अजित पवार राजनीति
अजित पवार राजनीति अजित पवार ने शरद पवार की छाया से निकलकर महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ बनकर तूफान मचाया। 35 साल की जंग, विद्रोह, सत्ता की दौड़ और निजी जीवन की अनसुनी कहानी।

महाराष्ट्र की राजनीति में ‘दादा’ के नाम से मशहूर अजित पवार का सफर एक ऐसी कहानी है, जो परिवार, सत्ता, और महत्वाकांक्षा से भरी पड़ी है। 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर जिले के देवलाली प्रवर में जन्मे अजित अनंतराव पवार शरद पवार के बड़े भाई अनंतराव पवार के बेटे थे। बचपन से ही राजनीति की हवा में पले-बढ़े अजित ने अपने चाचा शरद पवार को राजनीतिक गुरु माना और उनकी छाया में ही अपनी पहचान बनाई। लेकिन समय के साथ यही छाया उनके लिए बोझ बन गई, और 35 साल की लंबी जंग के बाद उन्होंने 2023 में खुला विद्रोह कर दिया। यह विद्रोह न सिर्फ एनसीपी को दो हिस्सों में बांट गया, बल्कि पवार परिवार की एकता को भी चुनौती दी।
अजित पवार राजनीति में प्रवेश और चाचा की छाया
अजित पवार ने राजनीति की शुरुआत 1982 में सहकारिता क्षेत्र से की। एक सहकारी चीनी मिल के बोर्ड में चुने जाने के साथ उनका सफर शुरू हुआ। महाराष्ट्र में सहकारिता आंदोलन राजनीति की रीढ़ माना जाता है, और शरद पवार जैसे दिग्गज नेता इसी से उभरे थे। अजित ने भी इसी रास्ते पर चलते हुए 1991 में बारामती लोकसभा सीट से सांसद बने। लेकिन उन्होंने यह सीट जल्द ही अपने चाचा शरद पवार के लिए छोड़ दी, ताकि शरद केंद्र में रक्षा मंत्री बन सकें। यह त्याग उनकी वफादारी का प्रतीक था।
इसके बाद अजित ने विधानसभा की ओर रुख किया और बारामती से लगातार कई बार विधायक चुने गए। 1990 के दशक में शरद पवार मुख्यमंत्री बने तो अजित को मंत्री बनाया गया। सिंचाई, ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण विभाग उनके पास रहे। 1999 में जब शरद पवार ने कांग्रेस से अलग होकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) बनाई, तो अजित उनके साथ थे। वे एनसीपी के संगठन को मजबूत करने वाले प्रमुख स्तंभ बने। कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ इतनी मजबूत थी कि लोग उन्हें ‘दादा’ कहकर बुलाने लगे—एक ऐसा नाम जो स्नेह और सख्ती दोनों का प्रतीक था।
सत्ता की सीढ़ियां और मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा
- अजित पवार महाराष्ट्र में कई बार उपमुख्यमंत्री बने—करीब 5 बार यह पद संभाला।
- वे प्रशासनिक कुशलता, समय की पाबंदी और संगठनात्मक कौशल के लिए जाने जाते थे।
- लेकिन उनके मन में हमेशा मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रही।
- चाचा शरद पवार की मौजूदगी में यह सपना अधूरा रह गया।
- 2019 में पहली बार उन्होंने बड़ा कदम उठाया—
- चुनाव के बाद रातों-रात देवेंद्र फडणवीस के साथ जाकर सरकार बनाने की कोशिश की।
- लेकिन शरद पवार की चतुराई से यह प्रयास मात्र 80 घंटे टिका।
- अजित वापस लौट आए, लेकिन मन में विद्रोह की चिंगारी सुलगती रही।
2023 का बड़ा विद्रोह: छाया से मुक्ति
जुलाई 2023 में अजित पवार ने आखिरकार खुला विद्रोह किया। एनसीपी के अधिकांश विधायकों को साथ लेकर उन्होंने भाजपा-शिवसेना (शिंदे गुट) वाली महायुति सरकार में शामिल होकर उपमुख्यमंत्री की शपथ ली। यह महाराष्ट्र की राजनीति में भूकंप जैसा था। एनसीपी दो गुटों में बंट गई—एक अजित पवार के नेतृत्व में, दूसरा शरद पवार के पास। चुनाव आयोग ने फरवरी 2024 में पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह अजित गुट को दे दिया। शरद पवार गुट को ‘एनसीपी (शरदचंद्र पवार)’ कहा जाने लगा।
- यह विद्रोह सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि पारिवारिक भी।
- अजित की बेटी सुप्रिया सुले और पोते रोहित पवार शरद पवार के साथ रहे।
- लेकिन अजित ने अपनी अलग पहचान बनाई।
- वे कहते थे कि उन्हें बार-बार मुख्यमंत्री बनने का मौका नहीं मिला,
- इसलिए अब वे अपना रास्ता चुन रहे हैं।
दादा बनने की कहानी और विरासत
- अजित पवार की जिंदगी में राजनीति के अलावा परिवार भी महत्वपूर्ण था।
- उनकी पत्नी सुनेत्रा पवार भी राजनीति में सक्रिय रहीं और राज्या सभा पहुंचीं।
- उनके बेटे पार्थ और जय भी राजनीतिक सफर में कदम रख चुके हैं।
- लेकिन ‘दादा’ बनने का मतलब सिर्फ परिवार से नहीं था—
- यह महाराष्ट्र की जनता के बीच उनकी छवि थी।
- कार्यकर्ता उन्हें ‘दादा’ कहते थे क्योंकि वे सख्त लेकिन देखभाल करने वाले थे।
अजित पवार की 35 साल की सियासी जंग हमें सिखाती है कि राजनीति में छाया से निकलना आसान नहीं होता। लेकिन उन्होंने यह कर दिखाया। चाहे विवाद रहे हों, सिंचाई घोटाले के आरोप हों या पारिवारिक मतभेद, अजित ने कभी हार नहीं मानी। उनकी मौत (28 जनवरी 2026 को विमान दुर्घटना में) ने महाराष्ट्र की राजनीति को झकझोर दिया, लेकिन उनकी कहानी—चाचा की छाया से विद्रोह तक—हमेशा याद रहेगी।
यह सफर महत्वाकांक्षा, वफादारी और अलगाव का मिश्रण था। अजित पवार न सिर्फ एक नेता थे, बल्कि महाराष्ट्र की राजनीति के एक अध्याय थे।
