ईरान युद्ध असर
ईरान युद्ध असर भारत ईरान युद्ध के चलते भारत में बढ़ी चिंता, सरकार ने बुलाई आपात सर्वदलीय बैठक। सुरक्षा, तेल सप्लाई और विदेश नीति पर क्या होंगे बड़े फैसले, जानिए इस अहम बैठक के मायने।

पश्चिम एशिया में ईरान-इजरायल-अमेरिका के बीच चल रहा युद्ध अब भारत की सीमाओं तक अपनी छाया डाल रहा है। फरवरी 2026 के अंत में शुरू हुए इस संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला दिया है। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, होर्मुज जलडमरूमध्य आंशिक रूप से प्रभावित हुआ है और भारत जैसे तेल आयातक देशों पर दबाव बढ़ गया है।
इसी बीच केंद्र सरकार ने 25 मार्च 2026 (बुधवार) को शाम 5 बजे संसद भवन में आपात सर्वदलीय बैठक बुलाई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की बैठक कर चुके हैं। यह हलचल साफ बताती है कि भारत इस संकट को बहुत गंभीरता से ले रहा है। क्या यह युद्ध भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और विदेश नीति को कैसे प्रभावित करेगा? आइए विस्तार से समझते हैं।
पश्चिम एशिया संकट का बैकग्राउंड
- 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर संयुक्त हवाई हमले किए।
- इन हमलों में ईरान के कई सैन्य ठिकानों,
- परमाणु सुविधाओं और उच्च पदाधिकारियों को निशाना बनाया गया।
- रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई
- की मौत की भी अफवाहें फैलीं (हालांकि पूरी तरह पुष्टि नहीं हुई)।
ईरान ने जवाबी कार्रवाई में इजरायल पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं और क्षेत्र के अन्य देशों में अमेरिकी ठिकानों पर हमले किए। होर्मुज जलडमरूमध्य – जहां से विश्व का लगभग 20% तेल गुजरता है – आंशिक रूप से प्रभावित हुआ। ईरान ने कुछ जहाजों को रोकना शुरू कर दिया, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन बाधित हुई।
- India ने शुरू से ही संयम की अपील की।
- विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सभी पक्षों से बातचीत की और शांति की वकालत की।
- प्रधानमंत्री मोदी ने यूएई, सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देशों के नेताओं से फोन पर बात कर एकजुटता जताई।
भारत पर पड़ने वाले प्रभाव
भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। हम अपनी 85-88% कच्चे तेल की जरूरत मध्य पूर्व से पूरी करते हैं। ईरान युद्ध के कारण:
तेल की कीमतें:
- ब्रेंट क्रूड 80 डॉलर से बढ़कर 100-120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया।
- इससे पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ने का खतरा है।
LPG संकट:
- भारत अपनी 90% से ज्यादा LPG आयात होर्मुज के रास्ते करता है।
- सप्लाई बाधित होने से घरेलू रसोई गैस पर असर पड़ा है।
- कई राज्यों में दबाव बढ़ा है।
मुद्रास्फीति और अर्थव्यवस्था:
- बढ़ती ऊर्जा लागत से मुद्रास्फीति बढ़ सकती है।
- आयात बिल महंगा होने से रुपया कमजोर पड़ सकता है।
- निर्यात पर भी असर क्योंकि मध्य पूर्व भारत के 17% निर्यात का बाजार है।
प्रवासी भारतीय:
- खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय काम करते हैं।
- युद्ध फैलने पर उनकी सुरक्षा बड़ी चुनौती है।
- सरकार ने पहले ही पेट्रोलियम, बिजली और उर्वरक क्षेत्रों की समीक्षा शुरू कर दी है।
- CCS बैठक में इन मुद्दों पर गहन चर्चा हुई।
सर्वदलीय बैठक का महत्व
25 मार्च को बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया गया है। बैठक का उद्देश्य पश्चिम एशिया संकट की समीक्षा करना, भारत के हितों की रक्षा के उपाय सुझाना और विपक्ष को साथ लेकर राष्ट्रीय सहमति बनाना है।
यह बैठक इसलिए भी अहम है क्योंकि विपक्ष पहले ही सरकार पर सवाल उठा चुका है। कांग्रेस और अन्य दलों ने कहा कि मोदी सरकार को पहले से ही सक्रिय होना चाहिए था। शिवसेना (UBT) नेता आदित्य ठाकरे ने तत्काल सर्वदलीय बैठक की मांग की थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने राज्यसभा और लोकसभा में भी इस मुद्दे पर बयान दिए। उन्होंने कहा कि भारत शांति चाहता है और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करता है। बैठक में विदेश नीति, ऊर्जा सुरक्षा, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और आर्थिक प्रभाव जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की उम्मीद है।
भारत की विदेश नीति
भारत की स्थिति काफी संवेदनशील है। हम इजरायल के साथ मजबूत रक्षा और तकनीकी साझेदारी रखते हैं, वहीं ईरान से चाबहार बंदरगाह जैसे रणनीतिक प्रोजेक्ट जुड़े हैं। रूस और चीन जैसे देशों के साथ भी संबंध हैं।
सरकार की रणनीति “सभी पक्षों से बातचीत और शांति” पर आधारित है। ईरान के राष्ट्रपति ने मोदी से BRICS अध्यक्षता के तहत “स्वतंत्र भूमिका” निभाने की अपील की थी। भारत ने ईरान के हमलों की निंदा नहीं की, लेकिन खाड़ी देशों पर हमलों की निंदा की।
यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं। लंबा युद्ध होने पर भारत को वैकल्पिक तेल स्रोत (रूस, अमेरिका आदि) ढूंढने पड़ सकते हैं। शिपिंग रूट्स बदलने से लागत बढ़ेगी।
सरकार की तैयारी: क्या कदम उठाए जा रहे हैं?
- CCS और उच्चस्तरीय बैठकें: तेल भंडारण, वैकल्पिक आयात और आपूर्ति सुनिश्चित करने पर फोकस।
- विदेश मंत्रालय: 90 लाख भारतीयों की निकासी या सुरक्षा के प्लान तैयार।
- आर्थिक उपाय: मुद्रास्फीति नियंत्रण, सब्सिडी पर विचार और स्टॉक पोजीशन मजबूत करना।
- राज्यों से समन्वय: कई राज्य सरकारें भी स्थानीय स्तर पर समीक्षा बैठकें कर रही हैं।
ईरान युद्ध असर: निष्कर्ष
- ईरान युद्ध ने भारत के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं –
- ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक स्थिरता, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और विदेश नीति का संतुलन।
- सरकार द्वारा बुलाई गई सर्वदलीय बैठक इस संकट में सभी
- दलों को एक मंच पर लाकर मजबूत संदेश देगी कि भारत इस मुश्किल घड़ी में एकजुट है।
- प्रधानमंत्री मोदी का बयान साफ है – “हमें तैयार रहना होगा”।
- अब जरूरत है कि राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दी जाए।
- अगर युद्ध लंबा खिंचा तो महंगाई, बेरोजगारी और आपूर्ति संकट बढ़ सकता है।
ईरान युद्ध असर: भारत जैसे विकासशील देश के लिए शांति ही सबसे बड़ा हित है। उम्मीद है कि सर्वदलीय बैठक से निकले सुझाव न सिर्फ भारत को सुरक्षित रखेंगे, बल्कि वैश्विक स्तर पर शांति प्रयासों में भी योगदान देंगे।
समय की मांग है – सतर्कता, एकता और कूटनीतिक कौशल। बंगाल की राजनीति नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की नजर अब पश्चिम एशिया पर है। भारत कैसे इस तूफान से उभरेगा, यह आने वाले दिनों में तय होगा।
