शाहिदुल्लाह वोटर लिस्ट विवाद
शाहिदुल्लाह वोटर लिस्ट विवाद पश्चिम बंगाल में पूर्व जज शाहिदुल्लाह का नाम दो बार दस्तावेज जमा करने के बावजूद वोटर लिस्ट से गायब बताया जा रहा है। यह मामला प्रशासनिक प्रक्रिया और चुनावी पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।

पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में एक ऐसा मामला सामने आया है जो न सिर्फ आम नागरिकों बल्कि न्यायपालिका के सम्मानित व्यक्तियों को भी सोचने पर मजबूर कर देता है। कलकत्ता हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश और पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष जस्टिस शाहिदुल्लाह मुंशी का नाम मतदाता सूची से गायब कर दिया गया है। दो-दो बार सबूत जमा करने के बावजूद! पासपोर्ट, आधार, पैन कार्ड – सब कुछ देने के बाद भी उनका नाम ‘नॉट फाउंड’ या हटाए गए मतदाताओं की सूची में चला गया। यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़ा करती है। खासकर जब राज्य में विधानसभा चुनाव सिर पर हों और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान चल रहा हो। इस ब्लॉग में हम इस पूरे मामले को विस्तार से समझेंगे, कारणों का विश्लेषण करेंगे और इसके व्यापक प्रभावों पर चर्चा करेंगे।
शाहिदुल्लाह वोटर लिस्ट विवाद” जस्टिस शाहिदुल्लाह मुंशी
जस्टिस शाहिदुल्लाह मुंशी कलकत्ता हाईकोर्ट के एक प्रतिष्ठित न्यायाधीश रहे हैं। उन्होंने वर्षों तक न्याय की सेवा की और 2020 में सेवानिवृत्त हुए। फिलहाल वे पश्चिम बंगाल वक्फ बोर्ड (औकाफ बोर्ड) के चेयरमैन हैं। जज बनने से पहले उनकी पूरी जांच होती है – कोलेजियम की मंजूरी, राष्ट्रपति की नियुक्ति और संविधान की शपथ। इतनी कठोर जांच के बाद भी उनका नाम मतदाता सूची से हट जाना हैरान कर देने वाला है। वे बोबाजार विधानसभा क्षेत्र से मतदाता थे, लेकिन अब एंटाली में रहते हैं। उनके परिवार में पत्नी सहाना मुंशी, बड़े बेटे इफ्तेखार और छोटे बेटे इब्तेहाज शामिल हैं। जस्टिस मुंशी न सिर्फ कानून के विद्वान हैं बल्कि समाज के एक जिम्मेदार नागरिक भी। ऐसे व्यक्ति का नाम हटना सिर्फ व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि संस्थागत विश्वास पर चोट है।
पूरी घटना का विवरण: सबूत देने के बावजूद ‘गायब’
28 फरवरी 2026 को जारी ड्राफ्ट मतदाता सूची में जस्टिस मुंशी और उनके परिवार के नाम ‘विचाराधीन’ (under adjudication) चिह्नित थे। SIR प्रक्रिया के तहत वे सुनवाई में उपस्थित हुए। उन्होंने अपना पासपोर्ट जमा किया, आधार और पैन कार्ड देने की पेशकश की। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने दो बार दस्तावेज जमा किए, लेकिन कोई रसीद या पावती नहीं मिली। 23 मार्च 2026 को जारी पहली पूरक सूची में सिर्फ उनका नाम हटा दिया गया। पत्नी सहाना और बड़े बेटे इफ्तेखार का मामला अभी भी विचाराधीन है, जबकि छोटे बेटे ने नया मतदाता आवेदन किया है। जस्टिस मुंशी ने कहा, “मैंने पासपोर्ट सहित सभी जरूरी दस्तावेज जमा कराए, लेकिन मुझे कोई पावती नहीं मिली।” यह प्रक्रिया कितनी अपारदर्शी है, इसका अंदाजा इसी से लगता है। कोई कारण नहीं बताया गया, कोई अतिरिक्त दस्तावेज मांगे नहीं गए।
एसआईआर अभियान
विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) चुनाव आयोग की एक महत्वाकांक्षी योजना है, जिसका मकसद मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाना है।
- पश्चिम बंगाल में इस अभियान के तहत 7.66 करोड़ मतदाताओं में से करीब 63.66 लाख नाम हटा दिए गए।
- 60 लाख से ज्यादा मामलों की न्यायिक जांच हुई।
- मृतक, स्थानांतरित, डुप्लिकेट या ‘नॉट फाउंड’ श्रेणी में नाम कटे।
- चुनाव आयोग का कहना है कि यह प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर चल रही है।
- लेकिन आलोचक इसे ‘मैकेनिकल’ और ‘अपारदर्शी’ बता रहे हैं।
- एक बूथ से 340 मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटने जैसे मामले सामने आए।
- जस्टिस मुंशी का मामला इसी की मिसाल है।
- 60 लाख मामलों की जांच छोटे समय में करना संभव नहीं, इसलिए कई फैसले यंत्रवत हो जाते हैं।
पूर्व जज की प्रतिक्रिया
जस्टिस मुंशी ने इस घटना को ‘बहुत अपमानजनक और दर्दनाक’ बताया। उन्होंने कहा, “अभी तक सिर्फ मेरा नाम हटाया गया है। यह उत्पीड़न के समान है। मुझे समझ नहीं आ रहा कि किस आधार पर फैसला लिया गया।” वे आगे बोले, “60 लाख मतदाताओं की जांच छोटे समय में… अधिकारी मैकेनिकल तरीके से काम कर रहे हैं, न्यायिक नहीं।” उन्होंने अपीलीय ट्रिब्यूनल में अपील करने का फैसला किया है, लेकिन पहले कारण जानना चाहते हैं। जस्टिस मुंशी ने जोर दिया कि दस्तावेज पर्याप्त थे, लेकिन कोई सूचना नहीं दी गई। यह बयान न सिर्फ व्यक्तिगत पीड़ा दर्शाता है बल्कि सिस्टम की खामियों को उजागर करता है।
परिवार पर असर और आगे की राह
- परिवार के बाकी सदस्यों का मामला अभी विचाराधीन है,
- जो थोड़ी राहत देता है।
- लेकिन पूरे परिवार को मानसिक तनाव झेलना पड़ रहा है।
- छोटे बेटे को नया आवेदन करना पड़ा।
- जस्टिस मुंशी ने कहा कि अगर और दस्तावेज चाहिए होते तो वे दे देते,
- लेकिन कोई संवाद नहीं हुआ।
- अब अपीलीय ट्रिब्यूनल (19 ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं) में अपील होगी।
- यह प्रक्रिया कितनी लंबी चलेगी, चुनाव से पहले नाम जुड़ेगा या नहीं – यह देखना बाकी है।
राजनीतिक हलचल और चुनाव आयोग पर सवाल
त्रिणमूल कांग्रेस (TMC) ने चुनाव आयोग की तीखी आलोचना की। TMC का कहना है, “जब हाईकोर्ट के पूर्व जज का नाम कट सकता है तो आम गरीब और हाशिए वाले लोगों की क्या हालत होगी?” विपक्ष इसे मुस्लिम विरोधी रुझान बता रहा है, हालांकि चुनाव आयोग ने कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया। राज्य में चुनाव 23 और 29 अप्रैल 2026 को होने हैं। ऐसे में यह घटना मतदाता जागरूकता और विश्वास को प्रभावित कर रही है।
लोकतंत्र में मतदाता सूची की पवित्रता
- मतदाता सूची लोकतंत्र का आधार है।
- Article 326 के तहत हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार है।
- अगर जस्टिस जैसे व्यक्ति का नाम हट सकता है तो लाखों आम नागरिकों का क्या?
- SIR अभियान में पारदर्शिता, रसीद, कारण बताना और अपील की आसान प्रक्रिया जरूरी है।
- बिना कारण बताए नाम हटाना संविधान की भावना के खिलाफ है।
- यह न सिर्फ व्यक्तिगत अधिकारों का हनन है बल्कि चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल उठाता है।
निष्कर्ष
शाहिदुल्लाह वोटर लिस्ट विवाद: जस्टिस शाहिदुल्लाह मुंशी का मामला एक चेतावनी है। दो बार सबूत देने के बावजूद नाम ‘गायब’ होना स्वीकार्य नहीं। चुनाव आयोग को प्रक्रिया को और पारदर्शी बनाना चाहिए – डिजिटल रसीद, कारणों का सार्वजनिक खुलासा और तेज अपील तंत्र। नागरिकों को भी जागरूक रहना चाहिए। लोकतंत्र तभी मजबूत होगा जब हर योग्य मतदाता का नाम सूची में हो। आशा है कि अपीलीय ट्रिब्यूनल जल्दी न्याय देगा और ऐसे मामले दोबारा नहीं होंगे। हम सबको इस मुद्दे पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि आज जज का नाम, कल आपका-हमारा हो सकता है।
