अडानी ग्रुप मामला
अडानी ग्रुप मामला अडानी ग्रुप को US SEC से दो बार समन, लेकिन मोदी सरकार ने प्रक्रियात्मक आधार पर ठुकरा दिया। कानूनी जंग में नया ट्विस्ट, अब SEC कोर्ट से ईमेल सर्विस की मांग, जाने आगे क्या होगा ?

भारतीय कारोबारी जगत में गौतम अडानी का नाम हमेशा सुर्खियों में रहता है, लेकिन अब उनकी कानूनी लड़ाई एक नए और विवादास्पद मोड़ पर पहुंच गई है। अमेरिकी सिक्योरिटीज एंड एक्सचेंज कमीशन (SEC) ने गौतम अडानी और उनके बेटे सागर अडानी को एक बड़े धोखाधड़ी और रिश्वत मामले में समन (सम्मन) जारी किया था। लेकिन भारत की मोदी सरकार ने इन समनों को दो बार ठुकरा दिया, जिससे मामला और उलझ गया है।
अब SEC ने अमेरिकी फेडरल कोर्ट से अनुमति मांगी है कि वह भारतीय सरकार को बायपास करके ईमेल के जरिए सीधे अडानी को समन भेज सके। यह घटना न सिर्फ अडानी ग्रुप के लिए, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों और अंतरराष्ट्रीय कानूनी प्रक्रिया के लिए भी बड़ा ट्विस्ट है।
अडानी ग्रुप मामला क्या है?
यह सब 2024 में शुरू हुआ, जब अमेरिकी DOJ (डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस) और SEC ने अडानी ग्रुप पर गंभीर आरोप लगाए। आरोप है कि अडानी ग्रुप ने सौर ऊर्जा प्रोजेक्ट्स के लिए भारतीय अधिकारियों को करीब 265 मिलियन डॉलर (लगभग 2,200 करोड़ रुपये) की रिश्वत दी। यह रिश्वत सौर पैनल सप्लाई और अन्य कॉन्ट्रैक्ट्स हासिल करने के लिए दी गई थी। SEC ने इसे सिक्योरिटीज फ्रॉड (धोखाधड़ी) का मामला बताया, क्योंकि इससे अमेरिकी निवेशकों को गुमराह किया गया।
इसके बाद SEC ने गौतम अडानी और सागर अडानी को औपचारिक रूप से समन जारी किया, ताकि वे जांच में शामिल हों और जवाब दें। लेकिन समन पहुंचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत भारत सरकार की मदद जरूरी थी। हाग कन्वेंशन (Hague Convention) के तहत भारत के लॉ मिनिस्ट्री को यह जिम्मेदारी दी गई थी कि वह समन को अडानी तक पहुंचाए।
मोदी सरकार ने दो बार क्यों ठुकराया?
- रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत की लॉ मिनिस्ट्री ने दो बार SEC के अनुरोध को खारिज कर दिया।
- पहला इनकार अप्रैल 2025 में हुआ,
- जहां कारण बताया गया कि समन पर इंक सिग्नेचर और ऑफिशियल सील नहीं थी।
- दूसरा इनकार दिसंबर 2025 में हुआ, जहां फिर प्रोसीजरल कमियां बताई गईं।
- SEC ने कोर्ट फाइलिंग में कहा कि ये कारण हाग कन्वेंशन के तहत जरूरी नहीं थे,
- और भारत ने जानबूझकर देरी की।
कई मीडिया रिपोर्ट्स में इसे “14 महीने से समन रोकने” के रूप में पेश किया गया है। विपक्षी दल और कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया इसे मोदी सरकार का अडानी को बचाने का प्रयास बता रहे हैं। वहीं, सरकार के समर्थक इसे सिर्फ प्रोसीजरल मुद्दा मानते हैं, न कि राजनीतिक हस्तक्षेप।
नया ट्विस्ट: ईमेल से समन?
- अब SEC ने अमेरिकी फेडरल कोर्ट में याचिका दायर की है
- कि चूंकि भारत सरकार समन नहीं पहुंचा रही,
- इसलिए कोर्ट अडानी को उनके ज्ञात ईमेल एड्रेस पर या
- उनके वकील के जरिए समन भेजने की अनुमति दे।
- अगर कोर्ट यह अनुमति देता है,
- तो यह एक बड़ा बदलाव होगा,
- क्योंकि आमतौर पर ऐसे मामलों में सरकारी चैनल से ही समन पहुंचाए जाते हैं।
अडानी ग्रुप ने हमेशा इन आरोपों से इनकार किया है। ग्रुप का कहना है कि आरोप निराधार हैं और वे कानूनी प्रक्रिया का सामना करने को तैयार हैं। लेकिन अगर ईमेल से समन पहुंचता है, तो अडानी को जल्द ही जवाब देना होगा, वरना कोर्ट में डिफॉल्ट जजमेंट हो सकता है।
आगे क्या होगा?
यह मामला अब कई स्तरों पर प्रभाव डालेगा:
- अडानी ग्रुप पर असर – शेयर मार्केट में गिरावट देखी जा रही है। निवेशकों का भरोसा प्रभावित हो सकता है।
- भारत-अमेरिका संबंध – दोनों देशों के बीच ट्रेड और इन्वेस्टमेंट मजबूत हैं, लेकिन यह केस राजनीतिक तनाव पैदा कर सकता है।
- कानूनी प्रक्रिया – अगर कोर्ट ईमेल अनुमति देता है, तो जांच तेज हो सकती है। अडानी को अमेरिकी कोर्ट में पेश होना पड़ सकता है या सेटलमेंट करना पड़ सकता है।
- भारतीय राजनीति – विपक्ष इसे “क्रोनी कैपिटलिज्म” का सबूत बता रहा है, जबकि सरकार इसे कानूनी प्रक्रिया का मामला कह रही है।
- यह कानूनी जंग लंबी चल सकती है।
- अडानी ग्रुप के पास मजबूत लीगल टीम है, और वे इसे चुनौती देंगे।
- लेकिन अगर अमेरिकी कोर्ट सख्त हुआ, तो मामले में बड़ा खुलासा हो सकता है।
- फिलहाल, यह सिर्फ शुरुआत है –
- आगे की सुनवाई और फैसले तय करेंगे कि अडानी की इस जंग का अंत क्या होगा।
क्या यह सिर्फ एक बिजनेस केस है या राजनीति का खेल? समय बताएगा। लेकिन एक बात साफ है – अडानी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़ी जांच के दायरे में हैं।
