चीन ने अपने 'आर्टिफिशियल सन' प्रोजेक्ट
स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में चीन की बड़ी उपलब्धि
चीन ने स्वच्छ और असीमित ऊर्जा के क्षेत्र में एक और ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। देश के “आर्टिफिशियल सन” (Artificial Sun) प्रोजेक्ट के लिए विकसित दुनिया के सबसे बड़े सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट ने सभी आवश्यक परीक्षण सफलतापूर्वक पूरे कर लिए हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह उपलब्धि भविष्य में न्यूक्लियर फ्यूजन आधारित बिजली उत्पादन को व्यावहारिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह परियोजना चीन के Experimental Advanced Superconducting Tokamak (EAST) और उससे जुड़े फ्यूजन अनुसंधान कार्यक्रम का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य सूर्य की तरह ऊर्जा उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया को पृथ्वी पर नियंत्रित रूप से दोहराना है।
क्या है ‘आर्टिफिशियल सन’?
‘आर्टिफिशियल सन’ वास्तव में कोई कृत्रिम सूर्य नहीं है, बल्कि एक अत्याधुनिक न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर है। इसका उद्देश्य सूर्य के केंद्र में होने वाली परमाणु संलयन (Nuclear Fusion) प्रक्रिया को प्रयोगशाला में दोहराना है।
फ्यूजन प्रक्रिया में हाइड्रोजन के हल्के परमाणु अत्यधिक तापमान और दबाव पर मिलकर हीलियम बनाते हैं, जिससे अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा निकलती है। यही प्रक्रिया सूर्य को लगातार ऊर्जा प्रदान करती है।
यदि वैज्ञानिक इसे सुरक्षित और नियंत्रित तरीके से व्यावसायिक स्तर पर सफल बना लेते हैं, तो भविष्य में दुनिया को लगभग असीमित, स्वच्छ और कार्बन-मुक्त ऊर्जा मिल सकती है।
दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट क्यों है खास?
चीन द्वारा तैयार किया गया यह सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट फ्यूजन रिएक्टर का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।
यह विशाल मैग्नेट लगभग 582 टन वजनी है तथा इसका आकार लगभग 21 मीटर लंबा, 12 मीटर चौड़ा और 3.3 मीटर ऊंचा है। यह प्लाज्मा को अत्यधिक तापमान पर स्थिर रखने के लिए शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र तैयार करता है। विशेषज्ञों के अनुसार इसका आयतन अंतरराष्ट्रीय ITER परियोजना के समान मैग्नेट से लगभग 1.3 गुना बड़ा और ऊर्जा भंडारण क्षमता लगभग तीन गुना अधिक है।
मैग्नेट की क्या होती है भूमिका?
फ्यूजन रिएक्टर के भीतर प्लाज्मा का तापमान करोड़ों डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इतनी गर्म अवस्था में कोई भी सामान्य धातु इसे सीधे नहीं झेल सकती।
इसीलिए सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र बनाता है, जो प्लाज्मा को रिएक्टर की दीवारों से दूर रखता है। यदि यह चुंबकीय नियंत्रण न हो तो प्लाज्मा फैल जाएगा और फ्यूजन प्रक्रिया संभव नहीं होगी।
चीन ने हासिल की तकनीकी आत्मनिर्भरता
चीन के वैज्ञानिकों के अनुसार इस परियोजना में उपयोग किए गए विशेष स्टेनलेस स्टील, इन्सुलेशन सामग्री और सुपरकंडक्टिंग पदार्थ अब पूरी तरह घरेलू तकनीक से विकसित किए गए हैं। इससे चीन ने
फ्यूजन रिएक्टर के प्रमुख घटकों के निर्माण में तकनीकी आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यह उपलब्धि केवल एक वैज्ञानिक सफलता नहीं,
बल्कि भविष्य की ऊर्जा तकनीकों में चीन की बढ़ती क्षमता का भी संकेत है।
भविष्य की ऊर्जा के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?
आज दुनिया जीवाश्म ईंधन, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।
ऐसे में न्यूक्लियर फ्यूजन को भविष्य की सबसे स्वच्छ ऊर्जा तकनीक माना जा रहा है।
यदि यह तकनीक व्यावसायिक रूप से सफल होती है तो—
- कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी आएगी।
- ऊर्जा की लगभग असीमित आपूर्ति संभव होगी।
- रेडियोधर्मी कचरा पारंपरिक परमाणु ऊर्जा की तुलना में काफी कम होगा।
- जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटेगी।
इसी कारण अमेरिका, चीन, यूरोप, जापान और दक्षिण कोरिया सहित
कई देश फ्यूजन तकनीक पर तेजी से काम कर रहे हैं।
दुनिया के लिए क्या मायने रखती है यह उपलब्धि?
वैज्ञानिकों का मानना है कि दुनिया का सबसे बड़ा सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट तैयार होना
न्यूक्लियर फ्यूजन अनुसंधान में एक महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग उपलब्धि है।
हालांकि अभी व्यावसायिक स्तर पर फ्यूजन बिजली उत्पादन शुरू होने में समय लगेगा,
लेकिन यह सफलता भविष्य के फ्यूजन रिएक्टरों के विकास को गति दे सकती है।
निष्कर्ष
चीन का “आर्टिफिशियल सन” प्रोजेक्ट लगातार नई उपलब्धियां हासिल कर रहा है।
दुनिया के सबसे बड़े सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट का सफल परीक्षण यह संकेत देता है कि स्वच्छ, सुरक्षित और
असीमित ऊर्जा के सपने की दिशा में विज्ञान तेजी से आगे बढ़ रहा है।
हालांकि अभी इस तकनीक को व्यावसायिक स्तर तक पहुंचने में समय लगेगा, लेकिन
यह उपलब्धि भविष्य की ऊर्जा क्रांति का मजबूत आधार बन सकती है।
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