NRI Health System India
NRI Health System India 10 साल अमेरिका में रहने के बाद भारत लौटे NRI ने अमेरिकी हेल्थ सिस्टम की असलियत उजागर की। उन्होंने बताया कि भारत के डॉक्टरों और मेडिकल सुविधाओं ने उनकी जान बचाई।

अमेरिका में 10 साल बिताने के बाद जब कैलिफोर्निया में बसे अनिल मल्होत्रा (काल्पनिक नाम, NRI भारतीय) अपने देश भारत लौटे, तो उनके मुंह से पहला वाक्य निकला — “भारत ने मुझे बचा लिया…”। यह कोई भावनात्मक बयान नहीं था, बल्कि अमेरिकी हेल्थ सिस्टम (Health System) की वास्तविकता से उपजा एक गहरा अनुभव था।
आज भी बहुत से भारतीय अमेरिका या अन्य विकसित देशों में बेहतर जीवन, उच्च शिक्षा और सुविधाओं के लिए जाते हैं। लेकिन स्वास्थ्य सेवाओं (Healthcare) के मामले में अमेरिका की चमक-दमक के पीछे जो कड़वी सच्चाई छिपी है, वही कहानी अनिल की भी थी।
NRI Health System India : अमेरिका में बीमारी और बिल का डर
अनिल मल्होत्रा पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और करीब दस साल अमेरिका में रहे। कुछ महीने पहले उन्हें अचानक हार्ट की तकलीफ हुई और इमरजेंसी में उन्हें कैलिफोर्निया के एक मशहूर अस्पताल में भर्ती कराया गया।
“मैंने सोचा, अब तो सब ठीक होगा। अमेरिका का सिस्टम है, विश्वस्तरीय इलाज मिलेगा।” लेकिन इलाज से ज़्यादा उन्हें बिल देखकर हार्ट अटैक दोबारा आने वाला था। सिर्फ तीन दिन के इलाज और जांच के लिए $48,000 (करीब 40 लाख रुपये) का बिल थमा दिया गया।
- बीमा (Insurance) होने के बावजूद करीब $12,000 का भुगतान खुद करना था।
- “मुझे एहसास हुआ कि यहां हेल्थ सर्विस नहीं, हेल्थ बिज़नेस चलता है,” अनिल कहते हैं।
बीमा होने के बावजूद असुरक्षित
- बहुत से लोग मानते हैं कि अमेरिका जैसे देशों में मेडिकल इंश्योरेंस सबको राहत देता है।
- लेकिन वहां की वास्तविकता कुछ और है।
- अमेरिकी सिस्टम में बीमा कंपनियां अक्सर इलाज, दवा या लैब टेस्ट की मंजूरी में देरी करती हैं।
- कई बार “pre-authorization” न मिलने पर इलाज बीच में ही रोक दिया जाता है।
अनिल बताते हैं — “डॉक्टर इलाज तो करना चाहते थे, लेकिन बीमा कंपनी की मंजूरी के बिना वे कुछ नहीं कर सकते थे। वहां मरीज नहीं, बीमा कंपनियां तय करती हैं कि कौन-सा इलाज मिलना चाहिए।”
भारत की धरती पर लौटकर राहत
- बीमारी के बाद अनिल परिवार सहित लुधियाना लौट आए।
- वह कहते हैं — “भारत लौटते ही मुझे राहत मिली।
- यहां निजी और सरकारी दोनों प्रणालियों में इंसानियत अब भी जिंदा है।
- ” उन्होंने हृदय रोग का इलाज भारत के एक नामी अस्पताल में सिर्फ 2.5 लाख रुपये में कराया,
- जो अमेरिका की तुलना में 95% सस्ता था।
भारत में डॉक्टर से बात करने के लिए समय या “appointment” की लंबी कतार नहीं लगी; न बीमा कंपनी की अनुमति की जरूरत थी। “डॉक्टर ने मेरा हाथ थामा और कहा, चिंता मत करिए — यही इंसानियत मुझे 10 साल में वहां कभी महसूस नहीं हुई,” अनिल ने भावुक होकर कहा।
अमेरिकी हेल्थकेयर की सच्चाई
- अमेरिका विश्व का सबसे महंगा स्वास्थ्य तंत्र रखता है।
- वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक,
- एक औसत अमेरिकी सालाना $12,500 सिर्फ मेडिकल खर्च पर करता है।
- वहीं, लगभग 8% नागरिकों के पास अब भी कोई बीमा नहीं है।
हॉस्पिटल में भर्ती होना, दवाई खरीदना या एक सामान्य डॉक्टर को दिखाना भी मध्यवर्गीय परिवार की आर्थिक स्थिति को झटका दे सकता है। मेडिकल लोन अमेरिका में सबसे आम कर्जों में से एक है, और 43% अमेरिकियों ने 2023 में किसी न किसी रूप में मेडिकल बिल का कर्ज चुकाया।
भारत का हेल्थकेयर: चुनौतियाँ और उम्मीदें
- भारत में स्वास्थ्य सेवाएँ अब भी असमान हैं — महानगरों में सक्षम,
- लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कमजोर। फिर भी,
- “किफायती इलाज” और “मानवीय स्पर्श” अब भी भारत की सबसे बड़ी ताकत है।
NRI Health System India: सरकारी योजनाएँ जैसे आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, ईएसआईसी और राज्यस्तरीय योजनाएँ करोड़ों गरीबों को मुफ्त या सस्ती चिकित्सा प्रदान कर रही हैं। वहीं, निजी अस्पतालों में तकनीक और विशेषज्ञता दिन-ब-दिन अंतरराष्ट्रीय मानकों के समान होती जा रही है।
- अनिल के अनुसार — “जहां अमेरिका में डॉक्टर मरीज को ‘फाइल नंबर’ की तरह देखते हैं,
- वहीं भारत में डॉक्टर आज भी नाम से बुलाते हैं, परिवार की चिंता करते हैं।
- ये फर्क सिर्फ पैसों का नहीं, सोच का है।”
एक बड़ी सीख: विकास बनाम संवेदनशीलता
- अनिल की कहानी उस भ्रम को तोड़ती है, जिसमें लोग मान लेते हैं कि विदेश का मतलब स्वर्ग होता है। अ
- मेरिका की अर्थव्यवस्था बड़ी है, अस्पताल हाई-टेक हैं,
- लेकिन वहां का सिस्टम लाभ कमाने पर टिका है।
- भारत की व्यवस्था में खामियाँ हैं, लेकिन यहां संतुलन और सहानुभूति है।
- इंसान बीमार होता है तो केवल मरीज नहीं होता —
- वह एक परिवार, एक भावनात्मक इकाई से जुड़ा इंसान है।
- यही सोच भारतीय समाज में बची हुई है और यही “भारत की पहचान” है।
निष्कर्ष
10 साल बाद अपने देश लौटे अनिल की जुबानी यह सच्चाई किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि लाखों प्रवासियों की अनुभूति है। वह कहते हैं —
“अमेरिका ने मुझे करियर दिया, लेकिन भारत ने मुझे जीवन दिया। स्वास्थ्य की असल कीमत वहीं समझ आती है, जहां इलाज पैसा नहीं, संवेदना से होता है।”
भारत भले ही अभी विकासशील देश हो, लेकिन उसकी स्वास्थ्य-मानसिकता “संवेदनशील” है — और यही इंसानियत की सबसे बड़ी औषधि है।
