कांग्रेस सर्वे EVM
कांग्रेस सर्वे EVM कांग्रेस के आंतरिक सर्वे ने बड़ा खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश की जनता को EVM पर पूरा भरोसा है, जिससे राहुल गांधी के दावों पर सवाल उठे हैं।

भारतीय राजनीति में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) को लेकर बहस कोई नई नहीं है। कांग्रेस समेत कई विपक्षी दल लंबे समय से EVM की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते रहे हैं, खासकर जब चुनाव परिणाम उनके अनुमान के विपरीत आते हैं। लेकिन अब कांग्रेस के अपने ही सर्वे ने पार्टी और खासकर राहुल गांधी के उस रुख को गहरा झटका दिया है, जो लगातार ईवीएम पर शक जताते रहे हैं।
कांग्रेस सर्वे EVM : सर्वे से सामने आई चौंकाने वाली हकीकत
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, हाल ही में कांग्रेस पार्टी के भीतर कराए गए एक आंतरिक सर्वे में यह पाया गया कि देश की आम जनता का एक बड़ा हिस्सा ईवीएम पर पूरा भरोसा रखता है। सर्वे में शामिल लगभग 78% लोगों ने ईवीएम को सुरक्षित, पारदर्शी और निष्पक्ष बताया।
इसके विपरीत सिर्फ 14% लोगों ने कहा कि उन्हें ईवीएम पर भरोसा नहीं है, जबकि 8% लोग इस मुद्दे पर अनिर्णय की स्थिति में दिखे।
यह सर्वे पार्टी की रणनीति तैयार करने के लिए तैयार किया गया था, लेकिन परिणाम ने कांग्रेस नेतृत्व को असहज स्थिति में डाल दिया है, क्योंकि पार्टी का आधिकारिक रुख ईवीएम को लेकर लगातार नकारात्मक रहा है।
राहुल गांधी की बयानबाज़ी और उसका असर
- राहुल गांधी ने कई बार सार्वजनिक मंचों पर कहा कि भाजपा EVM में “गड़बड़ी” करके चुनाव जीतती है।
- उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनावों के बाद भी यही आरोप दोहराते हुए ट्वीट किया था,
- “EVM का मतलब है – Every Vote for Modi।”
- परन्तु अब उनके ही पार्टी सर्वे के आंकड़े यह दिखाते हैं कि देश का बहुमत ऐसा नहीं सोचता।
विश्लेषकों का मानना है कि यह राहुल गांधी की नरेटिव रणनीति को कमजोर कर सकता है, क्योंकि जनता का विश्वास चुनाव प्रणाली में दृढ़ है। भारतीय मतदाता अब “EVM साजिश” जैसे मुद्दों से आगे बढ़ चुका है और उसे विकास, रोजगार, और शासन की स्थिरता जैसे विषय अधिक प्रभावित करते हैं।
कांग्रेस के भीतर उठे सवाल
- सर्वे रिपोर्ट लीक होते ही पार्टी के भीतर कई नेता यह मानने लगे हैं,
- कि EVM मुद्दा उठाना अब कांग्रेस को नुकसान पहुंचा रहा है।
- कुछ वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि लगातार मशीनों को दोष देने से ऐसा लगता है,
- कि पार्टी जनता के जनादेश को स्वीकार नहीं करना चाहती।
- एक नेता के शब्दों में – “हमें EVM नहीं, अपनी रणनीति और जमीनी संगठन को मजबूत करने की जरूरत है।”
हाल के चुनाव परिणामों ने भी यह साबित किया है कि विपक्षी दल तब जीतते हैं जब उनकी ज़मीन पर पकड़ मजबूत होती है — उदाहरण के लिए कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश और तेलंगाना। वहीं जहां संगठन कमजोर पड़ा, वहां जनता ने सीधे तौर पर पार्टी को नकार दिया।
चुनाव आयोग का रुख और तकनीकी पक्ष
- भारतीय चुनाव आयोग बार‑बार यह स्पष्ट कर चुका है कि EVM पूरी तरह सुरक्षित और हैक‑प्रूफ हैं।
- EVM मशीनें इंटरनेट या किसी बाहरी नेटवर्क से जुड़ी नहीं होतीं,
- जिससे हैकिंग की संभावना लगभग शून्य रहती है।
- हर चुनाव के बाद आयोग सार्वजनिक प्रदर्शन,
- मॉक पोल और वीवीपैट (VVPAT) मिलान के जरिए पारदर्शिता दिखाने की कोशिश करता है।
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि अब विपक्ष को तकनीकी संदेह की बजाय राजनैतिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लगातार EVM पर प्रश्न उठाने से मतदाताओं में यह संदेश जाता है कि विपक्ष निराशा की राजनीति कर रहा है, जबकि जनता को विकल्प और विश्वास दोनों चाहिए।
जनमत में बदलाव का संकेत
- यह सर्वे इस बात का संकेत भी देता है कि भारतीय मतदाता का राजनीतिक परिपक्वता स्तर तेजी से बढ़ा है।
- आज का युवा मतदाता सोशल मीडिया, आंकड़ों और वास्तविक मुद्दों के आधार पर निर्णय लेता है।
- वह समझता है कि मशीनें लोकतंत्र की दुश्मन नहीं, बल्कि पारदर्शिता की गारंटी हैं।
- यही कारण है कि 2014 से अब तक हर चुनाव के बाद मतदान प्रतिशत बढ़ता जा रहा है,
- जिससे यह स्पष्ट होता है कि जनता चुनाव प्रक्रिया पर भरोसा करती है।
कांग्रेस के लिए क्या सीख?
- कांग्रेस के लिए यह सर्वे एक आत्ममंथन का अवसर है।
- अगर पार्टी भविष्य की रणनीति बनाना चाहती है,
- तो उसे अब “EVM विरोध” जैसे विमर्श से आगे बढ़कर सकारात्मक एजेंडा पर ध्यान देना होगा –
- जैसे आर्थिक न्याय, बेरोजगारी, शिक्षा और किसान नीति।
- लोग अब केवल आलोचना नहीं, बल्कि समाधान देखना चाहते हैं।
निष्कर्ष
कांग्रेस के इस “आंतरिक सर्वे” ने यह स्पष्ट कर दिया है कि देश के नागरिकों का विश्वास EVM प्रणाली के साथ अडिग है। यह कांग्रेस और राहुल गांधी के लिए आत्मचिंतन का समय है कि क्या लगातार EVM पर सवाल उठाना राजनीतिक रूप से लाभप्रद है या नुकसानदेह।
भारत के लोकतंत्र में अब जनता यह तय कर चुकी है कि वह चुनावी परिणामों को सिस्टम की विफलता नहीं, बल्कि नेताओं की सफलता और असफलता से जोड़कर देखती है।
