भोजशाला विवाद सुप्रीम कोर्ट
भोजशाला विवाद सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट में भोजशाला विवाद पर हिंदू पक्ष को मुहूर्त बताने पर जज नाराज, तीखी सुनवाई में हिंदू-मुस्लिम दावों पर गर्मागर्म बहस। बसंत पंचमी पर प्रार्थना की अनुमति मिली।

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला-कमल मौला परिसर लंबे समय से हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच विवाद का केंद्र बना हुआ है। यह 11वीं शताब्दी का ऐतिहासिक परिसर है, जिसे हिंदू पक्ष माता वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम समुदाय इसे कमल मौला मस्जिद कहता है। हाल के वर्षों में इस विवाद ने कई कानूनी मोड़ लिए हैं, और अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। हाल ही में हुई एक सुनवाई में जज के गुस्से भरे बयान ने सुर्खियां बटोरीं, जब उन्होंने हिंदू पक्ष की ओर से पेश वकील को कड़ा संदेश दिया – “मुहूर्त हमें मत बताओ!”
भोजशाला विवाद सुप्रीम कोर्ट : भोजशाला का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
- भोजशाला परिसर परमार वंश के राजा भोज द्वारा 11वीं शताब्दी में बनवाया गया था।
- हिंदू पक्ष का दावा है कि यह मूल रूप से सरस्वती देवी का मंदिर था,
- जहां ज्ञान, विद्या और संगीत की पूजा होती थी।
- यहां प्राचीन संस्कृत शिलालेख और सरस्वती की मूर्ति के अवशेष मिलने का भी जिक्र किया जाता है।
- वहीं, मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह कमल मौला नामक
- सूफी संत की दरगाह है और इसे मस्जिद के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है।
2003 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक व्यवस्था बनाई थी, जिसमें हिंदुओं को हर मंगलवार और वसंत पंचमी के दिन पूजा करने की अनुमति दी गई, जबकि मुसलमानों को हर शुक्रवार दोपहर 1 से 3 बजे तक नमाज पढ़ने की इजाजत मिली। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब वसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ती है। ऐसे में दोनों पक्षों के बीच टकराव बढ़ जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में हालिया सुनवाई और जज का गुस्सा
जनवरी 2026 के आसपास वसंत पंचमी आने वाली थी। हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस (HFJ) के वकील विष्णु शंकर जैन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें वसंत पंचमी (23 जनवरी 2026) के दिन मस्जिद में जुम्मे की नमाज पर रोक लगाने और पूरे दिन हिंदुओं को पूजा की अनुमति देने की मांग की गई। याचिका में ASI और राज्य सरकार से सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करने की भी गुहार लगाई गई।
सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने तर्क दिया कि वसंत पंचमी सरस्वती पूजा का सबसे महत्वपूर्ण दिन है और इस दिन मुहूर्त के अनुसार पूजा अनिवार्य है। उन्होंने कोर्ट से अनुरोध किया कि नमाज पर अस्थायी रोक लगाई जाए ताकि हिंदू भक्त निर्बाध पूजा कर सकें। इसी दौरान जज ने काफी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “मुहूर्त हमें मत बताओ!” यह बयान कोर्ट रूम में मौजूद लोगों के लिए चौंकाने वाला था। जज का इशारा साफ था कि अदालत धार्मिक रस्मों या ज्योतिषीय मुहूर्त के आधार पर फैसला नहीं करती, बल्कि संविधान, कानून और मौजूदा व्यवस्थाओं के आधार पर फैसला करती है।
- यह टिप्पणी हिंदू पक्ष के तर्क को सीधे चुनौती देती नजर आई।
- जज ने आगे कहा कि कोर्ट में धार्मिक भावनाओं से ज्यादा
- संवैधानिक प्रावधानों और पूर्व व्यवस्थाओं का सम्मान होना चाहिए।
- बहस काफी तीखी हो गई,
- जहां दोनों पक्षों के वकीलों ने एक-दूसरे के दावों पर सवाल उठाए।
- हिंदू पक्ष ने ASI की 2003 वाली व्यवस्था को चुनौती देते हुए कहा
- कि जब वसंत पंचमी शुक्रवार को पड़ती है,
- तो हिंदुओं को पूरे दिन अधिकार मिलना चाहिए,
- जबकि मुस्लिम पक्ष ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता का मामला बताया।
विवाद के पिछले मोड़
- यह पहली बार नहीं है जब भोजशाला मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है।
- 2024 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने ASI को परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था।
- ASI ने सर्वे किया और अपनी रिपोर्ट हाईकोर्ट में जमा की।
- हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2024 में हाईकोर्ट को रिपोर्ट पर कोई
- कार्रवाई न करने का अंतरिम आदेश दिया था,
- क्योंकि यह पूजा स्थल अधिनियम
- (Places of Worship Act) से जुड़े अन्य मामलों के साथ जुड़ा हुआ था।
- जनवरी 2025 में CJI की बेंच ने इसे
- Places of Worship Act से जुड़े मामलों के साथ टैग करने का फैसला किया।
हिंदू पक्ष बार-बार ASI रिपोर्ट पर कार्रवाई की मांग करता रहा है, जबकि मुस्लिम पक्ष ने सर्वे को चुनौती दी। यह विवाद अब सिर्फ स्थानीय नहीं रहा, बल्कि पूरे देश में धार्मिक स्थलों के स्वरूप पर बहस का हिस्सा बन गया है।
निष्कर्ष: कानून बनाम भावनाएं
सुप्रीम कोर्ट की इस सुनवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया कि धार्मिक विवादों में अदालतें भावनाओं या परंपराओं से ज्यादा संविधान और कानून को प्राथमिकता देती हैं। जज का “मुहूर्त हमें मत बताओ” वाला बयान इसी का प्रतीक है। यह संदेश है कि कोर्ट धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन कराने वाली संस्था नहीं, बल्कि न्याय और समानता सुनिश्चित करने वाली संस्था है।
भोजशाला जैसे संवेदनशील मामलों में शांतिपूर्ण समाधान की जरूरत है। दोनों समुदायों को एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान करते हुए ASI की व्यवस्था का पालन करना चाहिए। अदालत का अंतिम फैसला जो भी आए, वह देश की धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने वाला होना चाहिए। फिलहाल, यह मामला आगे की सुनवाई के लिए लंबित है, और वसंत पंचमी जैसे त्योहारों पर तनाव बना रह सकता है। उम्मीद है कि विवेक और संयम से इस विवाद का हल निकलेगा।
