एल नीनो (El Niño) दुनिया के मौसम
एल नीनो क्या है और यह क्यों चर्चा में है?
दुनिया भर में लगातार बढ़ती गर्मी, रिकॉर्ड तोड़ तापमान और बदलते मौसम के बीच एल नीनो (El Niño) एक बार फिर चर्चा का विषय बना हुआ है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि एल नीनो मजबूत होता है, तो इसका असर केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यूरोप, अमेरिका, एशिया, अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया सहित पूरी दुनिया के मौसम पर पड़ता है। साथ ही, मानव-जनित जलवायु परिवर्तन (Climate Change) इसके प्रभावों को और अधिक गंभीर बना सकता है।
क्या होता है एल नीनो?
एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के समुद्री सतह का तापमान सामान्य से अधिक बढ़ जाता है। इससे समुद्री हवाओं का संतुलन बिगड़ जाता है और वैश्विक मौसम प्रणाली प्रभावित होती है।
यही कारण है कि हजारों किलोमीटर दूर स्थित देशों में भी वर्षा, तापमान, सूखा और बाढ़ जैसे मौसमीय बदलाव देखने को मिलते हैं।
यूरोप में क्यों बढ़ जाती है गर्मी?
एल नीनो के दौरान वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण (Atmospheric Circulation) में बदलाव आता है। इससे कई क्षेत्रों में गर्म और शुष्क हवाएं अधिक प्रभावी हो जाती हैं।
हाल के वर्षों में यूरोप लगातार भीषण हीटवेव का सामना कर रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि हालांकि हर हीटवेव केवल एल नीनो से नहीं होती, लेकिन जब एल नीनो और जलवायु परिवर्तन साथ मिलते हैं तो अत्यधिक गर्मी की संभावना बढ़ जाती है।
अमेरिका पर क्या पड़ता है असर?
एल नीनो अमेरिका के मौसम को भी अलग-अलग क्षेत्रों में अलग तरीके से प्रभावित करता है।
- दक्षिणी अमेरिका के कई हिस्सों में सामान्य से अधिक वर्षा हो सकती है।
- उत्तरी क्षेत्रों में अपेक्षाकृत गर्म और शुष्क मौसम देखने को मिल सकता है।
- कुछ इलाकों में तूफानों और बाढ़ का जोखिम बढ़ जाता है।
- पश्चिमी तट पर मौसम के पैटर्न में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं।
भारत के मानसून पर क्या असर पड़ता है?
भारत में एल नीनो का सबसे अधिक असर दक्षिण-पश्चिम मानसून पर देखा जाता है। कई वर्षों में मजबूत एल नीनो के दौरान सामान्य से कम वर्षा दर्ज की गई है, जिससे सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
हालांकि हर एल नीनो वर्ष में एक जैसा प्रभाव नहीं होता, क्योंकि मानसून पर अन्य महासागरीय और वायुमंडलीय कारक भी प्रभाव डालते हैं। फिर भी मौसम वैज्ञानिक इसे भारतीय मानसून के प्रमुख प्रभावकारी कारकों में से एक मानते हैं।
जलवायु परिवर्तन से क्यों बढ़ रही चिंता?
वैज्ञानिकों के अनुसार एल नीनो स्वयं एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, लेकिन पृथ्वी के लगातार गर्म होने के कारण इसके प्रभाव पहले की तुलना में अधिक तीव्र महसूस हो सकते हैं।
गर्म महासागर और गर्म वातावरण हीटवेव, अत्यधिक वर्षा, सूखा और जंगलों में आग जैसी घटनाओं को और
अधिक गंभीर बना सकते हैं। इसी वजह से विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि भविष्य में एल नीनो और
जलवायु परिवर्तन का संयुक्त प्रभाव दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।
दुनिया क्यों है चिंतित?
संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी (WMO) सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने संकेत दिया है कि
2026 में एल नीनो विकसित होने की प्रबल संभावना है। यदि यह मजबूत होता है, तो वैश्विक
तापमान नए रिकॉर्ड बना सकता है और कई देशों में मौसम की चरम घटनाएं बढ़ सकती हैं।
विशेषज्ञों की राय
जलवायु वैज्ञानिकों का कहना है कि एल नीनो और जलवायु परिवर्तन को अलग-अलग समझना जरूरी है।
- एल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु चक्र है।
- जलवायु परिवर्तन मुख्य रूप से मानव गतिविधियों से बढ़ रहा है।
- दोनों के एक साथ सक्रिय होने पर गर्मी, सूखा और भारी बारिश जैसी घटनाएं अधिक तीव्र हो सकती हैं।
एल नीनो केवल प्रशांत महासागर की घटना नहीं है, बल्कि यह पूरी दुनिया के मौसम को
प्रभावित करने वाली महत्वपूर्ण प्राकृतिक प्रक्रिया है। यूरोप और अमेरिका में बढ़ती गर्मी,
भारत में मानसून की अनिश्चितता और कई क्षेत्रों में चरम मौसम की घटनाओं के
पीछे एल नीनो की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। हालांकि किसी एक मौसमीय घटना का कारण केवल
एल नीनो नहीं होता, लेकिन जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर इसके प्रभाव अधिक गंभीर हो सकते हैं।
इसलिए वैज्ञानिक लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं और सरकारों को समय रहते तैयारी करने की सलाह दे रहे हैं।
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