क्राइम ड्रामा
क्राइम ड्रामा एक शानदार क्राइम ड्रामा जिसने शुरू से आखिरी एपिसोड तक रोमांच बनाए रखा, लेकिन आखिरी 10 मिनट के ज़बरदस्त और लॉजिकलेस क्लाइमैक्स ने पूरी मेहनत पर पानी फेर दिया। पूरी रिव्यू पढ़ें कि कहाँ गई गलती

शानदार क्राइम ड्रामा को ज़बरदस्त क्लाइमैक्स ने कैसे बर्बाद कर दिया?
- आज मैं बात करने वाला हूँ एक ऐसे क्राइम ड्रामा की जिसने पहले 90% तक तो दिल जीत लिया था,
- लेकिन आखिरी 10 मिनट में ऐसा तमाचा मारा कि सारा मज़ा किरकिरा हो गया। जी हाँ,
- मैं बात कर रहा हूँ उस सीरीज़ की जिसे आप सब ने पिछले हफ्ते तक सोशल मीडिया पर
- “मास्टरपीस” और “गेम चेंजर” बता रहे थे। नाम छुपा रहा हूँ क्योंकि स्पॉइलर से बचना है,
- लेकिन जिसने भी देखी है वो समझ गया होगा।
- शुरुआत करते हैं अच्छी चीज़ों से, क्योंकि क्रेडिट देना बनता है। यह क्राइम ड्रामा सचमुच अलग लेवल का था।
- कहानी एक आम इंसान की थी जो गलती से क्राइम की दुनिया में फंस जाता है।
- किरदारों का ग्रे शेड, पुलिस का भ्रष्टाचार,
- अंडरवर्ल्ड की पॉलिटिक्स, सब कुछ इतनी बारीकी से लिखा गया था कि हर एपिसोड के बाद लगता था,
- “अब इससे बेहतर क्या हो सकता है?” सिनेमाटोग्राफी कमाल की, बैकग्राउंड स्कोर दिल को छूने वाला, और सबसे बड़ी बात,
- हर किरदार का अपना मकसद था। कोई भी कैरेक्टर बेकार नहीं लगा। खासकर विलेन (या एंटी-हीरो) का किरदार इतना
- दमदार था कि आप उसे नफरत भी नहीं कर पाते थे। यही तो अच्छी राइटिंग होती है।
- फिर आया फिनाले। पहले 40 मिनट तक तो सब ठीक था। टेंशन बन रही थी, सारे थ्रेड्स एक-एक करके जुड़ रहे थे।
- लगा कि अब एक धमाकेदार लेकिन लॉजिकल क्लाइमैक्स आने वाला है।
- लेकिन जैसे ही आखिरी 10-12 मिनट शुरू हुए, राइटर साहब को लगा कि “चलो सब कुछ जल्दी-जल्दी खत्म कर देते हैं”।
- अचानक से:
शानदार क्राइम ड्रामा
- सारे बड़े सवालों का जवाब एक डायलॉग में दे दिया गया
- जो किरदार 7 एपिसोड से स्मार्ट बन रहा था, वो अचानक गधा बन गया
- हीरो को सुपरपावर आ गए, गोली भी नहीं लगी
- विलेन ने 2 मिनट में सारी प्लानिंग भूलकर आत्मसमर्पण कर दिया
- और सबसे हास्यास्पद, सारी जांच एक फ्लैश ड्राइव में मिल गई जिसे कोई ढूंढ भी नहीं रहा था पिछले 7 एपिसोड से!
- भाई, ये क्या था? लग रहा था जैसे राइटर को अगले दिन सुबह 9 बजे फ्लाइट थी और उसे जल्दी से एयरपोर्ट जाना था।
- इतनी मेहनत, इतना अच्छा बिल्ड-अप, और अंत में ऐसा लगा जैसे कोई कॉलेज का स्टूडेंट लास्ट मिनट में असाइनमेंट पूरा कर रहा हो।
- सबसे दुख वाली बात ये है कि ये पहली बार नहीं हुआ। पिछले 4-5 साल में जितने भी अच्छे क्राइम ड्रामा आए हैं,
- उनमें से 80% का यही हाल है। शुरू में तारीफें, बीच में वाह-वाह, और अंत में दर्शक ठगा सा महसूस करते हैं।
- क्या वाकई अच्छा क्लाइमैक्स लिखना इतना मुश्किल है? या प्रेशर इतना होता है कि “चलो कुछ भी करके खत्म करो”?
- मैं ये नहीं कह रहा कि हर सीरीज़ को हैप्पी एंडिंग देनी चाहिए। बिल्कुल नहीं।
- दर्दनाक अंत, ओपन एंडिंग, ट्रैजिक क्लोज़र, सब चलता है। लेकिन जो अंत लॉजिक,
- किरदारों की जर्नी और दर्शकों की भावनाओं का सम्मान करे। वो नहीं चाहिए
- हमें जो बस “शॉक वैल्यू” के लिए लिखा गया हो।
- अगर ये सीरीज़ अपना फिनाले थोड़ा संभाल लेती, तो सचमुच ये साल की बेस्ट क्राइम ड्रामा बन जाती।
- लेकिन अब हालत ये है कि लोग कह रहे हैं, “भाई पहले 7 एपिसोड देख लो,
- आखिरी वाला स्किप कर दो”। कितनी त्रासदी है ये!
- अंत में यही कहूँगा, अगर आपने अभी तक नहीं देखी है तो देख लीजिए,
- लेकिन आखिरी एपिसोड देखने से पहले मानसिक तैयारी कर लीजिए। और अगर आप राइटर हैं
- या बनने का सोच रहे हैं, तो याद रखिए, दर्शक माफ कर देता है
- अगर शुरूआत कमज़ोर हो, लेकिन क्लाइमैक्स अगर कमज़ोर हुआ, तो कुछ नहीं बचता।
