UGC नियम रोक
UGC नियम रोक सुप्रीम कोर्ट ने UGC के नए इक्विटी नियमों 2026 पर तत्काल रोक लगा दी। कोर्ट ने कहा- नियम अस्पष्ट, दुरुपयोग का खतरा, समाज बंट सकता है। जानिए 5 प्रमुख बातें और केंद्र से जवाब मांगने का आदेश।

हाल ही में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026 जारी किए थे। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति, धर्म, लिंग, जन्म स्थान या विकलांगता आधारित भेदभाव को रोकना था। ये नियम रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे मामलों से प्रेरित थे, जहां जातिगत भेदभाव के कारण छात्रों ने आत्महत्या की थी। सुप्रीम कोर्ट ने भी UGC को ऐसे सख्त नियम बनाने का निर्देश दिया था।
- लेकिन इन नियमों में Regulation 3(c) सबसे विवादास्पद रहा,
- जिसमें जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति (SC),
- अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) तक सीमित कर दिया गया था।
- सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को इससे सुरक्षा नहीं मिलती थी,
- जिससे यह नियम ‘रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन’ का आरोप झेलने लगा।
- देशभर में विरोध प्रदर्शन हुए—कानपुर में सिर मुंडवाए गए,
- बिहार में फांसी की नौबत आई, और कई जगह छात्र सड़कों पर उतरे।
29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने CJI सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच के जरिए इन नियमों पर अंतरिम रोक लगा दी। कोर्ट ने साफ कहा कि पुराने 2012 के नियम लागू रहेंगे, जब तक आगे कोई आदेश न आए।
सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणियां: ‘समाज बंट जाएगा!’
सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कड़े शब्दों में कहा, “यह नियम समाज को बांटने वाला है। अगर हम हस्तक्षेप नहीं करते, तो इसका खतरनाक प्रभाव पड़ेगा, समाज बंट जाएगा और गंभीर परिणाम होंगे।” उन्होंने पूछा कि आजादी के 75 साल बाद भी क्या हम वर्ग-रहित समाज बनाने की बजाय प्रतिगामी दिशा में जा रहे हैं? कोर्ट ने नियमों की भाषा को अस्पष्ट (vague) और दुरुपयोग की संभावना वाला बताया।
- कोर्ट ने चिंता जताई कि ऐसे प्रावधान कैंपस में जाति-आधारित पहचान को बढ़ावा देंगे,
- जैसे वाहनों, साइनबोर्ड या सोशल मीडिया पर जाति का प्रदर्शन।
- यह संविधान के समानता के सिद्धांत (Article 14 और 15) के खिलाफ है।
रोक के साथ 5 चौंकाने वाली बातें
UGC नियम रोक: नियमों पर पूर्ण रोक और 2012 फ्रेमवर्क की बहाली
- सुप्रीम कोर्ट ने UGC के 2026 नियमों को पूरी तरह स्थगित कर दिया।
- अब तक 2012 के नियम ही लागू रहेंगे।
- यह फैसला दिखाता है कि कोर्ट नए नियमों को
- ‘असंवैधानिक’ मान रहा है, क्योंकि वे सामान्य वर्ग को सुरक्षा से वंचित करते हैं।
समाज विभाजन का सीधा आरोप
CJI ने कहा, “यह नियम समाज को बांट देगा और खतरनाक प्रभाव डालेगा।” उन्होंने 75 साल की प्रगति पर सवाल उठाया कि क्या हम जाति-रहित समाज से पीछे जा रहे हैं? यह टिप्पणी विरोधियों के लिए बड़ी जीत है, जो कहते थे कि नियम ‘जातिवाद’ को बढ़ावा देंगे।
नियम अस्पष्ट और दुरुपयोग योग्य
कोर्ट ने नियमों की भाषा को ‘vague’ करार दिया, जिससे दुरुपयोग आसान हो सकता है। उदाहरण के लिए, जाति-आधारित भेदभाव की संकीर्ण परिभाषा से सामान्य वर्ग के खिलाफ शिकायतें दर्ज नहीं हो पातीं, जबकि SC/ST/OBC को विशेष संरक्षण मिलता।
सामान्य वर्ग के अधिकारों का हनन
याचिकाकर्ता विनीत जिंदल ने तर्क दिया कि Regulation 3(c) असंवैधानिक है, क्योंकि यह भेदभाव की परिभाषा को जाति-तटस्थ नहीं बनाता। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और नोटिस जारी किया, जो दर्शाता है कि समानता सभी के लिए होनी चाहिए, न कि चुनिंदा वर्गों के लिए।
देशव्यापी विरोध का असर
प्रदर्शनों ने कोर्ट को मजबूर किया। UP, बिहार, दिल्ली में छात्रों ने सड़कें जाम कीं। कुछ जगहों पर सवर्ण युवकों ने मुंडन कराया और आत्मदाह की धमकी दी। कोर्ट का फैसला इन विरोधों को वैधता देता है और सरकार पर दबाव बढ़ाता है कि नियमों को दोबारा ड्राफ्ट करना पड़ेगा।
निष्कर्ष: शिक्षा में समानता या नया विभाजन?
- UGC के नए नियम अच्छे इरादे से आए थे—
- कैंपस में जातिगत उत्पीड़न रोकने के लिए।
- लेकिन उनकी संकीर्ण परिभाषा ने उल्टा असर किया।
- सुप्रीम कोर्ट का प्रहार साफ संदेश है कि संविधान समानता का पक्षधर है,
- न कि किसी वर्ग विशेष का।
- अब UGC को केंद्र सरकार के साथ मिलकर नियमों को संशोधित करना होगा,
- ताकि वे जाति-तटस्थ हों और सभी छात्र-शिक्षक सुरक्षित महसूस करें।
यह फैसला न केवल उच्च शिक्षा में, बल्कि पूरे समाज में जाति-आधारित विभाजन रोकने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उम्मीद है कि आगे की सुनवाई में स्थायी समाधान निकलेगा, जहां शिक्षा योग्यता और समान अवसर पर आधारित रहे, न कि जाति के खेल पर।
