UGC नियम सुप्रीम कोर्ट
UGC नियम सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोर्ट में UGC के नए इक्विटी नियमों पर हंगामा! CJI ने कहा- ‘हमें सब पता है’। याचिका पर जल्द सुनवाई, विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और भेदभाव पर बड़ा फैसला आने वाला है।

भारत की न्याय व्यवस्था में कभी-कभी एक छोटा-सा बयान पूरे विवाद को नई दिशा दे देता है। 27 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट में ठीक ऐसा ही हुआ, जब मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने UGC के नए ‘इक्विटी रेगुलेशन’ को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए कहा, “हमें सब पता है क्या हो रहा है!” (We know what is happening!)। यह बयान न सिर्फ अदालत की जागरूकता को दर्शाता है, बल्कि इस बात का भी संकेत देता है कि उच्च शिक्षा में समानता के नाम पर लाए गए नए नियम अब गंभीर कानूनी जांच के दायरे में हैं। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को जल्द सूचीबद्ध करने की मंजूरी दे दी है, जिससे यह सवाल और गहरा हो गया है – अब क्या होगा?
UGC के नए नियम क्या हैं और विवाद क्यों?
यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को “उच्च शिक्षण संस्थानों में समता को बढ़ावा देने हेतु विनियम, 2026” (Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026) अधिसूचित किए। ये नियम 2012 के पुराने, केवल सलाहकारी दिशानिर्देशों को बदलते हुए अनिवार्य कर देते हैं। मुख्य प्रावधान यह है कि हर उच्च शिक्षण संस्थान (विश्वविद्यालय, कॉलेज आदि) में एक इक्विटी कमेटी गठित की जाएगी। इस कमेटी में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), दिव्यांगजन और महिलाओं का प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा।
कमेटी का काम होगा – जाति, लिंग, विकलांगता आदि आधार पर होने वाले भेदभाव की शिकायतों की जांच करना, निवारण करना और संस्थान में समानता सुनिश्चित करना। लेकिन विवाद का मुख्य केंद्र भेदभाव की परिभाषा है। नए नियमों में “जाति-आधारित भेदभाव” को केवल आरक्षित वर्गों (SC/ST/OBC) के खिलाफ होने वाले भेदभाव तक सीमित रखा गया है। यानी सामान्य वर्ग (General Category) के छात्रों, शिक्षकों या कर्मचारियों के खिलाफ होने वाला कोई जातिगत उत्पीड़न या भेदभाव इस कमेटी के दायरे में नहीं आएगा। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह एकतरफा और भेदभावपूर्ण है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और 15 (भेदभाव निषेध) का उल्लंघन करता है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
- याचिका “राहुल देवन और अन्य बनाम संघ” के नाम से दाखिल की गई,
- जिसमें सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी राहुल देवन पक्षकार हैं।
- याचिकाकर्ता के वकील ने तत्काल सुनवाई की मांग की और कहा,
- “इस रेगुलेशन से सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव की संभावना है।”
- CJI सूर्यकांत ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “हमें पता है क्या हो रहा है।
- पहले याचिका में कमियां दूर करें, हम इसे सूचीबद्ध करेंगे।”
- यह बयान अदालत की गंभीरता को दिखाता है।
- पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची भी शामिल थे।
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को जल्द लिस्ट करने की सहमति दी है, जिसका मतलब है कि आने वाले हफ्तों में इस पर विस्तृत बहस होगी। पहले से ही कई अन्य याचिकाएं इस मुद्दे पर दाखिल हैं, इसलिए संभव है कि सभी को एक साथ जोड़कर सुनवाई हो।
UGC नियम सुप्रीम कोर्ट : अब क्या होगा? संभावित परिदृश्य
अंतरिम राहत:
- सुप्रीम कोर्ट नए नियमों पर स्टे (रोक) लगा सकता है,
- खासकर तब जब याचिकाकर्ता यह साबित कर दें कि नियम लागू होने से सामान्य वर्ग को तत्काल नुकसान हो रहा है।
नियमों में संशोधन:
- केंद्र सरकार और UGC को नियमों में बदलाव करने का निर्देश मिल सकता है,
- जैसे भेदभाव की परिभाषा को समावेशी बनाना – यानी सभी वर्गों के लिए सुरक्षा।
पूर्ण सुनवाई और फैसला:
- अगर अदालत नियमों को असंवैधानिक घोषित करती है,
- तो UGC को नए सिरे से दिशानिर्देश बनाने पड़ेंगे।
- वहीं, अगर नियम बरकरार रहते हैं,
- तो उच्च शिक्षा में इक्विटी कमेटियों की भूमिका और मजबूत हो जाएगी।
राजनीतिक प्रभाव:
- यह मामला आरक्षण, सामाजिक न्याय और मेरिट के बीच चल रही बहस को और तेज करेगा।
- सामान्य वर्ग के संगठन इसे “रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन” कह रहे हैं,
- जबकि आरक्षित वर्ग के समूह इसे समानता की दिशा में कदम मानते हैं।
निष्कर्ष
CJI का “हमें सब पता है” वाला बयान सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि उच्च शिक्षा में हो रहे बदलावों पर न्यायपालिका की पैनी नजर का संकेत है। UGC का इरादा भले ही अच्छा हो – जातिगत भेदभाव को खत्म करना – लेकिन क्रियान्वयन में अगर एक वर्ग को सुरक्षा से वंचित किया जाता है, तो यह संविधान की मूल भावना के खिलाफ जाता है। अब सुप्रीम कोर्ट की बारी है कि वह इस विवाद को निष्पक्षता से सुलझाए, ताकि उच्च शिक्षा समानता और मेरिट दोनों का मेल बन सके।
यह मामला न सिर्फ UGC के नियमों का, बल्कि भारत में सामाजिक न्याय की परिभाषा का भी परीक्षण है। आने वाले दिनों में सुनवाई के दौरान जो भी फैसला आएगा, वह लाखों छात्रों, शिक्षकों और संस्थानों की जिंदगी को प्रभावित करेगा।
