ऑपरेशन सर्चलाइट बयान
ऑपरेशन सर्चलाइट बयान पाकिस्तान के खिलाफ तीखा बयान देते हुए पीएम रहमान ने बांग्लादेश को ऑपरेशन सर्चलाइट की याद दिलाई। इस ऐतिहासिक संदर्भ से दोनों देशों के बीच पुराने घाव फिर चर्चा में आ गए हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिक्रिया तेज हो रही है।

बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने एक बार फिर इतिहास के उन काले पन्नों को उजागर किया, जिन्हें पाकिस्तान हमेशा भूल जाना चाहता है। नरसंहार दिवस के अवसर पर उन्होंने सोशल मीडिया पर एक विस्तृत पोस्ट लिखकर ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ का जिक्र किया और पाकिस्तानी सेना द्वारा किए गए नरसंहार की याद दिलाई। यह सिर्फ एक स्मृति नहीं थी, बल्कि पाकिस्तान पर सीधा निशाना था—कि बांग्लादेश कभी अपने शहीदों और उस काली रात को नहीं भूलेगा।
ऑपरेशन सर्चलाइट बयान: 1971 की वो काली रात
1970 के आम चुनाव में शेख मुजीबुर रहमान की अवामी लीग ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी। पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) की जनता ने स्पष्ट रूप से अपना नेता चुना था, लेकिन पश्चिम पाकिस्तान की सत्ता—जनरल याह्या खान, जुल्फिकार अली भुट्टो और सेना की कमान—ने इस जनादेश को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। वे बंगाली राष्ट्रवाद को कुचलना चाहते थे।
25 मार्च 1971 की रात को पाकिस्तानी सेना ने ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ नाम से एक पूर्व-नियोजित सैन्य अभियान शुरू किया। इसका उद्देश्य था—बंगाली बुद्धिजीवियों, छात्रों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों का सामूहिक सफाया। ढाका विश्वविद्यालय, पिलखाना (ईस्ट पाकिस्तान राइफल्स मुख्यालय), राजारबाग पुलिस लाइन्स और अन्य स्थानों पर अंधाधुंध गोलीबारी की गई। शिक्षकों, विद्यार्थियों और निर्दोष लोगों को निशाना बनाया गया। शेख मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर पश्चिम पाकिस्तान ले जाया गया।
- यह अभियान कोई सामान्य सैन्य कार्रवाई नहीं थी।
- यह एक सुनियोजित जनसंहार था। इतिहासकारों और गवाहों के अनुसार,
- नौ महीने के मुक्ति संग्राम में लगभग 30 लाख बंगाली मारे गए,
- लाखों महिलाओं के साथ बलात्कार हुआ और करोड़ों लोग शरणार्थी बनकर भारत आए।
- नदियों का पानी खून से लाल हो गया था। पाकिस्तानी सेना और उसके सहयोगी स्थानीय गुटों
- (जैसे जमात-ए-इस्लामी से जुड़े अंसार और राजाकार) ने बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं।
बांग्लादेश के पीएम तारिक रहमान ने अपनी पोस्ट में ठीक यही याद दिलाया—“उस काली रात को पाकिस्तानी कब्जा करने वाली ताकतों ने निहत्थे बांग्लादेशी लोगों पर अत्याचार किया। ढाका यूनिवर्सिटी, पिलखाना और राजारबाग में शिक्षकों, बुद्धिजीवियों और निर्दोष नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाई गईं।” उन्होंने कहा कि यह इतिहास की सबसे क्रूर जनसंहारों में से एक था और नई पीढ़ी को इसका सच्चा वर्णन बताना चाहिए।
पाकिस्तान की अस्वीकृति और बांग्लादेश का दर्द
- पाकिस्तान आज भी इस जनसंहार को स्वीकार करने से इनकार करता है।
- वह इसे “आंतरिक मामला” या “सिविल वॉर” कहकर खारिज करता है।
- लेकिन दुनिया के कई हिस्सों में इसे बांग्लादेश जनसंहार के रूप में मान्यता दी जा रही है।
- अमेरिका के एक सांसद ने हाल ही में प्रस्ताव पेश किया है कि 1971 के अत्याचारों—
- खासकर बंगाली हिंदुओं पर—को औपचारिक रूप से जनसंहार घोषित किया जाए।
बांग्लादेश ने पाकिस्तान से औपचारिक माफी और मुआवजे की मांग भी की है। कुछ अनुमानों के अनुसार, नुकसान की भरपाई के लिए अरबों डॉलर का दावा किया गया है। लेकिन पाकिस्तान की शहबाज सरकार अभी भी संबंध सुधारने की बात करती है, बिना अतीत का सामना किए। तारिक रहमान का बयान इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है—यह कहता है कि बिना सच्चाई स्वीकार किए कोई सच्चा मेल-मिलाप नहीं हो सकता।
इतिहास क्यों याद रखना जरूरी है?
- ऑपरेशन सर्चलाइट सिर्फ बांग्लादेश का दर्द नहीं,
- बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के इतिहास का हिस्सा है।
- इसने साबित किया कि भाषा,
- संस्कृति और जनादेश की अनदेखी कितनी खतरनाक हो सकती है।
- बंगाली लोगों की आजादी की लड़ाई ने दिखाया कि दमन के खिलाफ एकजुटता कितनी ताकतवर होती है।
- भारत ने मुक्ति संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई—
- शरणार्थियों को आश्रय दिया और अंत में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध लड़कर बांग्लादेश को आजादी दिलाई।
- आज जब बांग्लादेश नई सरकार के नेतृत्व में आगे बढ़ रहा है,
- तो पीएम तारिक रहमान का यह जिक्र सिर्फ अतीत की याद नहीं है।
- यह भविष्य के लिए चेतावनी भी है—कि लोकतंत्र,
- जनादेश और मानवाधिकारों की रक्षा हर कीमत पर करनी चाहिए।
- यह पाकिस्तान को भी संदेश है कि इतिहास को मिटाने की कोशिश व्यर्थ है।
- घाव समय के साथ भर सकते हैं, लेकिन स्मृति नहीं मिटती।
निष्कर्ष
पीएम तारिक रहमान द्वारा ‘ऑपरेशन सर्चलाइट’ का जिक्र करना एक साहसिक कदम है। यह बांग्लादेशी राष्ट्रवाद की मजबूती दिखाता है। शहीदों की कुर्बानी व्यर्थ नहीं गई—आज बांग्लादेश एक स्वतंत्र, गर्वित राष्ट्र है। लेकिन पाकिस्तान को अभी भी अपने अतीत का सामना करना बाकी है।
जब तक पाकिस्तान 1971 के जनसंहार के लिए माफी नहीं मांगता और सच्चाई नहीं स्वीकार करता, तब तक दोनों देशों के बीच वास्तविक दोस्ती का रास्ता मुश्किल रहेगा। इतिहास की याद दिलाना जरूरी है, क्योंकि जो भूल जाते हैं, वे दोहराने का खतरा पैदा करते हैं।
बांग्लादेश के शहीद अमर रहें। उनकी कुर्बानी हमें सिखाती है कि आजादी की कीमत कितनी भारी होती है। और पाकिस्तान को याद रखना चाहिए—अत्याचार की सजा समय जरूर देता है, भले ही देर से हो।
