जानिए 2001 के केतन पारेख शेयर
भारत के शेयर बाजार का सबसे बड़ा झटका
भारत के शेयर बाजार के इतिहास में वर्ष 2001 का केतन पारेख घोटाला सबसे चर्चित वित्तीय घोटालों में गिना जाता है। इस घोटाले ने न केवल लाखों निवेशकों का भरोसा तोड़ा बल्कि देश के सबसे पुराने शेयर बाजारों में से एक कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज (CSE) को भी गहरे संकट में धकेल दिया।
उस समय शेयर बाजार में तेजी का माहौल था और कई टेक्नोलॉजी व मीडिया कंपनियों के शेयरों में असामान्य उछाल देखा जा रहा था। बाद में जांच में सामने आया कि कुछ चुनिंदा शेयरों की कीमतों में कृत्रिम बढ़ोतरी की गई थी।
कौन थे केतन पारेख?
केतन पारेख मुंबई के चर्चित स्टॉक ब्रोकर थे। उन्हें शेयर बाजार में चुनिंदा कंपनियों के शेयरों की कीमतें बढ़ाने की रणनीति के लिए जाना जाता था। उन्होंने कथित तौर पर बैंकों से लिए गए धन और विभिन्न नेटवर्क का इस्तेमाल कर कुछ शेयरों में भारी खरीदारी कराई। इन शेयरों को बाद में “K-10 Stocks” कहा गया।
जब इन शेयरों की कीमतें लगातार बढ़ीं तो बड़ी संख्या में खुदरा निवेशकों ने भी निवेश करना शुरू कर दिया। लेकिन यह तेजी अधिक समय तक नहीं टिक सकी।
कैसे आया कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज पर संकट?
वर्ष 2001 में बाजार में गिरावट शुरू होने के बाद भुगतान संकट पैदा हो गया। कई ब्रोकर समय पर अपने दायित्व पूरे नहीं कर सके। इस स्थिति का सबसे बड़ा असर कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज पर पड़ा, जहां भुगतान प्रणाली गंभीर रूप से प्रभावित हुई।
रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियों की कार्रवाई के बाद फंडिंग रुकने लगी, जिससे बाजार में घबराहट फैल गई। इसके बाद भारी बिकवाली हुई और निवेशकों को बड़े पैमाने पर नुकसान उठाना पड़ा। यही घटनाक्रम CSE के लंबे पतन की शुरुआत माना जाता है।
लाखों निवेशकों का टूटा भरोसा
घोटाले के बाद बाजार में निवेशकों का विश्वास बुरी तरह प्रभावित हुआ। कई कंपनियों के शेयरों की कीमतें तेजी से गिर गईं। हजारों करोड़ रुपये की बाजार पूंजी घट गई और अनेक छोटे निवेशकों की बचत पर असर पड़ा।
इसके बाद भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) ने बाजार निगरानी को और सख्त किया। ट्रेडिंग नियमों में बदलाव किए गए, जोखिम प्रबंधन प्रणाली मजबूत की गई और भुगतान व्यवस्था में कई सुधार लागू किए गए।
CSE क्यों नहीं संभल पाया?
कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज कभी देश का दूसरा सबसे बड़ा स्टॉक एक्सचेंज माना जाता था।
लेकिन भुगतान संकट, कम होती ट्रेडिंग, तकनीकी बदलाव और राष्ट्रीय स्तर पर इलेक्ट्रॉनिक
ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के कारण इसकी गतिविधियां लगातार घटती चली गईं।
बाद के वर्षों में निवेशकों और कंपनियों का रुख अन्य बड़े एक्सचेंजों की ओर हो गया।
इससे CSE का कारोबार लगातार कमजोर होता गया।
आज निवेशकों के लिए क्या सबक?
केतन पारेख घोटाला यह सिखाता है कि केवल तेजी देखकर निवेश नहीं करना चाहिए। किसी भी
कंपनी में निवेश से पहले उसके कारोबार, वित्तीय स्थिति और जोखिम का अध्ययन करना जरूरी है।
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि निवेशकों को अफवाहों, कृत्रिम तेजी और बिना जांचे-परखे सुझावों से बचना चाहिए।
विविधीकरण (Diversification) और
दीर्घकालिक निवेश की रणनीति जोखिम कम करने में मदद कर सकती है।
निष्कर्ष
केतन पारेख शेयर घोटाला भारतीय पूंजी बाजार के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है।
इसने यह साबित किया कि बाजार में पारदर्शिता, मजबूत नियमन और
निवेशकों की जागरूकता कितनी आवश्यक है। इस घटना के बाद लागू हुए कई सुधारों ने
भारतीय शेयर बाजार को पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित और पारदर्शी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
FAQ
प्रश्न 1. केतन पारेख घोटाला कब हुआ था?
उत्तर: यह घोटाला मुख्य रूप से 1999 से 2001 के बीच सामने आया।
प्रश्न 2. K-10 Stocks क्या थे?
उत्तर: वे चुनिंदा शेयर थे जिनकी कीमतों में कथित तौर पर कृत्रिम तेजी लाई गई थी।
प्रश्न 3. कोलकाता स्टॉक एक्सचेंज पर इसका क्या असर पड़ा?
उत्तर: भुगतान संकट, कारोबार में गिरावट और निवेशकों के विश्वास में कमी के कारण CSE को भारी नुकसान हुआ।
प्रश्न 4. इस घोटाले के बाद क्या बदलाव हुए?
उत्तर: SEBI ने बाजार निगरानी, जोखिम प्रबंधन और ट्रेडिंग नियमों को अधिक सख्त बनाया।
read this post :अदन की खाड़ी में भारतीय नौसेना का बड़ा ऑपरेशन: INS त्रिशूल ने समुद्री डकैती की कोशिश की नाकाम, भारत आ रहे जहाज और क्रू को सुरक्षित बचाया
