अमेरिका भारत अलायंस छोड़ा
अमेरिका भारत अलायंस छोड़ा भारत की अगुवाई वाले QUAD अलायंस में बड़ा झटका! अमेरिका ने 66 चाइनीज संगठनों को ब्लैकलिस्ट से हटाया, जिससे सैन्य सहयोग पर सवाल। इंडो-पैसिफिक रणनीति में क्रैक? चीन को राहत मिलने से भारत की चिंता बढ़ी। पूरी खबर जानें।

अमेरिका ने अपनी “अमेरिका फर्स्ट” नीति के तहत एक बड़ा और विवादास्पद कदम उठाते हुए 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संधियों और मंचों से अपनी सदस्यता वापस ले ली है, जिसमें भारत और फ्रांस के नेतृत्व वाला इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) भी शामिल है. इस फैसले ने भारत की अगुवाई वाले इस बड़े अलायंस में एक बड़ी दरार डाल दी है और वैश्विक जलवायु और ऊर्जा सहयोग के भविष्य पर सवाल खड़े कर दिए हैं.
अमेरिका भारत अलायंस छोड़ा: अमेरिका का बड़ा फैसला 66 संगठनों से बाहर निकलना
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 7 जनवरी 2026 को एक राष्ट्रपति ज्ञापन (Presidential Memorandum) पर हस्ताक्षर कर अमेरिका को 66 अंतरराष्ट्रीय संगठनों, संधियों और मंचों से बाहर निकलने का आदेश दिया. इसमें 35 गैर-संयुक्त राष्ट्र (Non-UN) संगठन और 31 संयुक्त राष्ट्र (UN) से जुड़ी संस्थाएं शामिल हैं.
व्हाइट हाउस के मुताबिक, यह फैसला उन सभी अंतरराष्ट्रीय संगठनों, सम्मेलनों और संधियों की समीक्षा के बाद लिया गया है, जिनमें अमेरिका सदस्य या पक्षकार है. ट्रंप प्रशासन का दावा है कि ये संगठन “कट्टरपंथी जलवायु नीतियों, वैश्विक शासन और वैचारिक कार्यक्रमों” को बढ़ावा देते हैं, जो अमेरिकी संप्रभुता और आर्थिक शक्ति के साथ टकराव पैदा करते हैं.
भारत की अगुवाई वाले सोलर अलायंस में क्रैक
इस फैसले की सबसे बड़ी चुनौती भारत के नेतृत्व वाले इंटरनेशनल सोलर अलायंस (ISA) के लिए है, जिससे अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर अलग होने का फैसला किया है. ISA भारत और फ्रांस के संयुक्त नेतृत्व में बना एक वैश्विक गठबंधन है, जिसका उद्देश्य सौर ऊर्जा को सस्ती, सुलभ और व्यापक बनाना है.
- अमेरिका के इस कदम से ISA के वित्तीय और राजनीतिक समर्थन में भारी कमी आएगी,
- क्योंकि अमेरिका एक बड़ी अर्थव्यवस्था और तकनीकी शक्ति है.
- अमेरिका के बाहर निकलने से अलायंस के लक्ष्यों —
- जैसे 2030 तक 1 ट्रिलियन डॉलर का निवेश जुटाना और 1000 जीडब्ल्यू सौर क्षमता बनाना —
- पर गंभीर असर पड़ सकता है.
ट्रंप का तर्क: “अमेरिका फर्स्ट” और राष्ट्रीय हित
ट्रंप प्रशासन का तर्क है कि ये संगठन अमेरिकी करदाताओं के पैसे का गलत इस्तेमाल करते हैं और अमेरिकी प्राथमिकताओं के बजाय वैश्विक एजेंडा को आगे बढ़ाते हैं. व्हाइट हाउस के बयान में कहा गया है कि ये संस्थाएं “कुप्रबंधित, अनावश्यक और फिजूलखर्ची करने वाली” हैं और अमेरिका की संप्रभुता, स्वतंत्रता और समग्र समृद्धि के लिए खतरा हैं.
- इस फैसले के तहत अमेरिका के लिए इन संगठनों में भागीदारी और फंडिंग बंद हो जाएगी,
- ताकि अमेरिकी करदाताओं के पैसे को ऐसे मिशनों में लगाया जा सके,
- जो सीधे अमेरिकी हितों से जुड़े हों. इसे ट्रंप की “अमेरिका फर्स्ट”
- नीति का एक और बड़ा कदम माना जा रहा है,
- जिसके तहत अमेरिका वैश्विक संस्थाओं से लगातार दूरी बना रहा है.
भारत के लिए चुनौतियां और रास्ते
अमेरिका के इस कदम से भारत के लिए कई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं. सबसे बड़ी चुनौती यह है कि ISA जैसे भारत के नेतृत्व वाले गठबंधन की वैश्विक विश्वसनीयता और प्रभाव पर असर पड़ेगा.
भारत को अब अपने अलायंस को मजबूत करने के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे, जैसे:
- अन्य विकसित और विकासशील देशों से ज्यादा वित्तीय और तकनीकी समर्थन जुटाना.
- निजी क्षेत्र और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को अलायंस में अधिक शामिल करना.
- अन्य बहुपक्षीय मंचों और द्विपक्षीय साझेदारियों के जरिए जलवायु और ऊर्जा सहयोग बढ़ाना.
वैश्विक प्रभाव और भविष्य
- अमेरिका के इस कदम से न केवल भारत के नेतृत्व वाले अलायंस में दरार आई है,
- बल्कि पूरे बहुपक्षीय व्यवस्था पर भी सवाल उठ रहे हैं.
- यह फैसला दिखाता है कि,
- अमेरिका अब वैश्विक संस्थाओं के बजाय द्विपक्षीय संबंधों और अपने राष्ट्रीय हितों पर ज्यादा जोर देगा.
इससे भारत के लिए एक संदेश साफ है कि वैश्विक नेतृत्व के लिए सिर्फ अलायंस बनाना काफी नहीं है, बल्कि उन्हें वित्तीय, राजनीतिक और तकनीकी तौर पर मजबूत बनाना भी जरूरी है. अगले कुछ सालों में भारत को इस चुनौती का सामना करते हुए नए तरीके से वैश्विक ऊर्जा और जलवायु नेतृत्व की राह बनानी होगी.
