CJI वकील फटकार
CJI वकील फटकार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI एक नए वकील की याचिका देखकर नाराज हो गए। उन्होंने सख्त लहजे में कहा कि वह इन मामलों में काफी रूढ़िवादी हैं। कोर्ट में हुई इस टिप्पणी के बाद मामला चर्चा का विषय बन गया।

सुप्रीम कोर्ट में एक बार फिर से न्यायिक गरिमा और वकीलों की जिम्मेदारी का मुद्दा चर्चा में आ गया है। 9 मार्च 2026 को मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक वकील द्वारा दायर की गई जनहित याचिकाओं को देखकर नाराजगी जताई। याचिका इतनी अस्पष्ट और निरर्थक थी कि CJI ने नए वकील को सीधे फटकार लगाते हुए कहा, “क्या आप लोग आधी रात को ऐसी याचिकाएं ड्राफ्ट करते हो?” उन्होंने साफ-साफ चेतावनी दी कि वे इन फ्रिवोलस मामलों में बेहद सख्त हैं और भविष्य में भारी जुर्माना लग सकता है।
यह घटना सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री पर अनावश्यक बोझ कम करने और न्यायिक प्रक्रिया को गंभीर रखने की दिशा में CJI सूर्यकांत की सख्ती का नया उदाहरण बन गई है।
CJI वकील फटकार : घटना का पूरा विवरण
सोमवार को CJI सूर्यकांत और जस्टिस जयमोल बागची की बेंच के सामने एक याचिका आई, जिसमें शराब की तय मात्रा निर्धारित करने, तामसिक भोजन (जैसे प्याज-लहसुन) पर नियम बनाने और प्रॉपर्टी रजिस्ट्रेशन से जुड़े मुद्दों की मांग की गई थी। याचिका का स्वरूप इतना अस्पष्ट था कि एक ही दस्तावेज में कई अनसंबंधित विषय घुसा दिए गए थे।
- CJI सूर्यकांत ने याचिका पढ़ते ही नाराजगी जाहिर की।
- उन्होंने वकील से सीधे पूछा, “क्या आप लोग ऐसी याचिकाएं आधी रात को ड्राफ्ट करते हैं?”
- पीठ ने याचिका को “बिना दिमाग लगाए दायर की गई”
- बताते हुए तुरंत खारिज कर दिया। CJI ने कहा कि मांगें स्पष्ट नहीं हैं,
- कोई ठोस आधार नहीं है और यह अदालत पर अनावश्यक बोझ है।
खास बात यह थी कि याचिका दायर करने वाला वकील खुद पिटीशनर भी था। CJI ने सख्त लहजे में कहा कि अगर याचिकाकर्ता वकील नहीं होता तो भारी जुर्माने के साथ खारिज किया जाता। उन्होंने चेतावनी दी, “अगली बार ऐसी कैजुअल ड्राफ्टिंग पर सख्त कार्रवाई होगी।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसी सुनवाई के दौरान CJI ने स्पष्ट शब्दों में कहा – “मैं इन मामलों में सख्त हूं।”
- यह घटना मात्र एक याचिका तक सीमित नहीं थी।
- कुछ रिपोर्ट्स में बताया गया कि एक ही वकील (सचिन गुप्ता)
- द्वारा दायर पांच ऐसी फ्रिवोलस PILs खारिज की गईं,
- जिनमें से एक प्याज-लहसुन में ‘तामसिक एनर्जी’ की वैज्ञानिक स्टडी कराने की मांग वाली थी।
- CJI ने इन्हें “अस्पष्ट, निरर्थक और निराधार” करार दिया।
CJI सूर्यकांत की सख्ती: क्यों बढ़ रही है फटकार?
यह पहली बार नहीं है जब CJI जस्टिस सूर्यकांत ने फ्रिवोलस याचिकाओं पर नाराजगी जताई हो। हाल के महीनों में उन्होंने कई बार वकीलों को चेतावनी दी है कि सुप्रीम कोर्ट जनहित याचिकाओं का कचरा-कुंडी नहीं है।
- पिछले दिनों उन्होंने AI से लिखी गई याचिकाओं पर भी आपत्ति जताई थी।
- एक मामले में तो 12वीं पास याचिकाकर्ता ने AI की मदद से PIL दायर की थी,
- जिस पर CJI ने मजाकिया अंदाज में कहा था कि अदालत में इंग्लिश का टेस्ट ले लेंगे।
CJI का मानना है कि फ्रिवोलस PILs से:
- गंभीर मुद्दों की सुनवाई में देरी होती है
- अदालत का समय बर्बाद होता है
- वकीलों की जिम्मेदारी का हनन होता है
उन्होंने साफ कहा है कि वकील की जिम्मेदारी है कि वह याचिका में तथ्य, कानून और स्पष्ट मांग रखे। बिना सोचे-समझे दायर की गई याचिका पर भविष्य में न सिर्फ खारिजगी, बल्कि भारी लागत (exemplary costs) भी लगाई जाएगी।
वकीलों पर बढ़ती जिम्मेदारी और न्यायिक सुधार
- यह घटना वकील समुदाय के लिए चेतावनी का संकेत है।
- सुप्रीम कोर्ट बार काउंसिल और वरिष्ठ वकील कई बार कह चुके हैं
- कि फ्रिवोलस PILs से अदालत की गरिमा प्रभावित होती है।
- CJI सूर्यकांत की इस सख्ती को कई लोग सराह रहे हैं।
- एक वरिष्ठ वकील ने कहा, “CJI सही कह रहे हैं।
- हर छोटी-मोटी बात पर आर्टिकल 32 के तहत PIL दायर करना गलत है।
- इससे असली पीड़ितों को न्याय मिलने में देरी होती है।”
- दूसरी ओर, कुछ युवा वकील मानते हैं कि नए वकीलों को गाइडेंस की जरूरत है।
- CJI ने भी संकेत दिया है कि वे सही याचिकाओं का स्वागत करते हैं,
- लेकिन बिना तैयारी के मामलों पर सख्त रहेंगे।
निष्कर्ष
CJI जस्टिस सूर्यकांत की इस फटकार ने एक बार फिर साबित किया कि सर्वोच्च अदालत अब फ्रिवोलस याचिकाओं को बर्दाश्त नहीं करेगी। उन्होंने साफ कहा – “मैं इन मामलों में सख्त हूं।” यह संदेश न सिर्फ उस नए वकील के लिए, बल्कि पूरे वकील समुदाय के लिए है।
अगर वकील गंभीरता से याचिकाएं तैयार करेंगे, तो अदालत का समय गंभीर मुद्दों – जैसे संवैधानिक अधिकार, महिला सुरक्षा, पर्यावरण और भ्रष्टाचार – पर लगेगा।
न्यायपालिका की गरिमा बनाए रखना हर वकील की जिम्मेदारी है। CJI सूर्यकांत की सख्ती इसी दिशा में एक सकारात्मक कदम है। उम्मीद है कि भविष्य में ऐसी घटनाएं कम होंगी और अदालत सिर्फ सही मायनों में जनहित की रक्षा करेगी।
