US Tariff on India
US Tariff on India: रूस से कच्चे तेल की खरीद को लेकर भारत पर अमेरिकी दबाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है। अमेरिकी सीनेट ने ऐसे विधेयक को मंजूरी दी है, जिसके तहत रूस से बड़े पैमाने पर तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाने की शक्ति दी जा सकती है। प्रस्तावित व्यवस्था में यह टैरिफ अधिकतम 100 प्रतिशत तक हो सकता है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, इसलिए भविष्य में यह व्यवस्था लागू होने पर भारतीय निर्यात पर बड़ा असर पड़ने की आशंका है।
हालांकि, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत पर अभी 100 प्रतिशत टैरिफ लागू नहीं हुआ है। सीनेट से पारित विधेयक को आगे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की प्रक्रिया से गुजरना है और उसके बाद ही अंतिम कानूनी स्थिति स्पष्ट होगी। इसलिए फिलहाल इसे संभावित आर्थिक दबाव के रूप में देखा जा रहा है।
रूस से भारत कितना तेल खरीद रहा है?
रूस पिछले कुछ समय में भारत के लिए कच्चे तेल का बेहद महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार जुलाई 2026 में भारत ने रूस से लगभग 2.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल खरीदा। यह भारत के कुल क्रूड आयात का करीब 55.5 प्रतिशत बताया गया है। जून में भी रूसी तेल की हिस्सेदारी लगभग आधी रही थी।
इससे साफ है कि रूस से तेल की सप्लाई भारतीय ऊर्जा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। अगर अचानक यह आयात रुकता है तो भारत को दूसरे देशों से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदना पड़ेगा।
अगर रूसी तेल बंद हुआ तो भारत क्या करेगा?
अगर किसी कारण से रूस से कच्चे तेल की खरीद में बड़ी गिरावट आती है, तो भारत के पास कई वैकल्पिक स्रोत मौजूद हैं। देश पहले से ही अलग-अलग देशों से क्रूड खरीदता है। इनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, इराक, अमेरिका और अन्य तेल उत्पादक देश शामिल हैं।
भारत लगभग 41 अलग-अलग स्रोतों से कच्चा तेल आयात करता है। इसका मतलब है कि देश पूरी तरह किसी एक सप्लायर पर निर्भर नहीं है। यही विविधता भारत के लिए संभावित संकट की स्थिति में एक मजबूत विकल्प बन सकती है।
हालांकि, अचानक बहुत बड़े पैमाने पर अतिरिक्त तेल खरीदना आसान नहीं होगा। दूसरे देशों से उपलब्धता, अंतरराष्ट्रीय कीमत, समुद्री परिवहन, बीमा और भुगतान जैसी परिस्थितियां लागत को प्रभावित कर सकती हैं।
सबसे बड़ी चुनौती होगी तेल की बढ़ती कीमत
रूसी तेल खरीदने का एक प्रमुख आर्थिक फायदा यह रहा है कि कई समय तक भारतीय रिफाइनरियों को इसमें कीमत संबंधी छूट मिली। लेकिन हाल के समय में यह छूट काफी कम हो चुकी है।
उपलब्ध जानकारी के मुताबिक जुलाई के अंत तक रूसी क्रूड पर छूट घटकर करीब 1 से 2 डॉलर प्रति बैरल रह गई थी, जबकि महीने की शुरुआत में यह 10 डॉलर प्रति बैरल से अधिक थी।
अगर रूसी तेल की जगह भारत को दूसरे बाजारों से महंगा क्रूड खरीदना पड़ता है, तो रिफाइनरियों की लागत बढ़ सकती है। इसका असर आगे चलकर ईंधन बाजार और अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
पेट्रोल-डीजल की कीमत पर क्या असर पड़ेगा?
रूसी तेल की सप्लाई बंद होने का सबसे बड़ा सवाल आम लोगों के लिए पेट्रोल और डीजल की कीमत को लेकर है।
अगर भारत को महंगा कच्चा तेल खरीदना पड़ता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी क्रूड की कीमत बढ़ जाती है, तो ईंधन की लागत पर दबाव बढ़ सकता है। इससे पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना बन सकती है।
हालांकि, रूसी तेल बंद होते ही पेट्रोल-डीजल के दाम निश्चित रूप से बढ़ जाएंगे, ऐसा कहना सही नहीं होगा। घरेलू ईंधन कीमतों पर कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय भाव के अलावा रुपये की विनिमय दर, टैक्स, रिफाइनिंग लागत और तेल कंपनियों की मूल्य नीति जैसे कई कारक प्रभाव डालते हैं।
महंगा तेल बढ़ा सकता है महंगाई
कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। पेट्रोल और डीजल महंगे होने पर परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ सकती है।
इसका असर कृषि उत्पादों, खाद्य पदार्थों, औद्योगिक सामान और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर पड़ सकता है। अगर महंगे क्रूड की स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो महंगाई पर अतिरिक्त दबाव बनने की आशंका रहती है।
यानी रूस से सस्ता या अपेक्षाकृत कम कीमत वाला तेल कम होने की स्थिति में भारत को
सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा ही नहीं, बल्कि महंगाई नियंत्रण की चुनौती का भी सामना करना पड़ सकता है।
रुपये पर भी पड़ सकता है दबाव
भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है।
कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय खरीद के लिए डॉलर में भुगतान करना पड़ता है।
अगर रूस से मिलने वाले तेल की जगह भारत को महंगे स्रोतों से ज्यादा मात्रा में क्रूड खरीदना पड़ता है तो
देश का डॉलर खर्च बढ़ सकता है। इससे व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा मांग पर दबाव पड़ सकता है।
ऐसी स्थिति में रुपये पर भी दबाव बनने की संभावना रहती है। हालांकि रुपये की कीमत केवल तेल
आयात से निर्धारित नहीं होती। वैश्विक डॉलर की स्थिति, विदेशी निवेश,
आयात-निर्यात और अन्य आर्थिक कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
क्या भारत के पास Plan-B तैयार है?
भारत की ऊर्जा नीति में विविधता एक महत्वपूर्ण रणनीति रही है। रूस के अलावा देश पहले से ही कई देशों से
कच्चा तेल खरीदता है। इसलिए रूसी आयात में कमी आने पर दूसरे स्रोतों से खरीद बढ़ाने का रास्ता मौजूद है।
भारत के लिए सबसे बेहतर स्थिति यह होगी कि तेल आयात को अचानक बंद करने के बजाय आवश्यकता के
अनुसार अलग-अलग स्रोतों के बीच संतुलन बनाया जाए।
यदि रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे कम होती है, तो भारतीय अर्थव्यवस्था को वैकल्पिक सप्लायरों के साथ
तालमेल बनाने का समय मिल सकता है। इससे अचानक पैदा होने वाले झटके को कम किया जा सकता है।
संकट कब गंभीर हो सकता है?
रूसी तेल का आयात कम होना अपने आप में भारत के लिए तत्काल गंभीर संकट नहीं बनता,
क्योंकि देश के पास कई वैकल्पिक सप्लायर मौजूद हैं।
लेकिन स्थिति तब ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकती है जब रूस से तेल की सप्लाई अचानक पूरी तरह रुक जाए और
उसी समय दुनिया के अन्य प्रमुख तेल उत्पादक देशों से भी किसी कारण से सप्लाई प्रभावित हो।
ऐसे परिदृश्य में वैश्विक क्रूड की कीमत तेजी से बढ़ सकती है।
भारत को महंगा तेल खरीदना पड़ सकता है और
इसका असर आयात बिल, रुपये, ईंधन कीमतों तथा महंगाई पर एक साथ पड़ सकता है।
अमेरिका के टैरिफ का भारत पर क्या असर होगा?
अगर प्रस्तावित अमेरिकी व्यवस्था भविष्य में लागू होती है और भारत को
उसके तहत निशाना बनाया जाता है, तो भारत से अमेरिका जाने वाले सामान पर अतिरिक्त शुल्क का खतरा पैदा हो सकता है।
इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है। जिन कंपनियों का अमेरिकी बाजार पर ज्यादा निर्भरता है,
उनकी लागत बढ़ सकती है और उनके उत्पाद अमेरिकी बाजार में महंगे हो सकते हैं।
हालांकि, टैरिफ का वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतिम कानून में क्या प्रावधान होते हैं,
किस तरह की छूट मिलती है और अमेरिकी प्रशासन उसका इस्तेमाल किस तरीके से करता है।
भारत के सामने दोहरी चुनौती
*भारत के सामने फिलहाल दो स्तरों पर चुनौती दिखाई दे रही है। पहला,
ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखना और कच्चे तेल की पर्याप्त सप्लाई सुनिश्चित करना। दूसरा,
अंतरराष्ट्रीय व्यापार में संभावित अतिरिक्त टैरिफ के प्रभाव को कम करना।
भारत के लिए रूस से तेल खरीदना सिर्फ कीमत का सवाल नहीं है। यह ऊर्जा सुरक्षा,
विदेशी मुद्रा खर्च और वैश्विक बाजार में आपूर्ति की स्थिरता से भी जुड़ा हुआ है।
दूसरी तरफ अमेरिका के साथ भारत के व्यापारिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं।
इसलिए आने वाले समय में कूटनीतिक बातचीत और आर्थिक हितों के बीच संतुलन बनाना काफी अहम होगा।
आम लोगों पर कितना असर पड़ सकता है?
आम लोगों पर असर इस बात पर निर्भर करेगा कि रूसी तेल की सप्लाई कितनी कम होती है और
अंतरराष्ट्रीय क्रूड की कीमत किस दिशा में जाती है।
अगर भारत आसानी से दूसरे देशों से पर्याप्त तेल हासिल कर लेता है और
वैश्विक कीमतें स्थिर रहती हैं, तो असर सीमित रह सकता है।
लेकिन यदि वैकल्पिक तेल महंगा मिलता है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कीमत बढ़ती है,
तो पेट्रोल-डीजल, परिवहन और कई वस्तुओं की लागत पर असर पड़ सकता है।
निष्कर्ष
रूसी तेल को लेकर अमेरिका की प्रस्तावित टैरिफ व्यवस्था ने भारत के सामने एक नई आर्थिक
चुनौती जरूर खड़ी की है, लेकिन फिलहाल इसे तत्काल लागू हो चुका 100 प्रतिशत टैरिफ नहीं माना जा सकता।
अमेरिकी विधेयक को अभी आगे की प्रक्रिया से गुजरना है।
भारत के पास राहत की सबसे बड़ी वजह यह है कि वह कई देशों से कच्चा तेल खरीदता है।
इसलिए रूस से आयात घटने की स्थिति में वैकल्पिक सप्लायरों से खरीद बढ़ाई जा सकती है।
फिर भी यदि रूसी तेल अचानक बंद होता है और वैश्विक स्तर पर
तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो भारत के आयात बिल,
रुपये, पेट्रोल-डीजल की लागत और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है। आने वाले दिनों में सबसे ज्यादा नजर
अमेरिकी विधेयक की अगली प्रक्रिया और भारत की ऊर्जा रणनीति पर रहेगी।
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