असम की 17 वर्षीय जनमोनी कोंवर
असम की बाढ़ ने कई परिवारों से उनका घर, रोजगार और जमा पूंजी छीन ली, लेकिन इसी मुश्किल दौर में 17 साल की एक बेटी ने ऐसा कारनामा कर दिखाया, जिसने हर किसी को प्रेरित कर दिया। असम के जोरहाट जिले की रहने वाली जनमोनी कोंवर ने तमाम मुश्किलों के बीच राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीत लिया। खास बात यह है कि जब जनमोनी देश की राजधानी में अपने खेल का हुनर दिखा रही थीं, उसी समय उनका परिवार बाढ़ के कारण अपने घर से बेघर होकर टेंट में रहने को मजबूर था।
यह कहानी सिर्फ एक खिलाड़ी की जीत की नहीं है। यह संघर्ष, हिम्मत, परिवार के त्याग और सपने को जिंदा रखने की कहानी है। जिस घर में कभी परिवार रहता था, वहां बाढ़ का पानी पहुंच चुका था। दूसरी तरफ जनमोनी के सामने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित करने की चुनौती थी।
बाढ़ में उजड़ गया परिवार का घर
असम के जोरहाट जिले के भोगदोईपोरिया गांव के 2 नंबर मोजिया भेती इलाके में रहने वाले जनमोनी के परिवार पर बाढ़ ने भारी कहर बरपाया। तटबंध टूटने के बाद पानी तेजी से उनके घर की तरफ पहुंचा और देखते ही देखते परिवार का आशियाना डूब गया।
परिवार ने जरूरी दस्तावेज और जनमोनी के मेडल व पुरस्कार बचाने की कोशिश की, लेकिन घर का काफी सामान बाढ़ में बर्बाद हो गया। परिवार की आजीविका से जुड़ी मछली पालन की व्यवस्था भी प्रभावित हुई। बत्तख और मुर्गियां बह गईं, जबकि भैंसों को सुरक्षित स्थान पर ले जाना पड़ा।
घर उजड़ने के बाद परिवार ने तटबंध के किनारे टेंट लगाकर रहने का सहारा लिया। मुश्किल यह थी कि परिवार को अपने भविष्य के साथ-साथ जनमोनी के खेल करियर की चिंता भी करनी थी।
बेटी के खेल के लिए परिवार ने किए बड़े त्याग
जनमोनी बचपन से ही कराटे सीख रही हैं। उन्होंने करीब पांच साल की उम्र में इस खेल की शुरुआत की थी। सुविधाओं की कमी के बावजूद उन्होंने अभ्यास जारी रखा और धीरे-धीरे प्रतियोगिताओं में अपनी पहचान बनाई।
परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी। जनमोनी के खेल से जुड़े खर्चों को पूरा करने के लिए परिवार ने कई बार अपनी जरूरतों से समझौता किया। एक प्रतियोगिता के लिए पिछले साल परिवार को अपनी दो भैंस तक बेचनी पड़ी थीं।
इस बार परिवार को उम्मीद थी कि करीब तीन साल से तैयार की जा रही मछलियों को बेचकर जनमोनी की दिल्ली यात्रा और प्रतियोगिता का खर्च निकाला जाएगा। लेकिन बाढ़ ने उनकी इस योजना को भी तबाह कर दिया।
दिल्ली जाने का सपना भी संकट में पड़ गया
राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप में हिस्सा लेने के लिए जनमोनी को दिल्ली जाना था। लेकिन घर डूब चुका था, परिवार की आय का साधन प्रभावित हो गया था और यात्रा का खर्च जुटाना मुश्किल हो रहा था।
ऐसे समय में जनमोनी के लिए प्रतियोगिता में हिस्सा लेना लगभग असंभव दिखाई देने लगा था। एक तरफ परिवार को रहने और खाने की चिंता थी, दूसरी तरफ बेटी का वर्षों का सपना सामने था।
लेकिन यहीं से कहानी ने एक नया मोड़ लिया।
मुश्किल वक्त में मिली मदद
जनमोनी की स्थिति की जानकारी सामने आने के बाद उन्हें प्रतियोगिता तक पहुंचने में मदद मिली। उनकी टीम की दिल्ली यात्रा और वापसी की व्यवस्था में आर्थिक सहयोग किया गया। परिवार को भी वित्तीय सहायता दी गई, जिससे जनमोनी अपने राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले में हिस्सा ले सकीं।
इस मदद ने जनमोनी के उस सपने को टूटने से बचा लिया, जिसके लिए उन्होंने बचपन से मेहनत की थी।
टेंट के पास तटबंध पर किया अभ्यास
बाढ़ के बाद जनमोनी के पास पहले जैसा अभ्यास स्थल नहीं था। घर पानी में डूब गया था और परिवार तटबंध पर रहने को मजबूर था।
ऐसे हालात में भी उन्होंने अभ्यास नहीं छोड़ा। उपलब्ध जगह पर ट्रेनिंग जारी रखी। जिस समय किसी सामान्य खिलाड़ी के पास प्रतियोगिता से पहले बेहतर सुविधाओं और आराम की जरूरत होती है, उस समय जनमोनी के सामने सिर पर छत तक नहीं थी।
फिर भी उन्होंने अपने लक्ष्य से ध्यान नहीं हटाया।
उनका अभ्यास सिर्फ कराटे की तैयारी नहीं था, बल्कि यह उस परिस्थिति के खिलाफ संघर्ष भी था जिसने उनके परिवार की जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया था।
राष्ट्रीय चैंपियनशिप में शानदार प्रदर्शन
दिल्ली के तालकटोरा इंडोर स्टेडियम में आयोजित राष्ट्रीय कराटे चैंपियनशिप में असम के चार खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया। जनमोनी ने अशिहारा कराटे के मुकाबले में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया। एक अन्य खिलाड़ी ने कांस्य पदक जीता।
जनमोनी के लिए यह गोल्ड सिर्फ एक खेल उपलब्धि नहीं था। यह उन सभी कठिन परिस्थितियों का जवाब था, जिनसे वह और उनका परिवार पिछले कई सप्ताह से गुजर रहे थे।
घर नहीं था, लेकिन हाथ में था गोल्ड मेडल
जनमोनी जब प्रतियोगिता से लौटकर असम पहुंचीं तो उनके हाथ में राष्ट्रीय स्तर का गोल्ड मेडल था। लेकिन उनका स्वागत किसी पक्के घर में नहीं हुआ।
उनका परिवार अब भी तटबंध के किनारे टेंट में रह रहा था।
यह तस्वीर अपने आप में बेहद भावुक करने वाली है—एक तरफ देश की बड़ी प्रतियोगिता में गोल्ड जीतने वाली
17 साल की खिलाड़ी, दूसरी तरफ बाढ़ के कारण अपना घर खो चुका परिवार।
जनमोनी के पास उपलब्धियों की चमक है, लेकिन उनके परिवार के
सामने अभी भी घर दोबारा बसाने की चुनौती खड़ी है।
*जनमोनी के सामने अब दो बड़ी चुनौतियां
जनमोनी अभी 12वीं कक्षा की छात्रा हैं। उनके सामने पढ़ाई और खेल, दोनों को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी है।
एक तरफ वह कराटे में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं और
आगे भी बड़े मुकाबलों में हिस्सा लेना चाहती हैं।
दूसरी तरफ उनके परिवार को बाढ़ के बाद अपनी जिंदगी फिर से शुरू करनी है।
परिवार के अनुसार जल्द घर लौटना संभव नहीं दिख रहा और
उन्हें कुछ समय तक तटबंध पर ही रहना पड़ सकता है।
ऐसे में जनमोनी के लिए अगला सफर आसान नहीं होगा।
लेकिन जिस तरह उन्होंने अब तक परिस्थितियों को पीछे छोड़ते हुए
सफलता हासिल की है, उससे उम्मीद है कि उनका खेल सफर आगे भी जारी रहेगा।
यह गोल्ड पूरे असम के लिए प्रेरणा
असम हर साल बाढ़ की चुनौती का सामना करता है। बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में परिवारों को विस्थापन,
रोजगार के नुकसान और संपत्ति की तबाही से जूझना पड़ता है।
ऐसे माहौल में जनमोनी की कहानी बताती है कि आपदा किसी इंसान के रास्ते में बड़ी
बाधा जरूर बन सकती है, लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के सामने वह हमेशा अंतिम दीवार नहीं होती।
जनमोनी ने यह साबित किया कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों, अगर लक्ष्य स्पष्ट हो और
मेहनत जारी रहे तो सफलता हासिल की जा सकती है।
परिवार की स्थिति पर भी ध्यान जरूरी
जनमोनी की उपलब्धि निश्चित रूप से गर्व का विषय है,
लेकिन उनकी कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
एक राष्ट्रीय चैंपियन खिलाड़ी का परिवार अगर आज भी टेंट में रहने को मजबूर है, तो
यह सवाल भी उठता है कि प्राकृतिक आपदा के बाद
प्रभावित खिलाड़ियों और उनके परिवारों को किस तरह की सहायता मिलनी चाहिए।
खेल प्रतिभाओं को सिर्फ प्रतियोगिता तक पहुंचाना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें प्रशिक्षण, शिक्षा,
सुरक्षित आवास और आर्थिक सहयोग जैसी सुविधाएं भी मिलनी चाहिए,
ताकि प्रतिभा केवल कठिन परिस्थितियों से लड़ते हुए जीवित न रहे,
बल्कि बेहतर संसाधनों के साथ आगे बढ़ सके।
संघर्ष से निकली जीत की कहानी
जनमोनी की कहानी में तीन तस्वीरें सबसे ज्यादा ध्यान खींचती हैं—बाढ़ में डूबा घर,
तटबंध पर बना टेंट और राष्ट्रीय चैंपियनशिप का गोल्ड मेडल।
इन तीनों को साथ रखकर देखें तो उनकी पूरी यात्रा सामने आ जाती है।
बाढ़ ने उनका घर छीन लिया।
मुश्किलों ने उनकी ट्रेनिंग रोकने की कोशिश की।
आर्थिक परेशानी ने दिल्ली जाने का रास्ता मुश्किल किया।
लेकिन जनमोनी ने हार नहीं मानी।
उन्होंने अभ्यास किया, प्रतियोगिता में पहुंचीं और आखिरकार गोल्ड जीतकर लौटीं।
निष्कर्ष
जनमोनी कोंवर की कहानी सिर्फ एक गोल्ड मेडल की कहानी नहीं है।
यह उस हौसले की कहानी है, जिसने बाढ़ में घर खोने के बावजूद सपना नहीं खोया।
आज उनके परिवार के पास पक्का घर नहीं है, लेकिन जनमोनी के हाथ में राष्ट्रीय स्तर का गोल्ड मेडल है।
यह मेडल उनकी वर्षों की मेहनत, परिवार के त्याग और
कठिन परिस्थितियों के बीच कायम रखे गए आत्मविश्वास का प्रतीक है।
अब जरूरत है कि इस युवा खिलाड़ी की खेल प्रतिभा के साथ-साथ
उसके परिवार की पुनर्वास जरूरतों पर भी ध्यान दिया जाए।
अगर जनमोनी को सही प्रशिक्षण, शिक्षा और आर्थिक सहयोग मिलता रहा, तो
वह आने वाले वर्षों में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश का नाम रोशन कर सकती हैं।
बाढ़ ने जनमोनी का घर जरूर छीना, लेकिन उनका सपना नहीं छीन सकी।
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