उन्होंने कहा कि प्रार्थनाएं अस्पष्ट हैं, बेबुनियाद हैं और खराब ड्राफ्टिंग का उदाहरण हैं।
- CJI की तीखी टिप्पणी और भी आगे बढ़ी –
- “अगर आप वकील नहीं होते तो हम भारी जुर्माना लगा देते।”
- कोर्ट ने साफ चेतावनी दी कि ऐसे फ्रिवोलस (तुच्छ) मामलों से सुप्रीम कोर्ट पर अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है।
- अंत में याचिका को खारिज कर दिया गया।
एक वकील की चार PILs – सारे खारिज!
यह कोई इकलौता मामला नहीं था। उसी याचिकाकर्ता ने उसी दिन तीन और PILs दाखिल की थीं। उनमें शामिल थे:
- शराब और तंबाकू उत्पादों में हानिकारक पदार्थों पर नियंत्रण
- प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाने की मांग
- क्लासिकल भाषाओं की घोषणा के लिए गाइडलाइंस
सभी कोर्ट ने एक साथ खारिज कर दीं। CJI ने टिप्पणी की कि ये याचिकाएं “वैग” (अस्पष्ट) और “फ्रिवोलस” हैं, जो न्यायिक समय की बर्बादी हैं।
PIL कल्चर पर बड़ा सवाल: क्या हो रहा है?
CJI Midnight Petition Row: यह घटना PIL दाखिल करने की संस्कृति पर गंभीर सवाल उठाती है। भारत में सुप्रीम कोर्ट Article 32 के तहत हर नागरिक को मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे याचिका दाखिल करने का अधिकार देता है। लेकिन पिछले कुछ सालों में फ्रिवोलस PILs की संख्या इतनी बढ़ गई है कि CJI बार-बार चेतावनी दे चुके हैं।
- 2024-25 में सुप्रीम कोर्ट ने सैकड़ों PILs को “मिसयूज ऑफ PIL” कहकर खारिज किया।
- कई PILs व्यक्तिगत रंजिश, राजनीतिक मकसद या बिना रिसर्च के दाखिल होती हैं।
- CJI सूर्यकांत ने पहले भी कहा था कि PIL अब “Public Interest Litigation” नहीं बल्कि “Private Interest Litigation” या “Publicity Interest Litigation” बन गई है।
इस मामले में CJI का सवाल “आधी रात को ड्राफ्ट करते हो क्या?” बहुत गहरा है। यह इशारा करता है कि याचिकाएं बिना सोचे-समझे, रातों-रात तैयार की जा रही हैं। अच्छी ड्राफ्टिंग, सही कानूनी आधार और स्पष्ट राहत की मांग – ये बुनियादी शर्तें भी पूरी नहीं हो रही हैं।
न्यायपालिका का बोझ और समाधान की जरूरत
- सुप्रीम कोर्ट में रोजाना हजारों याचिकाएं आती हैं।
- CJI सूर्यकांत और जस्टिस बागची की बेंच ने साफ कहा –
- “ऐसे मामले कोर्ट का समय बर्बाद करते हैं।”
- अगर हर छोटे-मोटे मुद्दे पर PIL दाखिल होगी तो असली जनहित के मामले
- (जैसे प्रदूषण, महिला सुरक्षा, किसान अधिकार) पीछे छूट जाएंगे।
समाधान के रूप में कई सुझाव आ रहे हैं:
- फ्रिवोलस PIL पर भारी कॉस्ट लगाना
- याचिकाकर्ता को पहले हाईकोर्ट जाना अनिवार्य करना
- वकीलों के लिए PIL ड्राफ्टिंग पर ट्रेनिंग कोर्स
- रजिस्ट्री स्तर पर प्रारंभिक स्क्रीनिंग बढ़ाना
निष्कर्ष
- CJI सूर्यकांत की यह तीखी टिप्पणी कोई व्यक्तिगत गुस्सा नहीं,
- बल्कि संस्था की गरिमा और समय की रक्षा का प्रयास है।
- सुप्रीम कोर्ट भारत का सबसे ऊंचा न्यायालय है।
- यहां हर याचिका का सम्मान होना चाहिए, लेकिन तभी जब वह सच्चे जनहित की हो।
जैन समुदाय की भावनाओं का सम्मान हर भारतीय का कर्तव्य है, लेकिन इसके लिए वैज्ञानिक रिसर्च की PIL दाखिल करना उचित माध्यम नहीं। ऐसे मुद्दे सामाजिक संवाद, वैज्ञानिक शोध संस्थानों या संसद के माध्यम से हल किए जा सकते हैं।
अंत में एक सवाल हर वकील और नागरिक से – क्या हम सुप्रीम कोर्ट को PIL का दुरुपयोग करने देंगे या इसे असली जनहित की आवाज बनाए रखेंगे?
यह घटना हमें याद दिलाती है कि न्याय केवल फैसले से नहीं, बल्कि प्रक्रिया की शुद्धता और समय के सम्मान से भी मिलता है। CJI सूर्यकांत का संदेश साफ है – “अब और बर्दाश्त नहीं होगा।”
