अमेरिका और हूती
पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव के बीच यमन के हूती संगठन और अमेरिका के बीच हुई बातचीत ने लाल सागर की सुरक्षा को लेकर नई चर्चा शुरू कर दी है। ओमान में अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच संपर्क की खबर ऐसे समय सामने आई है, जब हूती लड़ाकों की गतिविधियां यमन के लाल सागर तट और रणनीतिक बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास बढ़ी हैं।
इस घटनाक्रम का असर केवल यमन और सऊदी अरब तक सीमित नहीं है। बाब-अल-मंदेब समुद्री मार्ग से एशिया, यूरोप और मध्य पूर्व के बीच बड़ी मात्रा में व्यापारिक आवाजाही होती है। ऐसे में इस क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहती है तो जहाजों के मार्ग, बीमा लागत, माल ढुलाई और ऊर्जा बाजार पर असर पड़ सकता है। हालिया रिपोर्टों में इस जलमार्ग से सामान्य परिस्थितियों में वैश्विक व्यापार का करीब 12 प्रतिशत गुजरने का उल्लेख किया गया है।
अमेरिका और हूती प्रतिनिधियों के बीच क्या बातचीत हुई?
रिपोर्टों के मुताबिक अमेरिका के अधिकारियों ने ओमान में हूती प्रतिनिधियों से संपर्क किया। बातचीत का प्रमुख मुद्दा लाल सागर में समुद्री यातायात और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य को खुला रखने से जुड़ा बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार हूती पक्ष ने अमेरिकी और अन्य अंतरराष्ट्रीय जहाजों की आवाजाही को प्रभावित नहीं करने से संबंधित आश्वासन दिए हैं। हालांकि, किसी औपचारिक समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है।
यह घटनाक्रम इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि हूती गतिविधियों और सऊदी अरब के साथ बढ़े संघर्ष के कारण क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा संबंधी चिंता बढ़ी हुई है।
बाब-अल-मंदेब क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
बाब-अल-मंदेब लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ने वाला बेहद महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। इसके जरिए जहाज स्वेज नहर के रास्ते यूरोप और एशिया के बीच आवागमन करते हैं।
यदि इस मार्ग पर सुरक्षा जोखिम बढ़ता है तो जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी छोर यानी केप ऑफ गुड होप के रास्ते लंबा चक्कर लगाना पड़ सकता है। इससे यात्रा का समय और ईंधन खर्च बढ़ सकता है।
इसी वजह से बाब-अल-मंदेब की स्थिति का असर क्षेत्रीय संघर्ष से आगे बढ़कर वैश्विक व्यापार पर भी पड़ सकता है।
सऊदी अरब के लिए बढ़ी चुनौती
हूती लड़ाकों की लाल सागर तट पर बढ़ती मौजूदगी सऊदी अरब के लिए भी रणनीतिक चुनौती बन गई है। हाल के दिनों में यमन के पश्चिमी तट पर हूती बलों ने महत्वपूर्ण क्षेत्रों में बढ़त हासिल की है।
रिपोर्टों के मुताबिक मोखा और बाब-अल-मंदेब के आसपास के रणनीतिक इलाकों में हूती नियंत्रण बढ़ने से सऊदी अरब के लिए समुद्री और तेल परिवहन सुरक्षा का सवाल ज्यादा गंभीर हुआ है।
तेल सप्लाई पर क्यों पड़ सकता है असर?
लाल सागर संकट के साथ सऊदी अरब की तेल आपूर्ति से जुड़ी दूसरी चिंता भी सामने आई है। सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को नुकसान पहुंचने के बाद तेल के परिवहन को लेकर दबाव बढ़ा है।
यह पाइपलाइन सऊदी अरब के पूर्वी तेल उत्पादक क्षेत्रों को लाल सागर के तट पर स्थित यानबू से जोड़ती है और होर्मुज जलडमरूमध्य पर निर्भरता कम करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
हालांकि, 18 सितंबर की रिपोर्टों के अनुसार सऊदी अरब द्वारा पाइपलाइन क्षमता बहाल करने और एशियाई बाजारों के लिए वैकल्पिक आपूर्ति बढ़ाने की कोशिशों से तत्काल आपूर्ति संबंधी कुछ चिंताएं कम हुई हैं। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तीसरे दिन गिरावट भी दर्ज की गई।
क्या अमेरिका सीधे युद्ध में शामिल होगा?
फिलहाल उपलब्ध रिपोर्टों से यह स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका हूती संघर्ष में सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेगा या नहीं। अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच बातचीत का सामने आना यह संकेत देता है कि समुद्री सुरक्षा के मुद्दे पर कूटनीतिक रास्ते भी तलाशे जा रहे हैं।
कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि हूती पक्ष ने अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय जहाजों को निशाना न बनाने से जुड़े आश्वासन दिए हैं। लेकिन इसे औपचारिक शांति समझौता मानना जल्दबाजी होगी, क्योंकि ऐसी किसी व्यवस्था की आधिकारिक पुष्टि सार्वजनिक रूप से नहीं हुई है।
लाल सागर में आगे क्या हो सकता है?
आने वाले दिनों में तीन मुद्दे विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेंगे—
- बाब-अल-मंदेब से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही सामान्य रहती है या नहीं।
- सऊदी अरब और हूती बलों के बीच सैन्य टकराव बढ़ता है या बातचीत का रास्ता खुलता है।
- सऊदी तेल निर्यात की क्षमता कितनी तेजी से सामान्य होती है।
यदि समुद्री यातायात सुरक्षित रहता है और तेल आपूर्ति में व्यवधान सीमित रहता है तो वैश्विक बाजार पर दबाव कुछ कम हो सकता है। दूसरी ओर, संघर्ष के विस्तार से शिपिंग, बीमा, ऊर्जा और माल ढुलाई की लागत फिर बढ़ सकती है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटनाक्रम?
भारत पश्चिम एशिया से बड़ी मात्रा में ऊर्जा आयात करता है और यूरोप, मध्य पूर्व तथा अफ्रीका के साथ महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक संबंध रखता है। लाल सागर और स्वेज नहर मार्ग में लंबे समय तक बाधा रहने पर
भारतीय निर्यातकों और आयातकों के परिवहन खर्च पर असर पड़ सकता है।
विशेष रूप से कच्चा तेल, पेट्रोलियम उत्पाद और समुद्री माल ढुलाई से जुड़े बाजार
इस घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं। हालांकि, इसका वास्तविक
असर संघर्ष की अवधि और समुद्री मार्गों की स्थिति पर निर्भर करेगा।
कच्चे तेल की कीमतों पर नजर
18 सितंबर को उपलब्ध बाजार आंकड़ों के अनुसार ब्रेंट क्रूड करीब 104 डॉलर प्रति बैरल और अमेरिकी WTI करीब
101 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। सऊदी आपूर्ति बहाली की उम्मीदों से कीमतों पर
तत्काल दबाव कुछ कम हुआ, लेकिन क्षेत्रीय तनाव के कारण जोखिम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।
निष्कर्ष
अमेरिका और हूती प्रतिनिधियों के बीच ओमान में हुई बातचीत ने लाल सागर संकट में कूटनीतिक
पहल की संभावना को सामने ला दिया है। बाब-अल-मंदेब की सुरक्षा इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है,
क्योंकि यह मार्ग अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा परिवहन के लिए अहम है।
फिलहाल बातचीत से किसी स्थायी समझौते की पुष्टि नहीं हुई है।
इसलिए आने वाले दिनों में हूती गतिविधियों, सऊदी अरब की प्रतिक्रिया, समुद्री
यातायात और तेल आपूर्ति की स्थिति पर दुनिया की नजर बनी रहेगी।
FAQ
1. अमेरिका और हूती प्रतिनिधियों के बीच बातचीत कहां हुई?
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार अमेरिकी अधिकारियों और हूती प्रतिनिधियों के बीच ओमान में संपर्क और बातचीत हुई।
2. बाब-अल-मंदेब क्यों महत्वपूर्ण है?
यह लाल सागर और अदन की खाड़ी के बीच महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है,
जिसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा परिवहन में होता है।
3. क्या अमेरिका और हूतियों के बीच समझौता हो गया है?
अभी किसी औपचारिक समझौते की सार्वजनिक पुष्टि नहीं हुई है। बातचीत और
समुद्री सुरक्षा को लेकर आश्वासन की रिपोर्ट सामने आई है।
4. हूती संकट का सऊदी अरब पर क्या असर है?
लाल सागर क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने से सऊदी तेल परिवहन और समुद्री सुरक्षा पर दबाव बढ़ा है।
5. क्या इस संकट से तेल महंगा हो सकता है?
यदि तेल उत्पादन या परिवहन में बड़ा और लंबे समय तक व्यवधान आता है तो कीमतों पर ऊपर की ओर
दबाव बन सकता है। हालांकि, 18 सितंबर को आपूर्ति बहाली की उम्मीदों से कीमतों में कुछ नरमी देखी गई।
6. भारत पर इसका क्या असर हो सकता है?
लंबे समय तक समुद्री मार्ग बाधित होने पर माल ढुलाई, बीमा और ऊर्जा
आयात की लागत प्रभावित हो सकती है। वास्तविक असर संकट की अवधि और समुद्री यातायात पर निर्भर करेगा।
read this post :पश्चिम बंगाल में TMC के भीतर घमासान, 10 विधायकों को नोटिस; 7 दिन में देना होगा जवाब
