मायावती कांग्रेस हमला
मायावती कांग्रेस हमला कांशीराम के नाम पर आयोजित कार्यक्रम को लेकर मायावती ने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कांग्रेस की नीतियों और रवैये ने ही उन्हें बहुजन समाज पार्टी बनाने के लिए मजबूर किया। जानिए पूरा राजनीतिक विवाद और मायावती के बयान का मतलब।

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती ने हाल ही में कांशीराम के नाम पर आयोजित कार्यक्रम को लेकर खासी नाराजगी जताई है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि कांग्रेस ने ही बसपा बनाने पर मजबूर किया था। यह बयान उत्तर प्रदेश की सियासत में ताजा बहस का केंद्र बन गया है, खासकर जब कांशीराम जयंती (15 मार्च) नजदीक आ रही है और विभिन्न दल उनके नाम पर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं।
पृष्ठभूमि: कांशीराम और बसपा का जन्म
- मान्यवर कांशीराम बहुजन समाज के महान नेता थे।
- उन्होंने डॉ. भीमराव अंबेडकर के आत्म-सम्मान और स्वाभिमान के आंदोलन को नई गति दी।
- 1984 में उन्होंने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की,
- जिसका मुख्य उद्देश्य दलितों, पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और शोषित वर्गों को राजनीतिक ताकत देना था।
- कांशीराम का मानना था कि सवर्ण-प्रधान पार्टियां,
- खासकर कांग्रेस, इन वर्गों के हितों की अनदेखी करती रही हैं।
- उन्होंने कहा था कि “पॉवर शेयरिंग” के बिना बहुजन समाज का उत्थान संभव नहीं।
मायावती, जो कांशीराम की शिष्या रहीं, ने बसपा को उत्तर प्रदेश में मजबूत बनाया और कई बार मुख्यमंत्री बनीं। लेकिन अब जब कांग्रेस और सपा जैसे दल कांशीराम के नाम पर कार्यक्रम कर रहे हैं, तो मायावती इसे “दिखावा” और “वोट बैंक की राजनीति” बता रही हैं।
मायावती का गुस्सा: कांग्रेस पर तीखा हमला
हाल के बयानों में मायावती ने कहा कि कांग्रेस की दलित-विरोधी सोच और नीतियों के कारण ही कांशीराम को बसपा बनानी पड़ी। उन्होंने याद दिलाया कि कांग्रेस ने बाबा साहेब अंबेडकर को भी उचित सम्मान नहीं दिया। कांशीराम के निधन (2006) पर भी कांग्रेस ने कोई विशेष शोक या सम्मान नहीं जताया। अब राहुल गांधी लखनऊ में कांशीराम जयंती पर कार्यक्रम कर रहे हैं और यहां तक कि भारत रत्न देने की मांग उठा रहे हैं। मायावती ने पूछा- “जिस पार्टी ने कांशीराम का विरोध किया, जिसके कारण बसपा बनी, वही अब उन्हें भारत रत्न कैसे दे सकती है?”
- मायावती का कहना है कि कांग्रेस ने हमेशा दलितों के साथ भेदभाव किया।
- इमरजेंसी के दौरान संविधान कुचला गया, बाबा साहेब की छवि को कमजोर करने की कोशिश हुई।
- कांशीराम ने इसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई और अलग राजनीतिक मंच बनाया।
- मायावती ने अपने समर्थकों से अपील की कि कांग्रेस के “छद्म” और “जातिवादी” रवैये से सावधान रहें।
मायावती कांग्रेस हमला : सपा पर भी निशाना
- मायावती ने सिर्फ कांग्रेस को नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टी को भी निशाने पर लिया।
- उन्होंने कहा कि सपा ने कांशीराम के जीवनकाल में धोखा दिया और बसपा को कमजोर करने की कोशिश की।
- सपा सरकार में आने पर कांशीराम नगर (कासगंज) जिले का नाम बदल दिया गया,
- जो बसपा सरकार ने उनके नाम पर रखा था।
- कई संस्थानों, विश्वविद्यालयों और योजनाओं के नाम भी बदले गए।
- मायावती ने इसे “जातिवादी सोच” और “द्वेष” बताया।
- अखिलेश यादव द्वारा कांशीराम जयंती को “पीडीए दिवस” बनाने के ऐलान को उन्होंने “नौटंकी” करार दिया।
राजनीतिक संदर्भ और प्रभाव
यह विवाद 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले हो रहा है। बसपा का वोट बैंक मुख्य रूप से दलितों पर टिका है। कांग्रेस और सपा अब “पीडीए” (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के जरिए दलित वोटों पर सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल गांधी का लखनऊ आना और कांशीराम को श्रद्धांजलि देना बसपा के लिए चुनौती है। मायावती इसे बसपा की विचारधारा को चुराने की साजिश बता रही हैं।
- मायावती का यह बयान बसपा कार्यकर्ताओं में जोश भरने का प्रयास भी है।
- वे कह रही हैं कि असली सम्मान बसपा ही करती है,
- जो कांशीराम की विरासत को जीवित रखे हुए है।
- वहीं, विरोधी दल इसे बसपा की कमजोर स्थिति का संकेत मान रहे हैं।
निष्कर्ष
कांशीराम एक विचारधारा हैं, जो बहुजन समाज के उत्थान के लिए समर्पित थीं। उनका नाम आज राजनीतिक हथियार बन गया है। मायावती का गुस्सा दर्शाता है कि बसपा अपनी जड़ों की रक्षा के लिए कितनी सजग है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह बयान दलित वोटों को एकजुट कर पाएगा या विरोधी दलों को और मौका देगा? उत्तर प्रदेश की सियासत में यह बहस अभी लंबी चलेगी। बहुजन समाज के लिए कांशीराम का संदेश स्पष्ट है- “पावर शेयरिंग” से ही न्याय संभव है।
