इथेनॉल ब्लेंडिंग का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना और देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करना है।
E20 ethanol blending: भारत में पेट्रोल के साथ इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया जा रहा है। देश E20 यानी पेट्रोल में 20 फीसदी तक इथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य तक पहुंच चुका है। अब E20 से आगे E27 या E30 जैसी ब्लेंडिंग की संभावनाओं पर चर्चा हो रही है। लेकिन इथेनॉल की बढ़ती मांग के साथ एक बड़ा सवाल भी सामने आ रहा है—क्या ज्यादा इथेनॉल उत्पादन का असर अनाज, खेती और पानी की उपलब्धता पर पड़ सकता है?
इथेनॉल ब्लेंडिंग का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना और देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करना है। इसके साथ किसानों के लिए मक्का, गन्ना और दूसरी फसलों का एक अतिरिक्त बाजार भी तैयार होता है। हालांकि, अगर ईंधन के लिए फसलों की मांग तेजी से बढ़ती है तो खाद्य जरूरतों के साथ संतुलन बनाए रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती हो सकती है।

E20 ethanol blending के बाद E27 और E30 की चर्चा
E20 ethanol blending: भारत में पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य हासिल किया जा चुका है। अब इससे आगे ब्लेंडिंग बढ़ाने की चर्चा हो रही है। ब्लेंडिंग प्रतिशत बढ़ने का सीधा मतलब है कि इथेनॉल की जरूरत भी बढ़ेगी।
इथेनॉल बनाने के लिए मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों का इस्तेमाल किया जाता है। इसलिए उत्पादन बढ़ाने के साथ यह देखना जरूरी होगा कि इसके लिए अतिरिक्त फसल और संसाधन कहां से आएंगे।
मक्का की बढ़ सकती है मांग
मक्का इथेनॉल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण फसलों में शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल केवल ईंधन बनाने में नहीं होता। मक्का का उपयोग खाद्य पदार्थों के साथ-साथ पशु चारे में भी किया जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार, मक्का और अनाज मिलकर इथेनॉल उत्पादन में करीब 67 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। ऐसे में इथेनॉल की मांग बढ़ने पर मक्का की मांग भी बढ़ सकती है। इसका असर बाजार में इसकी कीमत और उपलब्धता पर पड़ने की संभावना पर चर्चा हो रही है।
गन्ने पर भी बढ़ सकता है दबाव
इथेनॉल उत्पादन का एक बड़ा स्रोत गन्ना भी है। गन्ने से चीनी के साथ इथेनॉल भी तैयार किया जाता है। यदि इथेनॉल के लिए गन्ने की मांग बढ़ती है तो चीनी उत्पादन और उसकी कीमतों पर भी असर पड़ सकता है।
हालांकि, इथेनॉल उत्पादन के बाद बचने वाले कुछ उप-उत्पादों का इस्तेमाल
पशु चारे के रूप में किया जा सकता है। इसलिए इसका असर केवल एकतरफा नहीं है,
बल्कि पूरे कृषि और खाद्य सिस्टम को ध्यान में रखकर समझना होगा।
असली चुनौती सिर्फ अनाज नहीं, पानी भी
इथेनॉल ब्लेंडिंग बढ़ाने को लेकर चिंता केवल फसलों तक सीमित नहीं है। खेती के लिए बड़ी मात्रा में
पानी की आवश्यकता होती है और इथेनॉल उत्पादन की प्रक्रिया में भी पानी का इस्तेमाल होता है।
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्यों में बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती होती है।
ऐसे क्षेत्रों में इथेनॉल की मांग बढ़ने के साथ यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि
अतिरिक्त उत्पादन के लिए कितने पानी की जरूरत होगी और इसका स्थानीय जल संसाधनों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा में संतुलन जरूरी
इथेनॉल ब्लेंडिंग से भारत को कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।
साथ ही किसानों को अपनी फसल बेचने के लिए एक अतिरिक्त बाजार मिलता है।
लेकिन इसके साथ खाद्य सुरक्षा और पानी की उपलब्धता को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
E20 के बाद अगर भारत E27 या E30 जैसी ऊंची ब्लेंडिंग की ओर बढ़ता है तो
इथेनॉल की बढ़ती मांग के साथ जमीन, पानी, मक्का और गन्ने की उपलब्धता पर नजर रखना जरूरी होगा।
निष्कर्ष
इथेनॉल ब्लेंडिंग भारत की ऊर्जा रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।
इससे तेल आयात और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े फायदे हो सकते हैं, लेकिन आगे ब्लेंडिंग बढ़ाने से पहले
फूड बनाम फ्यूल के सवाल पर गंभीरता से विचार करना होगा। खेती, पानी, किसानों की आय,
अनाज की कीमत और उपभोक्ताओं की खाद्य जरूरतों के बीच
संतुलन बनाना आने वाले समय की बड़ी चुनौती हो सकती है।
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