भारत चाबहार प्रोजेक्ट
भारत चाबहार प्रोजेक्ट अमेरिकी प्रतिबंधों के बढ़ते दबाव के बीच भारत चाबहार पोर्ट प्रोजेक्ट से पीछे हट सकता है। ईरान के लिए यह बड़ा झटका होगा। भारत की नई तैयारी और भू-राजनीतिक प्रभाव की पूरी जानकारी।

ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार पोर्ट एक बार फिर सुर्खियों में है। जनवरी 2026 में ट्रंप प्रशासन के बढ़ते दबाव और प्रतिबंधों की छाया में भारत की इस रणनीतिक परियोजना का भविष्य अनिश्चित लग रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि भारत चाबहार से अपने ऑपरेशंस को “विंड डाउन” कर रहा है, जबकि विदेश मंत्रालय कह रहा है कि “एग्जिट कोई विकल्प नहीं है” और अमेरिका से बातचीत जारी है। अमेरिका ने अक्टूबर 2025 में छह महीने का कंडीशनल सैंक्शंस वेवर दिया है, जो 26 अप्रैल 2026 तक वैलिड है। सवाल उठता है – क्या भारत अमेरिकी टैरिफ और प्रतिबंधों के आगे झुक जाएगा? अगर ऐसा हुआ तो ईरान को भारी झटका लगेगा, और भारत की क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं को भी करारा धक्का पहुंचेगा।
चाबहार पोर्ट: भारत के लिए क्यों इतना महत्वपूर्ण?
चाबहार पोर्ट भारत की विदेश नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह पाकिस्तान को बायपास करके अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुंच प्रदान करता है। इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का यह प्रमुख हिस्सा है, जो भारत को रूस, ईरान और यूरोप से जोड़ता है। पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट (जो चीन संचालित कर रहा है) का मुकाबला करने के लिए चाबहार भारत का स्ट्रैटेजिक काउंटर है।
2016 से भारत इस पोर्ट को विकसित कर रहा है। 2024 में भारत और ईरान ने 10 साल का लंबा समझौता साइन किया, जिसमें इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) को शहीद बेहेश्ती टर्मिनल संचालित करने की जिम्मेदारी मिली। भारत ने 370 मिलियन डॉलर का निवेश承诺 किया था। इस पोर्ट से भारत ने अफगानिस्तान को गेहूं जैसी मानवीय मदद भेजी और व्यापारिक सामान की ढुलाई की। लेकिन अमेरिका-ईरान तनाव ने हमेशा इस परियोजना पर ग्रहण लगाया है।
अमेरिकी प्रतिबंधों का पुराना साया और ट्रंप का नया दबाव
ट्रंप के पहले कार्यकाल (2017-2021) में अमेरिका ने ईरान पर “मैक्सिमम प्रेशर” नीति अपनाई और चाबहार को भी सैंक्शंस के दायरे में लाया। तब भारत को विशेष छूट मिली थी। बाइडेन प्रशासन में भी छूट जारी रही। लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में सितंबर 2025 से चाबहार पर फिर सैंक्शंस लगा दिए गए। जनवरी 2026 में ट्रंप ने घोषणा की कि ईरान से व्यापार करने वाले देशों पर 25% टैरिफ लगेगा।
इसके बाद अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने भारत को छह महीने का कंडीशनल वेवर दिया – शर्त यह कि भारत ऑपरेशंस को धीरे-धीरे समेटे (wind down)। रिपोर्ट्स के अनुसार, IPGL के बोर्ड में सरकारी निदेशकों ने सामूहिक इस्तीफा दे दिया, कंपनी की वेबसाइट बंद हो गई, और ऑपरेशंस रुकने की खबरें आईं। विदेश मंत्रालय ने 16 जनवरी 2026 को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि वे अमेरिका से बात कर रहे हैं और वेवर को इंप्लीमेंट करने की कोशिश में हैं। MEA प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने स्पष्ट किया कि 28 अक्टूबर 2025 का अमेरिकी पत्र अभी वैलिड है, और भारत दोनों देशों (अमेरिका और ईरान) से संवाद बनाए हुए है।
हालांकि, कई मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्षी दल दावा कर रहे हैं कि भारत व्यावहारिक रूप से परियोजना से पीछे हट रहा है। कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इसे “मोदी सरकार की विदेश नीति का नया निचला स्तर” कहा। उनका कहना है कि अमेरिका के सामने झुककर भारत अपनी स्ट्रैटेजिक स्वायत्तता खो रहा है।
भारत चाबहार प्रोजेक्ट : अगर भारत छोड़ेगा तो ईरान को क्या नुकसान?
- ईरान के लिए चाबहार उसकी अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- प्रतिबंधों से घिरे ईरान को भारत जैसे बड़े पार्टनर की जरूरत है।
- अगर भारत निकल गया तो पोर्ट का विकास रुक जाएगा।
- ईरान पहले ही आंतरिक अशांति और आर्थिक संकट से जूझ रहा है।
- भारत का जाना ईरान को अलग-थलग कर देगा,
- और चीन को मौका मिल सकता है कि वह यहां अपनी पकड़ मजबूत कर ले।
- ग्वादर और चाबहार पास-पास हैं – चीन दोनों को कंट्रोल करना चाहेगा।
ईरान की अर्थव्यवस्था को तगड़ा झटका लगेगा क्योंकि भारत का निवेश और ऑपरेशन बंद होने से रोजगार, व्यापार और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रभावित होंगे। ईरान पहले ही कहा चुका है कि वह भारत के साथ संबंध बनाए रखना चाहता है, लेकिन अमेरिकी दबाव से स्थिति जटिल हो गई है।
भारत छोड़ेगा या नहीं? विश्लेषण
- भारत पूरी तरह एग्जिट नहीं करना चाहता।
- MEA का बयान साफ है कि बातचीत जारी है,
- और चाबहार भारत की स्ट्रैटेजिक जरूरत है।
- अप्रैल 2026 तक वेवर है,
- तो भारत शायद इसे बढ़वाने की कोशिश करेगा।
- लेकिन ट्रंप की कठोर नीति और 25% टैरिफ का डर बड़ा है।
- भारत-अमेरिका संबंध मजबूत हैं – QUAD, इंडो-पैसिफिक स्ट्रैटेजी में साथ हैं।
- भारत शायद अमेरिका को नाराज नहीं करना चाहेगा।
विकल्प भी सीमित हैं। अगर चाबहार गया तो INSTC कमजोर होगा, और अफगानिस्तान तक पहुंच मुश्किल। रूस भी इस कॉरिडोर में पार्टनर है, और वह अमेरिकी दबाव से प्रभावित नहीं होता। शायद भारत कोई मिडिल ग्राउंड ढूंढे – जैसे लिमिटेड ऑपरेशंस या थर्ड पार्टी के जरिए।
निष्कर्ष: संतुलन की कठिन चुनौती
- चाबहार भारत की “स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी” की परीक्षा है।
- अमेरिका सबसे बड़ा रक्षा और व्यापारिक पार्टनर है,
- जबकि ईरान क्षेत्रीय कनेक्टिविटी के लिए जरूरी।
- ट्रंप का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन भारत ने पहले भी ऐसे संकटों का सामना किया है।
- अप्रैल 2026 महत्वपूर्ण होगा –
- अगर वेवर नहीं बढ़ा तो भारत को कठिन फैसला लेना पड़ेगा।
- ईरान को झटका तो लगेगा ही,
- लेकिन भारत भी अपनी क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं में पीछे रह जाएगा।
यह मामला सिर्फ एक पोर्ट का नहीं – यह भू-राजनीति का खेल है, जहां भारत को अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाना है। उम्मीद है कि कूटनीति काम आएगी और चाबहार भारत के हाथ में रहेगा।
