फारूक अब्दुल्ला बयान
फारूक अब्दुल्ला बयान फारूक अब्दुल्ला का बयान! कश्मीरी पंडितों की वापसी पर कहा – कौन रोक रहा है? घर लौटो, कोई नहीं रोकता। कई पंडित अभी भी घाटी में सुरक्षित रह रहे हैं।

कश्मीरी पंडितों द्वारा ‘एक्सोडस डे’ या ‘होलोकॉस्ट डे’ के रूप में मनाए जाने वाले दिन पर, नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने एक बार फिर कश्मीरी पंडितों की वापसी को लेकर अपना गुस्से भरा लेकिन व्यंग्यात्मक बयान दिया। उन्होंने कहा, “कौन रोक रहा है? अपने घर जाओ!” साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि “दिल खुले हैं, फैसला आपका है।” यह बयान ऐसे समय में आया है जब विस्थापित कश्मीरी पंडित अपनी वापसी और पुनर्वास की मांग को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे।
पृष्ठभूमि: 1990 का दर्दनाक पलायन
1990 के दशक की शुरुआत में कश्मीर घाटी में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के कारण कश्मीरी पंडितों को अपनी जन्मभूमि छोड़नी पड़ी। हजारों परिवारों को रातों-रात अपना घर-बार छोड़कर दिल्ली, जम्मू और अन्य शहरों में शरण लेनी पड़ी। अनुमान के अनुसार, लगभग 3-5 लाख पंडित विस्थापित हुए। यह घटना कश्मीर की सांस्कृतिक विविधता पर एक गहरा आघात थी। हर साल 19 जनवरी को पंडित समुदाय इस दिन को ‘एक्सोडस डे’ के रूप में याद करता है, ताकि दुनिया को उनके दर्द और न्याय की मांग याद दिलाई जा सके।
फारूक अब्दुल्ला का यह बयान कई मायनों में विवादास्पद है। एक तरफ वे कहते हैं कि पंडितों का घर में वापस आना हमेशा से स्वागत योग्य है, उनका सही स्थान घाटी में ही है। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि कई पंडित परिवार कभी घाटी नहीं छोड़े और आज भी शांतिपूर्वक गांवों में रह रहे हैं। लेकिन दूसरी ओर, उन्होंने यह संदेह जताया कि क्या पंडित अब स्थायी रूप से वापस लौटना चाहेंगे? उन्होंने कहा, “वे बुजुर्ग हो चुके हैं, कई इलाज करा रहे हैं, उनके बच्चे कॉलेज, स्कूल और यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे हैं। वे आ सकते हैं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे स्थायी रूप से वहां रहना चाहेंगे।”
बयान में गुस्सा और व्यंग्य
- “कौन रोक रहा है? अपने घर जाओ!”
- जैसे शब्दों में फारूक अब्दुल्ला का गुस्सा साफ झलकता है।
- यह बयान पंडितों के प्रदर्शनों के जवाब में आया,
- जहां वे पुनर्वास पैकेज, सुरक्षा और नौकरियों की मांग कर रहे थे।
- फारूक साहब ने कहा कि केंद्र सरकार (तत्कालीन दिल्ली) को इस पर ध्यान देना चाहिए।
- उनका इशारा यह था कि अब कोई बाधा नहीं है,
- स्थिति सामान्य हो गई है, तो पंडित क्यों नहीं लौट रहे?
- लेकिन यह व्यंग्य कई लोगों को चुभा,
- क्योंकि विस्थापित पंडितों का दर्द सिर्फ भौतिक सुरक्षा का नहीं,
- बल्कि भावनात्मक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विश्वास का भी है।
फारूक अब्दुल्ला ने यह भी कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस सरकार बनने पर पंडितों के लिए घर बनवाएगी और जरूरी सहायता देगी। वे कहते हैं, “हमारा दिल खुले हैं, फैसला आपका है।” यह वाक्य एक तरफ स्वागत का संदेश देता है, लेकिन दूसरी तरफ जिम्मेदारी पंडितों पर डाल देता है – जैसे कि समस्या सिर्फ उनकी अनिच्छा की है।
राजनीतिक संदर्भ और विवाद
यह बयान ऐसे समय में आया जब नेशनल कॉन्फ्रेंस जम्मू-कश्मीर में सरकार बनाने की तैयारी कर रही है। फारूक अब्दुल्ला अक्सर कश्मीरियत की बात करते हैं और कहते हैं कि घाटी में सभी समुदायों का साथ जरूरी है। लेकिन उनके पिछले कुछ बयान, जैसे “हुआ तो हुआ” (कश्मीरी पंडितों की हत्याओं पर), ने विवाद खड़ा किया था। भाजपा और अन्य संगठनों ने उनकी आलोचना की कि वे पंडितों के दर्द को कमतर आंकते हैं।
- कश्मीरी पंडित संगठन इस बयान से नाराज हैं।
- उनका कहना है कि वापसी के लिए सिर्फ शब्द पर्याप्त नहीं,
- ठोस सुरक्षा, संपत्ति वापसी और सम्मानजनक पुनर्वास जरूरी है।
- घाटी में आज भी आतंकवाद की आशंका बनी हुई है, और पंडितों का भरोसा टूटा हुआ है।
फारूक अब्दुल्ला बयान : निष्कर्ष
- फारूक अब्दुल्ला का बयान एक तरफ चुनौती भरा है,
- तो दूसरी तरफ उम्मीद भी जगाता है।
- “अपने घर जाओ” कहकर वे पंडितों को बुला रहे हैं,
- लेकिन साथ ही यह भी कह रहे हैं कि फैसला उनका है।
- सच्चाई यह है कि कश्मीरी पंडितों की वापसी सिर्फ एक बयान या इशारे से नहीं हो सकती।
- इसके लिए केंद्र, राज्य सरकार, स्थानीय समाज और पंडित समुदाय सबको मिलकर काम करना होगा।
- सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा और सबसे महत्वपूर्ण – भरोसा बहाली जरूरी है।
कश्मीर की खूबसूरती तब और निखरेगी जब उसकी विविधता वापस लौटे। पंडित, मुस्लिम, सिख – सभी मिलकर। फारूक अब्दुल्ला का गुस्सा शायद इसी दर्द से उपजा है कि क्यों इतने साल बाद भी घाटी अधूरी लगती है। लेकिन सवाल यह है – क्या सिर्फ “अपने घर जाओ” कहने से घर वापस भर जाएगा? या इसके लिए गहरे प्रयास और संवेदनशीलता की जरूरत है?
