आडवाणी जोशी वोट
आडवाणी जोशी वोट BJP के नए अध्यक्ष के चुनाव में पहली बार लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी वोट नहीं डाल सकेंगे। मार्गदर्शक मंडल की सदस्यता के कारण यह बदलाव आया है। वजह जानिए।

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के इतिहास में एक नया अध्याय लिखा जा रहा है। 20 जनवरी 2026 को पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की औपचारिक घोषणा होने वाली है। उम्मीद है कि नितिन नवीन निर्विरोध चुने जाएंगे। नामांकन प्रक्रिया चल रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह तथा रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह जैसे दिग्गज उनके प्रस्तावक बनेंगे। लेकिन इस चुनाव की सबसे बड़ी चर्चा कुछ और है – पार्टी के दो संस्थापक स्तंभ, लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी, पहली बार राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव में वोट नहीं डाल पाएंगे।
यह कोई साधारण घटना नहीं है। BJP की स्थापना (1980) के बाद पहली बार ऐसा हो रहा है कि ये दोनों वरिष्ठ नेता निर्वाचन मंडल (electoral college) का हिस्सा नहीं हैं। आखिर क्यों? क्या यह सिर्फ तकनीकी कारण है या पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव का संकेत?
कारण: दिल्ली इकाई के चुनाव न होने का असर
मुख्य वजह बेहद सरल लेकिन महत्वपूर्ण है – दिल्ली प्रदेश भाजपा का संगठनात्मक चुनाव अभी तक पूरा नहीं हुआ है। BJP के संविधान के अनुसार, राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव एक निर्वाचन मंडल के माध्यम से होता है, जिसमें सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से चुने गए राष्ट्रीय परिषद के सदस्य शामिल होते हैं। दिल्ली से अभी राष्ट्रीय परिषद के सदस्यों का चुनाव नहीं हो सका है। चूंकि आडवाणी और जोशी दोनों दिल्ली से जुड़े हुए हैं (वे यहां रहते हैं और पहले दिल्ली इकाई से जुड़े थे), इसलिए वे इस बार मतदाता सूची में शामिल नहीं हो पाए।
- यह तकनीकी लगता है, लेकिन इसका गहरा प्रभाव है।
- पहले के सभी अध्यक्ष चुनावों – चाहे राजनाथ सिंह का समय हो,
- नितिन गडकरी का, अमित शाह का या जे.पी. नड्डा का –
- में आडवाणी और जोशी हमेशा मतदाता सूची का हिस्सा रहे।
- वे न सिर्फ वोट डालते थे, बल्कि अपनी मौजूदगी से पार्टी के पुराने गौरव को जीवंत रखते थे।
- इस बार उनकी अनुपस्थिति पार्टी के इतिहास में एक मील का पत्थर बन गई है।
आडवाणी-जोशी का BJP में योगदान: एक संक्षिप्त यात्रा
लाल कृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को BJP का आधार स्तंभ कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। 1980 में जनता पार्टी के विघटन के बाद भारतीय जनता पार्टी की स्थापना हुई। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी और जोशी जैसे नेता आगे आए। आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा (1990) ने पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी। राम मंदिर आंदोलन के केंद्र में ये दोनों नेता रहे। 1984 में मात्र 2 सीटों वाली पार्टी को 1998-99 में अटल जी के नेतृत्व में सत्ता तक पहुंचाने में इनका योगदान अविस्मरणीय है।
जोशी जी ने पार्टी के वैचारिक आधार को मजबूत किया, जबकि आडवाणी ने संगठन को विस्तार दिया। 2004 की हार के बाद भी इन्होंने पार्टी को एकजुट रखा। 2014 में जब मोदी लहर आई, तब भी ये दोनों मार्गदर्शक की भूमिका में थे। 2024 में आडवाणी को भारत रत्न मिला – यह उनके योगदान की स्वीकारोक्ति थी।
आडवाणी जोशी वोट : मार्गदर्शक मंडल और पीढ़ीगत बदलाव
- 2014 में अमित शाह के अध्यक्ष बनने के साथ ही आडवाणी,
- जोशी और वाजपेयी को मार्गदर्शक मंडल में डाल दिया गया।
- यह कदम उस समय विवादास्पद रहा था।
- कई लोगों ने इसे “साइडलाइन” करने की रणनीति कहा।
- मार्गदर्शक मंडल का मतलब था – सम्मान तो मिलेगा,
- लेकिन सक्रिय निर्णय प्रक्रिया से दूरी।
- बाद में मोदी और राजनाथ सिंह को भी इस मंडल में शामिल किया गया,
- लेकिन वे सक्रिय राजनीति में बने रहे।
अब 2026 में आडवाणी 98 वर्ष के हैं, जोशी 92 के। उम्र का प्रभाव स्वाभाविक है। लेकिन दिल्ली इकाई का चुनाव न होना सिर्फ बहाना नहीं – यह दर्शाता है कि पार्टी अब पूरी तरह नई पीढ़ी के हाथ में है। नितिन नवीन जैसे युवा नेता आगे आ रहे हैं। मोदी-शाह की जोड़ी ने पार्टी को इतना मजबूत बना दिया है कि पुरानी पीढ़ी की औपचारिक भागीदारी भी अब जरूरी नहीं रह गई।
इसका व्यापक अर्थ क्या है?
- यह घटना सिर्फ दो नेताओं की अनुपस्थिति नहीं है।
- यह BJP के विकास का प्रतीक है।
- 1980 की छोटी पार्टी से आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी तक का सफर।
- पुरानी पीढ़ी ने नींव रखी, नई पीढ़ी महल खड़ा कर रही है।
- लेकिन सवाल उठता है – क्या सम्मान सिर्फ भारत रत्न और मार्गदर्शक मंडल तक सीमित रह जाएगा?
- या पार्टी कभी इन्हें फिर सक्रिय भूमिका देगी?
कई विश्लेषक इसे “ऐतिहासिक बदलाव” कह रहे हैं। यह दर्शाता है कि BJP अब पूरी तरह मोदी युग में है। पुराने नेता सम्मानित हैं, लेकिन निर्णय अब नई टीम ले रही है। यह स्वाभाविक प्रक्रिया है – हर पार्टी में पीढ़ी बदलती है। कांग्रेस में गांधी परिवार का प्रभाव रहा, लेकिन BJP में संगठनात्मक ढांचा मजबूत है।
निष्कर्ष: सम्मान और बदलाव का संतुलन
- आडवाणी और जोशी की यह अनुपस्थिति दुखद तो है, लेकिन अपरिहार्य भी।
- उन्होंने पार्टी को वह ऊंचाई दी, जहां आज वह है।
- दिल्ली इकाई का चुनाव जल्द पूरा हो या न हो, संदेश साफ है – BJP आगे बढ़ रही है।
- नए अध्यक्ष नितिन नवीन के नेतृत्व में पार्टी नई चुनौतियों का सामना करेगी।
- पुरानी पीढ़ी को सलाम, नई पीढ़ी को शुभकामनाएं।
यह बदलाव भारतीय राजनीति का हिस्सा है। BJP ने दिखाया कि वह परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बना सकती है। आडवाणी-जोशी हमेशा पार्टी के दिल में रहेंगे, भले ही मतदाता सूची में न हों।
