लोकसभा नियम 349
लोकसभा नियम 349 के तहत सदन में किताब, अखबार या अप्रकाशित सामग्री पढ़ना/दिखाना वर्जित है। राहुल गांधी पर पूर्व आर्मी चीफ नरवणे की अनपब्लिश्ड किताब कोट करने के उल्लंघन का आरोप लगा, जिससे लोकसभा में भारी हंगामा मचा। पूरी जानकारी!

भारतीय संसद, विशेष रूप से लोकसभा, लोकतंत्र की रक्षा करने वाली एक महत्वपूर्ण संस्था है। यहां नियम और प्रक्रियाएं सदस्यों के आचरण को नियंत्रित करती हैं ताकि सदन की गरिमा बनी रहे। हाल ही में, लोकसभा नियम 349 फिर से चर्चा में आया जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी पर इसका उल्लंघन करने का आरोप लगा। यह घटना 2026 के बजट सत्र के दौरान हुई, जब राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवाने की अप्रकाशित संस्मरण से उद्धरण देने की कोशिश की। इससे सदन में भारी हंगामा हुआ और कार्यवाही कई बार स्थगित करनी पड़ी। यह ब्लॉग पोस्ट इस नियम की व्याख्या करेगी, घटना का विवरण देगी और समझाएगी कि क्यों यह इतना विवादास्पद बना। हम विभिन्न स्रोतों से जानकारी लेकर एक संतुलित दृष्टिकोण रखेंगे, क्योंकि राजनीतिक मुद्दों में पक्षपात की संभावना रहती है।
लोकसभा नियम 349 क्या है?
लोकसभा के नियम और प्रक्रिया (Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha) में नियम 349 सदस्यों द्वारा सदन में पालन किए जाने वाले आचरण के नियमों का संग्रह है। यह नियम सदन की गरिमा, अनुशासन और सुचारू कार्यवाही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है। इसमें कुल 23 उप-नियम हैं, जो विभिन्न प्रकार के व्यवहार को नियंत्रित करते हैं।
कुछ प्रमुख उप-नियम इस प्रकार हैं:
उप-नियम (i)
- कोई सदस्य सदन के कार्य से जुड़े अलावा कोई किताब,
- समाचार पत्र या पत्र नहीं पढ़ सकता।
- यह नियम अप्रकाशित सामग्री या असंबंधित दस्तावेजों से उद्धरण देने पर रोक लगाता है।
उप-नियम (ii)
कोई सदस्य दूसरे सदस्य की बात को अव्यवस्थित अभिव्यक्ति, शोर या अन्य अव्यवस्थित तरीके से बाधित नहीं कर सकता।
उप-नियम (xvi)
- सदन की बैठक के दौरान कोई सदस्य झंडे,
- प्रतीक चिन्ह या कोई प्रदर्शनी नहीं दिखा सकता।
- उदाहरण के लिए, 2025 में DMK सांसदों द्वारा स्लोगन
- वाली टी-शर्ट पहनने पर स्पीकर ओम बिरला ने इसी नियम का हवाला दिया था।
अन्य उप-नियम:
सदस्यों को सदन में धूम्रपान, खाना-पीना या अनुचित भाषा का उपयोग करने से मना किया गया है। यह नियम संसदीय परंपराओं पर आधारित है और इसका उद्देश्य सदन को एक पेशेवर और सम्मानजनक स्थान बनाए रखना है।
- यह नियम 1952 से लागू है और समय-समय पर संशोधित किया गया है।
- 2010 में पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान इसमें कुछ बदलाव किए गए थे।
- हालांकि, यह संविधान के अनुच्छेद 349 से अलग है,
- जो भाषा से संबंधित कानूनों की विशेष प्रक्रिया पर है।
- कई बार लोग इन दोनों को भ्रमित कर देते हैं,
- लेकिन लोकसभा का नियम 349 पूरी तरह से सदस्यों के आचरण से जुड़ा है।
घटना की पृष्ठभूमि
यह विवाद 2026 के बजट सत्र के दौरान राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के बहस में उभरा। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर हमला करते हुए पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवाने के अप्रकाशित संस्मरण से उद्धरण देने की कोशिश की। यह संस्मरण डोक्लाम और गलवान घाटी के सीमा विवादों पर आधारित था, जहां उन्होंने कथित रूप से कहा था कि चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र में घुस आए थे।
राहुल गांधी ने कहा कि यह उद्धरण एक पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट से लिया गया था, जो “100% प्रामाणिक” है। उन्होंने सरकार पर आरोप लगाया कि वह राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर चुप्पी साधे हुए है और विपक्ष को बोलने नहीं दे रही। लेकिन रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने तुरंत आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि अप्रकाशित किताब से उद्धरण देना नियम 349(i) का उल्लंघन है, क्योंकि यह सदन के कार्य से सीधे जुड़ा नहीं है और प्रामाणिकता की पुष्टि नहीं हुई।
यह पहली बार नहीं है जब राहुल गांधी पर ऐसे आरोप लगे। 2024 में उनके भाषण के कुछ हिस्सों को हटा दिया गया था, और 2023 में मानहानि मामले में उनकी सदस्यता रद्द हुई थी (जो बाद में बहाल हुई)। लेकिन यह घटना विशेष रूप से विवादास्पद बनी क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी थी।
राहुल गांधी पर उल्लंघन का आरोप
Rahul गांधी पर मुख्य आरोप नियम 349(i) का उल्लंघन है। स्पीकर ओम बिरला ने स्पष्ट कहा कि अप्रकाशित सामग्री या असंबंधित समाचार क्लिपिंग से पढ़ना नियम के खिलाफ है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने इसे संवैधानिक उल्लंघन बताया और कहा कि राहुल गांधी देश की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहे हैं। उन्होंने इसे “देशद्रोह का उच्चतम स्तर” कहा।
राहुल गांधी ने बचाव में कहा कि वह एक प्रकाशित पत्रिका से पढ़ रहे थे, न कि किताब से। उन्होंने पूछा, “इसमें क्या ऐसा है जो सरकार को इतना डरा रहा है?” तृणमूल कांग्रेस की महुआ मोइत्रा ने समर्थन में कहा कि भारत-चीन संबंध सदन के कार्य का हिस्सा हैं और नियम 349 इसका उल्लंघन नहीं है। विपक्ष ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया।
हालांकि, सरकारी पक्ष का तर्क है कि अप्रकाशित सामग्री की प्रामाणिकता साबित नहीं है, जो सदन की गरिमा को प्रभावित कर सकती है। यह आरोप राहुल गांधी की छवि को प्रभावित कर सकता है, खासकर 2024 चुनावों के बाद जहां कांग्रेस ने मजबूत प्रदर्शन किया था।
सदन में हंगामा क्यों मचा?
हंगामा मुख्य रूप से राजनीतिक विभाजन से उपजा। विपक्ष का मानना है कि सरकार असुविधाजनक सवालों से बच रही है, जैसे सीमा विवाद और आर्थिक मुद्दे। राहुल के उद्धरण से सदन में शोर मच गया, ट्रेजरी बेंच से आपत्तियां आईं और विपक्ष ने विरोध किया। स्पीकर ने सदन को कई बार स्थगित किया – पहले 3 बजे तक, फिर 4 बजे तक।
- यह हंगामा संसद की कार्यवाही में बाधा डालता है,
- लेकिन कुछ विश्लेषकों का कहना है कि यह लोकतंत्र का हिस्सा है।
- SSRN के एक पेपर में कहा गया है कि विपक्षी व्यवधान पॉपुलिस्ट राजनीति का जवाब हो सकते हैं।
- भाजपा ने इसे राहुल गांधी की “विदेशी ताकतों” से सांठगांठ बताया,
- जबकि कांग्रेस ने इसे सेंसरशिप कहा।
- 2023 में लंदन में राहुल के बयान पर भी इसी तरह हंगामा हुआ था।
विभिन्न पक्षों की प्रतिक्रियाएं
भाजपा: राहुल को “राष्ट्रविरोधी” बताया और कहा कि वह संसद को बदनाम कर रहे हैं।
- कांग्रेस और विपक्ष: इसे लोकतंत्र पर हमला कहा।
- महुआ मोइत्रा ने कहा, “भारत-चीन संबंध सदन में चर्चा योग्य हैं।”
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, अमेरिकी सांसद रो खन्ना ने राहुल की
- सदस्यता रद्द होने (2023) को लोकतंत्र की “गहरी धोखाधड़ी” कहा था।
मीडिया: इंडियन एक्सप्रेस ने इसे राजनीतिक तूफान बताया, जबकि हिंदुस्तान टाइम्स ने स्पीकर की भूमिका पर फोकस किया।
निष्कर्ष
लोकसभा नियम 349 सदन की गरिमा की रक्षा करता है, लेकिन इसका उपयोग राजनीतिक हथियार के रूप में भी हो सकता है। राहुल गांधी पर लगा आरोप दिखाता है कि संसद में बहस कितनी तीखी हो सकती है। यह घटना लोकतंत्र की मजबूती का परीक्षण है – जहां विपक्ष को बोलने का अधिकार है, लेकिन नियमों का पालन जरूरी। अंत में, ऐसे विवादों से संसद की उत्पादकता प्रभावित होती है, जो आम जनता के हितों के लिए हानिकारक है। हमें एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहिए जहां नियमों का सम्मान हो और सवालों का जवाब मिले।
