ईरान और अमेरिका के बीच तनाव
पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर मोड़ पर पहुंचता दिखाई दे रहा है। रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य के आसपास अमेरिका ने 20 से अधिक युद्धपोत तैनात किए हैं। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार इन युद्धपोतों की तैनाती में ईरान के खिलाफ लागू नाकाबंदी को सख्ती से लागू करना भी शामिल है। इस बीच 9 अगस्त तक 55 वाणिज्यिक जहाजों का रास्ता बदले जाने, दो जहाजों को रोके जाने और दो अन्य जहाजों पर सवार होकर नियमों का पालन सुनिश्चित किए जाने की जानकारी सामने आई है।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों में से एक है। यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव या समुद्री यातायात में बाधा केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि इसका असर वैश्विक ऊर्जा बाजार, तेल की कीमतों और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर पड़ सकता है।
होर्मुज के आसपास बढ़ी अमेरिकी सैन्य मौजूदगी
अमेरिका की ओर से होर्मुज क्षेत्र में 20 से अधिक युद्धपोतों की तैनाती को मौजूदा तनाव के बीच बड़ा कदम माना जा रहा है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार तैनात नौसैनिक बल विभिन्न सैन्य मिशनों का हिस्सा हैं और इनमें ईरान के खिलाफ अमेरिकी नाकाबंदी को लागू करना भी शामिल है।
इस तैनाती के बाद क्षेत्र में समुद्री गतिविधियों पर निगरानी और नियंत्रण और कड़ा हो गया है। वाणिज्यिक जहाजों के लिए भी यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है, क्योंकि होर्मुज से गुजरने वाले समुद्री मार्गों में किसी भी तरह की बाधा का सीधा असर माल और ऊर्जा की आवाजाही पर पड़ सकता है।
55 वाणिज्यिक जहाजों का रास्ता बदला
अमेरिकी सेंट्रल कमांड के मुताबिक 9 अगस्त तक कुल 55 वाणिज्यिक जहाजों को दूसरी दिशा में मोड़ा गया। इसके अलावा दो जहाजों को रोके जाने और दो अन्य पर सवार होकर नियमों का पालन सुनिश्चित किए जाने की बात कही गई है।
इस घटनाक्रम से साफ है कि समुद्री क्षेत्र में अमेरिकी कार्रवाई केवल सैन्य जहाजों की तैनाती तक सीमित नहीं है। वाणिज्यिक शिपिंग भी इसका सीधा हिस्सा बन गई है।
जहाजों के मार्ग बदलने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों के लिए यात्रा की अवधि, ईंधन खर्च, बीमा और सुरक्षा संबंधी जोखिम बढ़ सकते हैं।
ईरान ने भी रखीं कई शर्तें
दूसरी तरफ ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को वाणिज्यिक शिपिंग के लिए पूरी तरह खोलने से पहले अमेरिका के सामने कई शर्तें रखी हैं।
ईरानी पक्ष की मांगों में अमेरिकी सैन्य हमलों से हुए नुकसान के लिए मुआवजा, प्रतिबंधों को समाप्त करना, सैन्य धमकियों को रोकना, अमेरिकी नौसैनिक नाकाबंदी हटाना और विदेशों में जमा ईरानी संपत्तियों को मुक्त करना शामिल बताया गया है।
ईरान का कहना है कि केवल बातचीत के आधार पर जलमार्ग को सामान्य स्थिति में लाना संभव नहीं होगा। पहले उसे अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों से जुड़ी मांगों पर ठोस आश्वासन चाहिए।
ईरान-ओमान के बीच समझौता अंतिम चरण में
इसी बीच ईरान और ओमान के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी एक संभावित व्यवस्था पर बातचीत आगे बढ़ी है। रिपोर्ट के मुताबिक दोनों देशों के बीच नई शिपिंग लेन तैयार करने से जुड़ा समझौता अंतिम चरण में पहुंच गया है।
इस संभावित व्यवस्था का उद्देश्य समुद्री यातायात के लिए वैकल्पिक और सुरक्षित रास्ते तैयार करना बताया जा रहा है। इससे क्षेत्र में व्यापारिक जहाजों की आवाजाही को धीरे-धीरे सामान्य करने की संभावना बन सकती है।
हालांकि इस समझौते का वास्तविक असर तभी दिखाई देगा जब अमेरिका और ईरान के बीच नाकाबंदी तथा शिपिंग को लेकर मुख्य विवादों पर सहमति बने।
अमेरिका और ईरान के बीच सीधी बातचीत नहीं
मौजूदा स्थिति में अमेरिका और ईरान के बीच सीधे बातचीत का रास्ता खुला नहीं है। दोनों देशों के बीच संदेशों का आदान-प्रदान मध्यस्थों के माध्यम से होने की जानकारी सामने आई है।
यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों पक्षों की मांगें फिलहाल काफी अलग हैं। ईरान अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंधों को समाप्त करने की मांग कर रहा है, जबकि अमेरिका समुद्री मार्ग और ईरान की गतिविधियों को लेकर अपनी सुरक्षा चिंताओं पर जोर दे रहा है।
मध्यस्थों के जरिए बातचीत आगे बढ़ने से तनाव कम करने की संभावना बनी हुई है, लेकिन किसी स्थायी समझौते तक पहुंचने में अभी कई अड़चनें हैं।
होर्मुज क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और आगे अरब सागर से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है।
दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति का एक बड़ा हिस्सा इस मार्ग से होकर गुजरता है। इसलिए यहां सैन्य तनाव बढ़ने या समुद्री यातायात रुकने की स्थिति में वैश्विक तेल और गैस बाजार प्रभावित हो सकते हैं।
यही वजह है कि अमेरिका, ईरान और खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों के अलावा दुनिया के बड़े ऊर्जा आयातक भी होर्मुज की स्थिति पर नजर रखे हुए हैं।
तेल और गैस की कीमतों पर पड़ सकता है असर
यदि होर्मुज से वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही लंबे समय तक प्रभावित रहती है तो
इसका असर ऊर्जा बाजार पर पड़ सकता है।
तेल टैंकरों के रास्ते बदलने से परिवहन लागत बढ़ सकती है। बीमा कंपनियां जोखिम के
आधार पर प्रीमियम बढ़ा सकती हैं और जहाजों को लंबे वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।
इसका असर अंततः कच्चे तेल की कीमतों और उन देशों की अर्थव्यवस्था पर
पड़ सकता है जो ऊर्जा आयात पर निर्भर हैं।
अमेरिका की नाकाबंदी से बढ़ा तनाव
अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी को लागू करने की
कार्रवाई पहले से ही दोनों देशों के बीच तनाव का बड़ा कारण बनी हुई है। ईरान
इसे अपने खिलाफ दबाव और संघर्ष विराम की भावना के विपरीत कदम के तौर पर देखता है।
वहीं अमेरिकी पक्ष का कहना है कि उसकी कार्रवाई ईरान की सैन्य क्षमता और
परमाणु कार्यक्रम से जुड़े खतरे को सीमित करने के उद्देश्य से है।
दोनों देशों के अलग-अलग दावों के कारण मौजूदा संकट का समाधान और जटिल हो गया है।
समुद्री कारोबार पर सीधा असर
होर्मुज में तनाव का सबसे तत्काल असर समुद्री कारोबार पर दिखाई देता है।
जहाजों के मार्ग बदलने से यात्रा लंबी हो सकती है और माल पहुंचाने में ज्यादा समय लग सकता है।
तेल और गैस के अलावा दूसरे सामान की सप्लाई भी प्रभावित हो सकती है।
समुद्री कंपनियों को अपने मार्ग, सुरक्षा व्यवस्था और बीमा लागत पर दोबारा विचार करना पड़ सकता है।
यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो वैश्विक आपूर्ति
श्रृंखला पर दबाव बढ़ने की आशंका भी पैदा हो सकती है।
ईरान की मांगों और अमेरिका के रुख में अंतर
मौजूदा संकट की सबसे बड़ी चुनौती दोनों देशों के बीच मांगों का अंतर है।
ईरान चाहता है कि अमेरिकी सैन्य दबाव खत्म हो, नाकाबंदी हटाई जाए, प्रतिबंधों में राहत मिले और
हालिया सैन्य कार्रवाई से हुए नुकसान की भरपाई हो। दूसरी ओर अमेरिका चाहता है कि
समुद्री यातायात और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर ऐसी व्यवस्था बने जिसमें ईरान की
गतिविधियों से अमेरिकी और उसके सहयोगी देशों के हितों को खतरा न हो।
यही मतभेद किसी स्थायी समझौते की राह में सबसे बड़ी चुनौती बने हुए हैं।
क्या फिर खुलेगा होर्मुज का रास्ता?
ईरान और ओमान के बीच संभावित समझौते से समुद्री मार्गों को लेकर उम्मीद जरूर जगी है।
यदि दोनों पक्ष सुरक्षित शिपिंग लेन को लेकर सहमत होते हैं और अमेरिका-ईरान के बीच नाकाबंदी तथा प्रतिबंधों को लेकर
कोई समझ बनती है तो व्यापारिक जहाजों की आवाजाही धीरे-धीरे सामान्य हो सकती है।
लेकिन अभी इसे अंतिम समाधान मानना जल्दबाजी होगी। ईरान ने साफ संकेत दिया है कि
उसकी शर्तों पर ठोस प्रगति के बिना जलमार्ग को सामान्य रूप से खोलने की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ेगी।
दुनिया की नजर अमेरिका-ईरान गतिरोध पर
मौजूदा हालात में दुनिया के कई देशों की नजर होर्मुज जलडमरूमध्य पर है।
एक तरफ अमेरिकी युद्धपोतों की मौजूदगी बढ़ रही है, दूसरी तरफ
ईरान समुद्री मार्ग खोलने से पहले अपनी मांगों पर आश्वासन चाहता है।
ऐसे में आने वाले दिनों में मध्यस्थों के जरिए होने वाली बातचीत बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है।
यदि बातचीत सफल होती है तो तनाव को नियंत्रित करने और
वैश्विक शिपिंग को सामान्य करने की दिशा में रास्ता खुल सकता है।
वहीं यदि गतिरोध बढ़ता है तो समुद्री व्यापार और ऊर्जा बाजार पर दबाव और गहरा सकता है।
निष्कर्ष
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है।
अमेरिका ने मध्य-पूर्व में 20 से अधिक युद्धपोत तैनात किए हैं और अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार
9 अगस्त तक 55 वाणिज्यिक जहाजों का रास्ता बदला गया है। दो जहाजों को रोका गया और दो
अन्य जहाजों पर सवार होकर नियमों का पालन सुनिश्चित किया गया।
दूसरी ओर ईरान ने जलमार्ग को सामान्य वाणिज्यिक
यातायात के लिए खोलने से पहले अमेरिकी सैन्य कार्रवाई,
नाकाबंदी, प्रतिबंधों और आर्थिक नुकसान से जुड़े कई मुद्दों पर शर्तें रखी हैं। ईरान और ओमान के बीच
संभावित शिपिंग व्यवस्था पर बातचीत अंतिम चरण में पहुंचने की खबर से समाधान की उम्मीद जरूर बनी है,
लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच मुख्य मतभेद अभी बरकरार हैं।
अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर है कि आने वाले दिनों में
कूटनीतिक बातचीत तनाव कम करती है या होर्मुज में सैन्य और समुद्री टकराव का खतरा और बढ़ता है।
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