मल्लिकार्जुन खरगे ने CEC ज्ञानेश कुमार
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को लेकर एक बार फिर तीखी प्रतिक्रिया दी है। 29 सितंबर 2026 को कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) की बैठक में खरगे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने की मांग की। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग भी की और आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के कामकाज पर राजनीतिक दबाव का असर पड़ रहा है।
यह विवाद मुख्य रूप से मतदाता सूची के Special Intensive Revision (SIR), चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और चुनाव आयोग के भीतर कथित मतभेदों को लेकर चल रहा है।
खरगे ने क्या आरोप लगाए?
कांग्रेस अध्यक्ष ने CWC बैठक में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त पर केंद्र सरकार की ओर से दबाव डाला जा रहा है। उन्होंने CEC ज्ञानेश कुमार को लेकर बेहद कड़ा राजनीतिक बयान दिया और उनके तत्काल हटाए जाने की मांग रखी।
खरगे ने यह भी कहा कि चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और मतदाता के अधिकारों को लेकर उठ रहे सवालों को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये कांग्रेस और खरगे द्वारा लगाए गए राजनीतिक आरोप हैं। इन आरोपों का अंतिम कानूनी या न्यायिक निष्कर्ष अलग प्रक्रिया से तय होगा।
SIR बना विवाद का मुख्य केंद्र
वर्तमान विवाद में SIR यानी Special Intensive Revision सबसे प्रमुख मुद्दों में से एक है। इसके तहत मतदाता सूची की जांच और पुनरीक्षण किया जा रहा है।
कांग्रेस का आरोप है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता नहीं है। पार्टी ने चुनाव आयोग से मतदाता सूची में हुए बड़े बदलावों का पूरा डेटा सार्वजनिक करने की मांग की है।
दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े फैसले आयोग की निर्धारित प्रक्रिया के तहत लिए गए और अंतिम निर्णयों में सभी तीन चुनाव आयुक्तों की सहमति थी।
कांग्रेस ने रखीं पांच प्रमुख मांगें
CWC की बैठक के दौरान कांग्रेस ने मतदाता सूची और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता को लेकर कई मांगें सामने रखीं।
इनमें प्रमुख रूप से:
- मतदाता सूची में बड़े बदलावों का पूरा डेटा सार्वजनिक करना।
- राजनीतिक दलों को मतदाता सूची और संबंधित आंकड़े सरल प्रारूप में समय पर उपलब्ध कराना।
- गंभीर गड़बड़ी के प्रमाण मिलने पर स्वतंत्र और समयबद्ध जांच कराना।
- मतदाता सूची से नाम हटाए जाने वाले मतदाताओं को इसकी जानकारी देना।
- प्रभावित मतदाताओं को आपत्ति और अपील का पर्याप्त अवसर देना।
कांग्रेस का कहना है कि मतदाताओं को यह भरोसा होना चाहिए कि उनका वोट सुरक्षित है।
चुनाव आयोग के भीतर मतभेद का दावा
इस विवाद को उस रिपोर्ट के बाद और अधिक चर्चा मिली जिसमें चुनाव आयोग के दो सदस्यों द्वारा SIR और अन्य चुनावी मामलों से जुड़े कुछ निर्णयों पर कथित आपत्तियों का उल्लेख किया गया था।
रिपोर्टों के अनुसार चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने करीब 10 महीने के दौरान कई मामलों में सवाल या आपत्तियां उठाईं। इनमें Form 6, मतदाता सूची से नाम हटाने और चुनावी डेटाबेस तक पहुंच जैसे मुद्दे शामिल बताए गए।
हालांकि चुनाव आयोग ने इन घटनाओं को अंतिम निर्णयों में संस्थागत असहमति के रूप में स्वीकार नहीं किया है।
चुनाव आयोग का क्या कहना है?
चुनाव आयोग के अनुसार बहुसदस्यीय संस्था में निर्णय लेने से पहले अधिकारियों और आयुक्तों के बीच सुझाव, टिप्पणियां और सवाल उठना सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा है।
आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और सभी तीन चुनाव आयुक्तों की मंजूरी इसमें शामिल थी।
इसलिए विवाद का एक प्रमुख बिंदु यह है कि आंतरिक स्तर पर दर्ज टिप्पणियों को किस तरह समझा जाए—विपक्ष इन्हें गंभीर मतभेद के संकेत के रूप में देख रहा है, जबकि आयोग इन्हें निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा बता रहा है।
ज्ञानेश कुमार की मौजूदा स्थिति क्या है?
भारत निर्वाचन आयोग की आधिकारिक अधिकारियों की सूची में ज्ञानेश कुमार मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में दर्ज हैं।
उनके साथ सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी चुनाव आयुक्त के रूप में सूचीबद्ध हैं।
इसलिए कांग्रेस की ओर से हटाने की मांग को पद से हटाए जाने की कार्रवाई नहीं समझना चाहिए।
किसी संवैधानिक पदाधिकारी को हटाने की प्रक्रिया अलग संवैधानिक और संसदीय चरणों से गुजरती है।
सुप्रीम कोर्ट में भी मामला
चुनाव आयोग और CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज से जुड़े मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट में भी
याचिका पहुंच चुकी है। अदालत ने मामले की सुनवाई के लिए सहमति जताई है।
याचिका में SIR और चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े कानूनी सवाल उठाए गए हैं।
इसमें यह भी तर्क दिया गया है कि
आयोग के अधिकारों का इस्तेमाल सामूहिक निर्णय प्रक्रिया के अनुरूप होना चाहिए।
इस मामले में अदालत की सुनवाई से चुनाव आयोग की
कार्यप्रणाली से जुड़े कानूनी पहलुओं पर आगे स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
खरगे ने प्रधानमंत्री मोदी से क्या मांग की?
CWC बैठक में खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग भी की। उनका आरोप है कि
प्रधानमंत्री की ओर से CEC पर दबाव डाला गया, जिसके कारण चुनाव आयोग की स्वतंत्रता पर सवाल खड़े हुए हैं।
यह कांग्रेस अध्यक्ष की राजनीतिक मांग है। प्रधानमंत्री की ओर से इस आरोप पर
कोई ऐसा निष्कर्ष स्वतः स्थापित नहीं होता; आरोप और प्रमाणित तथ्य अलग-अलग विषय हैं।
लोकतंत्र को लेकर क्यों बढ़ा विवाद?
भारत में चुनाव आयोग की भूमिका चुनाव प्रक्रिया की निगरानी और मतदाता सूची के
प्रबंधन से सीधे जुड़ी है। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने से
संबंधित कोई भी विवाद राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बन जाता है।
विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया अधिक पारदर्शी होनी चाहिए।
चुनाव आयोग का पक्ष है कि SIR कानूनी और निर्धारित प्रक्रियाओं के तहत किया जा रहा है।
इसी अंतर के कारण इस मुद्दे पर संसद, राजनीतिक दलों और न्यायपालिका—तीनों स्तरों पर चर्चा तेज हुई है।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में कई घटनाक्रम महत्वपूर्ण होंगे। कांग्रेस संसद में इस मुद्दे को उठाने की तैयारी कर रही है और
CEC को हटाने की मांग पर आगे की राजनीतिक रणनीति भी बनाई जा रही है।
दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से जुड़े कानूनी सवालों पर
सुनवाई होने वाली है। इससे विवाद के संवैधानिक और कानूनी पहलुओं पर आगे तस्वीर साफ हो सकती है।
निष्कर्ष
मल्लिकार्जुन खरगे के ताजा बयान के बाद चुनाव आयोग और केंद्र सरकार को लेकर
राजनीतिक विवाद और तेज हो गया है। कांग्रेस ने CEC ज्ञानेश कुमार को हटाने, चुनावी प्रक्रिया में
अधिक पारदर्शिता और मतदाता सूची से जुड़े मामलों की स्वतंत्र जांच की मांग की है।
वहीं चुनाव आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े उसके अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए हैं।
इस पूरे विवाद में राजनीतिक आरोपों, चुनाव आयोग के आधिकारिक पक्ष और अदालत में चल रही
कानूनी प्रक्रिया को अलग-अलग देखना महत्वपूर्ण होगा।
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