नरवणे किताब लोकसभा हंगामा
नरवणे किताब लोकसभा हंगामा पूर्व सेना प्रमुख मनोज नरवणे की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ के अंश राहुल गांधी ने लोकसभा में कोट किए, जिस पर बवाल मचा। किताब क्यों नहीं छपी? राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दावों पर हंगामा और विवाद की पूरी कहानी।

2 फरवरी 2026 को लोकसभा के बजट सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान भारी हंगामा मचा। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (रिटायर्ड) की अप्रकाशित किताब ‘Four Stars of Destiny’ के कुछ अंशों का जिक्र किया। राहुल ने कारवां पत्रिका में प्रकाशित एक लेख से उद्धरण पढ़ने की कोशिश की, जिसमें डोकलाम (2017) और गलवान घाटी (2020) जैसे सीमा विवादों पर जनरल नरवणे के कथित संस्मरण शामिल थे।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने तुरंत आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अप्रकाशित किताब से उद्धरण देना लोकसभा नियम 349 का उल्लंघन है। सदन में शोर-शराबा बढ़ा, कार्यवाही कई बार स्थगित हुई – पहले दोपहर 3 बजे तक, फिर शाम 4 बजे तक। यह घटना राष्ट्रीय सुरक्षा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संसदीय नियमों के बीच टकराव को उजागर करती है।
नरवणे किताब लोकसभा हंगामा: किताब का नाम और सामग्री क्या है?
जनरल एम.एम. नरवणे ने 2019 से 2022 तक सेना प्रमुख रहते हुए अपनी आत्मकथा ‘Four Stars of Destiny’ लिखी। यह किताब पेंगुइन रैंडम हाउस द्वारा प्रकाशित होने वाली थी। मूल रूप से 2024 में रिलीज की योजना थी, लेकिन अब तक बाजार में नहीं आई। अमेजन पर भी यह “Currently unavailable” दिखती है।
किताब में जनरल नरवणे ने अपने कार्यकाल के प्रमुख फैसलों का वर्णन किया है, जिसमें:
- 2017 का डोकलाम स्टैंडऑफ, जहां चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र में घुसने की कोशिश कर रहे थे।
- 2020 का गलवान क्लैश और पूर्वी लद्दाख में LAC पर तनाव।
- अग्निवीर योजना और अन्य नीतिगत मुद्दों पर उनके विचार।
- राजनीतिक नेतृत्व से निर्देशों की कमी पर कथित टिप्पणियां।
दिसंबर 2023 में पीटीआई ने किताब के कुछ अंश जारी किए थे, और कारवां मैगजीन ने हाल ही में विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की। राहुल गांधी ने इन्हीं अंशों का हवाला दिया, दावा किया कि ये “100% प्रामाणिक” हैं और सरकार चीन नीति पर सवाल उठाने से डर रही है।
किताब क्यों नहीं छपी? मुख्य कारण
पूर्व सेना प्रमुखों की किताबें रक्षा मंत्रालय की समीक्षा से गुजरती हैं, ताकि संवेदनशील जानकारी (जैसे ऑपरेशनल डिटेल्स, खुफिया डेटा या राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े राज) बाहर न आए। जनरल नरवणे की किताब भी इसी प्रक्रिया में फंसी हुई है।
रक्षा मंत्रालय की समीक्षा:
- 2023-24 में मसौदा मंत्रालय को भेजा गया।
- कुछ बदलाव सुझाए गए, लेकिन पूरी मंजूरी नहीं मिली।
- प्रकाशक को अंश सार्वजनिक न करने की सलाह दी गई।
अघोषित रोक:
- कई रिपोर्ट्स में इसे “undeclared ban” कहा गया।
- जनवरी 2024 में इंडियन एक्सप्रेस ने खबर दी कि किताब रिव्यू में अटकी है।
- अक्टूबर 2025 में जनरल नरवणे ने कहा कि किताब “maturing like aged wine” है,
- यानी समय के साथ बेहतर हो रही है, लेकिन प्रकाशन की तारीख अनिश्चित है।
अन्य उदाहरण:
- जनरल एन.सी. विज की किताब भी इसी वजह से लंबित है।
- पूर्व सेना प्रमुखों की किताबें अक्सर ऐसी समीक्षा से गुजरती हैं,
- लेकिन नरवणे की किताब में चीन बॉर्डर और राजनीतिक फैसलों पर संवेदनशील टिप्पणियां होने से विवाद बढ़ा।
सरकारी पक्ष का तर्क:
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने सदन में कहा कि किताब प्रकाशित नहीं हुई, इसलिए उद्धरण अमान्य हैं। अमित शाह ने तंज कसा कि मैगजीन में कुछ भी लिखा जा सकता है, लेकिन जनरल नरवणे ने सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई बयान नहीं दिया।
विपक्ष का आरोप है कि सरकार असुविधाजनक तथ्यों को छिपा रही है, जबकि सरकार इसे सुरक्षा प्रक्रिया बताती है।
लोकसभा में क्या हुआ? हंगामा और नियम 349
- राहुल गांधी ने भाषण शुरू करते ही किताब के अंश पढ़ने की कोशिश की।
- उन्होंने कहा, “यह पूर्व आर्मी चीफ की किताब है, जो छप नहीं रही।”
- राजनाथ सिंह ने पूछा, “किताब प्रकाशित हुई है या नहीं?” राहुल ने जवाब दिया कि सरकार रोक रही है।
स्पीकर ओम बिरला ने नियम 349 का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है:
- सदन में अप्रकाशित किताब, अखबार क्लिपिंग या असंबंधित सामग्री नहीं पढ़ी जा सकती।
- सदस्य सदन की गरिमा बनाए रखें, अनुशासनहीनता न करें।
भाजपा सांसदों ने इसे “राष्ट्रविरोधी” बताया, जबकि कांग्रेस ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला कहा। हंगामा 45 मिनट तक चला, सदन बार-बार स्थगित हुआ।
विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं
- भाजपा: राहुल पर नियम तोड़ने और फर्जी उद्धरण का आरोप। निशिकांत दुबे ने इसे “देशद्रोह” कहा।
- कांग्रेस: प्रियंका गांधी वाड्रा ने कहा, “राहुल सेना को बदनाम नहीं कर रहे, सिर्फ जनरल की किताब पढ़ रहे हैं।” महुआ मोइत्रा ने समर्थन किया कि सीमा मुद्दे सदन में चर्चनीय हैं।
- जनरल नरवणे: उन्होंने किताब पर कमेंट किया कि यह समय के साथ बेहतर हो रही है, लेकिन विवाद में सीधे शामिल नहीं हुए।
- मीडिया: इंडियन एक्सप्रेस, बीबीसी हिंदी और अन्य ने इसे राजनीतिक टकराव बताया, जहां राष्ट्रीय सुरक्षा बहस का केंद्र बनी।
निष्कर्ष: लोकतंत्र का परीक्षण
यह घटना दिखाती है कि पूर्व सैन्य अधिकारियों की किताबें कितनी संवेदनशील हो सकती हैं। एक तरफ सुरक्षा और गोपनीयता की जरूरत, दूसरी तरफ पारदर्शिता और जवाबदेही की मांग। राहुल गांधी का उद्धरण सदन में हंगामा तो पैदा कर गया, लेकिन असली सवाल बाकी हैं – किताब कब छपेगी? क्या इसमें सचमुच ऐसी बातें हैं जो सरकार छिपाना चाहती है? या यह सिर्फ संसदीय नियमों का मामला है?
लोकतंत्र में बहस जरूरी है, लेकिन नियमों का पालन भी। ऐसे विवाद संसद की उत्पादकता कम करते हैं और जनता के मुद्दों से ध्यान हटाते हैं। उम्मीद है कि भविष्य में ऐसी किताबें समय पर छपें और राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संतुलन बने रहे।
