कॉलेजियम बैठक विवाद
कॉलेजियम बैठक विवाद सुप्रीम कोर्ट के एक जस्टिस ने कॉलेजियम प्रणाली को लेकर बड़ा सवाल खड़ा किया है। उन्होंने कहा कि कई जजों को भी नहीं पता कि कॉलेजियम की बैठक कहां होती है। इस बयान के बाद न्यायपालिका में पारदर्शिता पर बहस तेज हो गई है।

भारतीय न्यायपालिका की सबसे चर्चित और विवादास्पद प्रणाली है – कॉलेजियम सिस्टम। जज खुद जजों की नियुक्ति करते हैं, यह बात कई लोगों को आश्चर्य में डाल देती है। लेकिन अब खुद सुप्रीम कोर्ट के एक वरिष्ठ जस्टिस ने इस सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 9 मार्च 2026 को महिला दिवस के मौके पर इंडियन वुमेन इन लॉ द्वारा नई दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में जस्टिस दीपांकर दत्ता ने जोरदार बयान दिया – “आपको यह जानकर हैरानी होगी कि हमें न सिर्फ यह नहीं पता कि अंदर क्या चल रहा है, बल्कि कई बार यह भी नहीं पता होता कि कॉलेजियम की बैठक कहां हो रही है।”
यह बयान सिर्फ एक जज का व्यक्तिगत विचार नहीं है। यह पूरे कॉलेजियम सिस्टम की अस्पष्टता और बंद कमरों में होने वाली प्रक्रिया पर एक बड़ा सवाल है। जिस सिस्टम को न्यायपालिका की स्वतंत्रता का रक्षक माना जाता है, उसी पर अब सुप्रीम कोर्ट के अंदर से आवाज उठ रही है। इस बयान के बाद देशभर में चर्चा तेज हो गई है – क्या कॉलेजियम सिस्टम को और पारदर्शी बनाना चाहिए? क्या बैठकें अब भी सीजेआई के चैंबर या सुप्रीम कोर्ट के किसी गुप्त हॉल में ही होती हैं? और सबसे बड़ा सवाल – क्या यह सिस्टम अब सुधार की मांग कर रहा है?
कॉलेजियम बैठक विवाद : कॉलेजियम सिस्टम क्या है और यह कैसे काम करता है?
- कॉलेजियम सिस्टम भारत का अनोखा न्यायिक आविष्कार है।
- संविधान में इसके लिए कोई प्रावधान नहीं है।
- यह 1993 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से शुरू हुआ और 1998 के थर्ड जजेस केस में और मजबूत हुआ।
- इसमें सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए
- चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) के नेतृत्व में चार वरिष्ठतम जजों का समूह तय करता है।
- हाई कोर्ट के लिए भी यही प्रक्रिया है।
- सरकार सिर्फ नामों को मंजूरी देती है या आपत्ति दर्ज करती है,
- लेकिन अंतिम फैसला जजों का होता है।
इस सिस्टम का उद्देश्य था – कार्यपालिका के हस्तक्षेप से न्यायपालिका को बचाना। 1970-80 के दशक में इंदिरा गांधी सरकार के समय जजों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप देखा गया था। इसलिए 1981 के फर्स्ट जजेस केस और बाद के फैसलों ने जजों को नियुक्ति की शक्ति सौंपी। लेकिन 2014 में मोदी सरकार ने नेशनल ज्यूडिशियल अपॉइंटमेंट्स कमीशन (NJAC) कानून लाया, जिसमें सरकार और जजों का बराबर प्रतिनिधित्व होता। सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में इसे असंवैधानिक करार देकर रद्द कर दिया। तब से कॉलेजियम फिर से चालू है।
लेकिन समस्या यह है कि यह सिस्टम पूरी तरह अपारदर्शी है। कोई आधिकारिक वेबसाइट नहीं बताती कि बैठक कब और कहां हुई। रेजोल्यूशन तो बाद में जारी होते हैं, लेकिन चर्चा, बहस और वोटिंग का ब्योरा कभी सार्वजनिक नहीं होता। RTI एक्ट भी यहां सीमित है। सिर्फ अंतिम फैसला ही सार्वजनिक होता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता का बयान: सिस्टम की असली तस्वीर
#जस्टिस दीपांकर दत्ता, जो पहले बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके हैं, ने सम्मेलन में महिलाओं के प्रतिनिधित्व पर बात करते हुए अचानक कॉलेजियम की पारदर्शिता पर हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि जजों को भी नहीं पता कि बैठक कहां हो रही है। “हम ये तक नहीं जानते कि कॉलेजियम बैठता कहां है।” यह बयान बार एंड बेंच समेत कई मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर छा गया।
- जस्टिस दत्ता ने आगे कहा कि नियुक्तियां मेरिट पर होनी चाहिए,
- न कि सिर्फ लिंग या क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व के आंकड़ों पर।
- उन्होंने अपने बॉम्बे हाई कोर्ट के अनुभव साझा किए –
- जहां वस्तुनिष्ठ मानदंड नहीं होने से जजों को व्यक्तिगत आकलन पर निर्भर रहना पड़ता था।
- एक महिला वकील को अपरिपक्व मानकर उन्होंने प्रमोशन की सिफारिश ठुकरा दी थी।
- उन्होंने यह भी बताया कि हाई कोर्ट के जज सुप्रीम कोर्ट के
- अनुरोधों का विरोध करने में हिचकिचाते हैं।
- हाल ही में एक महिला जज की असहमति के बावजूद नियुक्ति हो गई।
कॉलेजियम बैठक विवाद: यह बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पहली बार नहीं है जब कॉलेजियम की आंतरिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठे हैं। पहले जस्टिस बी.वी. नागरत्ना ने जस्टिस विपुल पंचोली की सुप्रीम कोर्ट नियुक्ति पर असहमति जताई थी। जस्टिस नागरत्ना ने लिखित नोट में कहा था कि यह नियुक्ति न्यायपालिका के लिए नुकसानदायक हो सकती है। लेकिन असहमति को सार्वजनिक नहीं किया गया। CJAR (कैम्पेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म) ने इसे छिपाने का आरोप लगाया।
बैठकें कहां होती हैं? सच क्या है?
आमतौर पर लोग सोचते हैं कि कॉलेजियम की बैठकें सुप्रीम कोर्ट के किसी बड़े हॉल में औपचारिक रूप से होती होंगी। लेकिन हकीकत अलग है। सूत्रों और पुरानी रिपोर्ट्स के मुताबिक, ये बैठकें अक्सर सीजेआई के चैंबर में, कॉन्फ्रेंस रूम में या कभी-कभी किसी जज के चैंबर में अनौपचारिक रूप से होती हैं। कोई फिक्स्ड वेन्यू या शेड्यूल नहीं। कोई मिनट्स ऑफ मीटिंग पब्लिक नहीं किए जाते। यही कारण है कि जस्टिस दत्ता जैसे वरिष्ठ जज को भी नहीं पता चलता कि बैठक कहां हो रही है।
- यह अस्पष्टता सिस्टम को संदेह के घेरे में डालती है।
- विपक्ष और कानून विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि यह
- “बंद कमरों में चाय पर फैसले” जैसा लगता है।
- जबकि सरकार बार-बार कहती है कि
- कॉलेजियम में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत है।
चर्चा क्यों तेज हुई? सुधार की मांग
जस्टिस दत्ता के बयान के बाद सोशल मीडिया, कानूनी समुदाय और मीडिया में बहस छिड़ गई है। कुछ लोग कह रहे हैं कि अब NJAC जैसा नया मॉडल लाया जाए, जिसमें सिविल सोसाइटी और सरकार का प्रतिनिधित्व हो। लेकिन न्यायपालिका इसे स्वतंत्रता पर हमला मानती है।
दूसरी तरफ, कई रिटायर्ड जज जैसे जस्टिस चेलामेश्वर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने पहले भी कॉलेजियम की आलोचना की थी। जस्टिस रंजन गोगोई ने भी कहा था कि सिस्टम में सुधार जरूरी है। अब 2026 में जब सुप्रीम कोर्ट में कई पद खाली हैं और नए CJI सूर्यकांत के नेतृत्व में कॉलेजियम काम कर रहा है, तो यह बहस और प्रासंगिक हो गई है।
क्या समाधान है? विशेषज्ञ सुझाव देते हैं –
- बैठक के रेजोल्यूशन के साथ चर्चा का सारांश सार्वजनिक करें।
- मेरिट के वस्तुनिष्ठ मानदंड बनाएं (जैसे जजमेंट्स की गुणवत्ता, केस डिस्पोजल रेट)।
- महिलाओं और पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण नहीं, लेकिन प्रोत्साहन।
- RTI में कॉलेजियम को और खुला बनाना।
निष्कर्ष: न्यायपालिका की आत्म-चिंतन का समय
जस्टिस दीपांकर दत्ता का बयान एक चेतावनी है। यह दिखाता है कि न्यायपालिका खुद अपनी कमियों को स्वीकार कर रही है। कॉलेजियम सिस्टम ने पिछले 30 साल में हजारों योग्य जज दिए हैं, लेकिन पारदर्शिता की कमी से इसका विश्वासघात हो रहा है। अगर सिस्टम पर चर्चा तेज हुई है, तो इसका मतलब है कि बदलाव की बुनियाद तैयार हो रही है।
- हमें याद रखना चाहिए – न्यायपालिका लोकतंत्र का स्तंभ है।
- लेकिन स्तंभ भी तभी मजबूत रहता है जब उसमें रोशनी हो।
- कॉलेजियम की बैठक कहां होती है, यह सवाल अब सिर्फ एक जज का नहीं,
- पूरे देश का है। सुधार की दिशा में कदम उठाए जाएं, तो न्याय की मशाल और चमकेगी।
कॉलेजियम बैठक विवाद: यह बहस जारी रहेगी। लेकिन एक बात तय है – जस्टिस दत्ता ने जो सवाल उठाया, वह अनसुना नहीं रहेगा। न्यायपालिका को अब खुद को आईने में देखने का समय आ गया है।
