डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की मतदाता
नई दिल्ली। अमेरिका में चुनाव प्रक्रिया और मतदाता पहचान को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देते हुए अमेरिका में मतदाता पहचान से जुड़े नियमों को और सख्त करने की वकालत की है। ट्रंप ने भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ हुई बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि भारत जैसे बड़े लोकतंत्र में मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने की व्यवस्था है, तो अमेरिका में भी ऐसी व्यवस्था को मजबूत किया जाना चाहिए।
ट्रंप का यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका में SAVE America Act को लेकर राजनीतिक बहस चल रही है। प्रस्तावित कानून में मतदाता पंजीकरण के समय अमेरिकी नागरिकता का प्रमाण और मतदान के दौरान फोटो पहचान-पत्र जैसी आवश्यकताओं को मजबूत करने की बात कही गई है।
*ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था की क्यों की तारीफ?
ट्रंप ने भारत के 2024 लोकसभा चुनाव का उदाहरण देते हुए वहां हुए बड़े पैमाने पर मतदान का उल्लेख किया। उनके अनुसार, भारत में करोड़ों लोगों ने मतदान किया और मतदाताओं की पहचान सुनिश्चित करने के लिए पहचान दस्तावेजों की व्यवस्था मौजूद है। उन्होंने भारत की चुनावी प्रक्रिया को अमेरिका में मतदाता पहचान नियमों को मजबूत करने के पक्ष में एक उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया।
भारत में मतदान के लिए केवल एक ही पहचान पत्र अनिवार्य नहीं है। मतदाता पहचान पत्र यानी EPIC के अलावा चुनाव आयोग द्वारा निर्धारित अन्य वैध पहचान दस्तावेजों के माध्यम से भी मतदाता अपनी पहचान साबित कर सकता है। इसलिए भारत की व्यवस्था को केवल एक कार्ड आधारित प्रणाली समझना पूरी तस्वीर नहीं होगी।
ट्रंप की दलील का मुख्य आधार यह है कि मतदान प्रक्रिया में पहचान की स्पष्ट व्यवस्था होने से चुनाव की विश्वसनीयता और मतदाताओं का भरोसा मजबूत किया जा सकता है।
क्या है SAVE America Act?
SAVE America Act अमेरिका में चुनावों से जुड़े नियमों को सख्त करने का प्रस्ताव है। इसके तहत संघीय मतदाता पंजीकरण में नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण देने और मतदान केंद्र पर फोटो पहचान-पत्र दिखाने जैसी व्यवस्थाओं को लागू करने की बात कही गई है। प्रस्ताव में मतदाता सूची से गैर-नागरिकों को हटाने की प्रक्रिया को भी मजबूत करने का प्रावधान बताया गया है।
इसके अलावा अनुपस्थित या दूर से मतदान करने की प्रक्रिया पर भी अधिक सख्त नियम लागू करने का प्रस्ताव है। कुछ विशेष परिस्थितियों जैसे बीमारी, विकलांगता, सैन्य सेवा या यात्रा के मामलों को अलग तरीके से देखा जा सकता है।
ट्रंप और इस कानून के समर्थकों का तर्क है कि चुनाव प्रक्रिया में नागरिकता और पहचान की अधिक सख्त जांच से चुनाव प्रणाली की सुरक्षा बढ़ाई जा सकती है।
अमेरिका में Voter ID को लेकर विवाद क्यों?
भारत और अमेरिका की चुनाव व्यवस्था में सबसे बड़ा अंतर यह है कि दोनों देशों में चुनाव संचालन की संरचना अलग है।
भारत में राष्ट्रीय स्तर पर चुनावों की निगरानी और संचालन की संवैधानिक जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के पास है। इसके विपरीत अमेरिका में चुनावों का संचालन काफी हद तक राज्यों और स्थानीय प्रशासन के स्तर पर होता है। इसी वजह से अमेरिका के अलग-अलग राज्यों में मतदाता पहचान और मतदान से जुड़े नियम एक जैसे नहीं हैं।
कई अमेरिकी राज्यों में मतदान केंद्र पर पहचान दिखाने की आवश्यकता होती है, लेकिन हर जगह फोटो पहचान-पत्र अनिवार्य नहीं है। कुछ राज्यों में अन्य पहचान दस्तावेज या पहचान सत्यापित करने के वैकल्पिक तरीके भी स्वीकार किए जाते हैं। यही अंतर अमेरिका में राष्ट्रीय स्तर पर एक समान Voter ID व्यवस्था लागू करने की बहस को जटिल बनाता है।
Voter ID के समर्थक क्या कहते हैं?
मतदाता पहचान कानून के समर्थकों का कहना है कि मतदान केंद्र पर पहचान की जांच चुनाव प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित बना सकती है। उनका तर्क है कि जब मतदाता की पहचान स्पष्ट रूप से सत्यापित होगी, तो चुनाव व्यवस्था में लोगों का भरोसा बढ़ेगा।
समर्थकों के मुताबिक चुनाव लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में से एक है। इसलिए मतदाता की पहचान और नागरिकता से जुड़े नियमों को स्पष्ट तथा मजबूत रखना आवश्यक है।
ट्रंप भी लंबे समय से इसी तर्क को आगे बढ़ाते रहे हैं। भारत की चुनाव व्यवस्था का उदाहरण देकर
वह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि बड़े पैमाने पर होने वाले
चुनावों में पहचान आधारित व्यवस्था को लागू करना संभव है।
विरोध करने वालों की क्या दलील है?
दूसरी ओर, Voter ID के विरोधियों का कहना है कि मतदान के दौरान किसी
दूसरे व्यक्ति के नाम पर फर्जी मतदान जैसी घटनाएं बेहद दुर्लभ हैं।
उनका तर्क है कि अत्यधिक सख्त पहचान नियमों का सबसे अधिक
असर उन लोगों पर पड़ सकता है जिनके पास आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।
आलोचकों के मुताबिक कम आय वाले नागरिक, बुजुर्ग, विद्यार्थी और कुछ
अन्य मतदाताओं के लिए अतिरिक्त दस्तावेज जुटाना कठिन हो सकता है। इससे ऐसे लोगों के
मतदान के अधिकार पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जाती है।
यही वजह है कि अमेरिका में Voter ID केवल चुनावी तकनीक का विषय नहीं बल्कि मताधिकार,
नागरिक अधिकार और चुनावी पहुंच से जुड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।
Student ID को लेकर भी सामने आया विवाद
अमेरिका में पहचान-पत्र को लेकर विवाद का एक उदाहरण न्यू हैम्पशायर से भी सामने आया।
वहां मतदान के लिए हाई स्कूल और कॉलेज के छात्र पहचान-पत्रों की स्वीकार्यता से जुड़ा मामला चर्चा में रहा।
इसके खिलाफ मतदान अधिकारों से जुड़े एक समूह ने अदालत का रुख किया।
इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि अमेरिका में सवाल केवल यह नहीं है कि पहचान-पत्र होना चाहिए या नहीं,
बल्कि यह भी महत्वपूर्ण है कि कौन-सा दस्तावेज मतदान के लिए स्वीकार किया जाए।
भारत में भी मतदान के समय पहचान सत्यापन के लिए कई निर्धारित दस्तावेज स्वीकार किए जाते हैं।
इसलिए दोनों देशों की व्यवस्था की तुलना करते
समय उनके प्रशासनिक ढांचे और कानूनी प्रावधानों को समझना जरूरी है।
भारत और अमेरिका में क्या है सबसे बड़ा अंतर?
भारत में चुनावों के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का ढांचा काम करता है। चुनाव आयोग मतदाता सूची, चुनाव कार्यक्रम,
मतदान प्रक्रिया और चुनाव से संबंधित कई महत्वपूर्ण व्यवस्थाओं की निगरानी करता है।
अमेरिका में इसके विपरीत चुनाव प्रशासन का बड़ा हिस्सा राज्यों और स्थानीय संस्थाओं के पास है।
इसलिए एक राज्य में लागू पहचान नियम दूसरे राज्य से अलग हो सकते हैं।
यही कारण है कि अमेरिका में भारत जैसी समान राष्ट्रीय Voter ID व्यवस्था लागू करने की
चर्चा राजनीतिक और कानूनी दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण बहस पैदा करती है।
क्या भारत का मॉडल अमेरिका में लागू हो सकता है?
सैद्धांतिक रूप से भारत की चुनाव व्यवस्था से
कुछ व्यवस्थाओं को अमेरिका में अपनाने की चर्चा की जा सकती है,
लेकिन दोनों देशों की राजनीतिक और प्रशासनिक संरचना अलग होने के कारण
सीधे तौर पर एक देश का मॉडल दूसरे देश में लागू करना आसान नहीं होगा।
भारत में मतदाता पहचान के साथ-साथ व्यापक मतदाता सूची, चुनाव आयोग की केंद्रीय
भूमिका और मतदान केंद्रों की निर्धारित व्यवस्था काम करती है। अमेरिका में राज्यों की अलग-अलग
चुनावी व्यवस्थाओं के कारण पूरे देश के लिए समान नियम बनाना अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसलिए ट्रंप द्वारा भारत का उदाहरण दिए जाने का महत्व मुख्य रूप से राजनीतिक बहस में है।
इससे यह सवाल जरूर उठता है कि आधुनिक लोकतंत्रों में मतदाता की पहचान और
मतदान की सुविधा के बीच संतुलन किस तरह बनाया जाए।
निष्कर्ष
अमेरिका में Voter ID को लेकर जारी बहस अब भारत की चुनाव व्यवस्था तक पहुंच गई है।
डोनाल्ड ट्रंप ने भारत में मतदाता पहचान की व्यवस्था को अमेरिकी
चुनाव सुधारों के समर्थन में उदाहरण के तौर पर पेश किया है।
वहीं अमेरिका में इस मुद्दे पर समर्थकों और विरोधियों के बीच मतभेद कायम हैं।
एक तरफ समर्थक इसे चुनाव की सुरक्षा और विश्वसनीयता से जोड़ते हैं, तो दूसरी
तरफ विरोधी आशंका जताते हैं कि अत्यधिक सख्त नियम कुछ नागरिकों के लिए
मतदान करना मुश्किल बना सकते हैं। भारत और अमेरिका की चुनाव प्रणाली में
मौजूद संरचनात्मक अंतर को देखते हुए यह बहस आने वाले समय में और महत्वपूर्ण हो सकती है।
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