हिंदू मुस्लिम विवाह विवाद
हिंदू मुस्लिम विवाह विवाद सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म ‘यादव जी की लव स्टोरी’ पर याचिका खारिज करते हुए पूछा- हिंदू लड़की की मुस्लिम से शादी देश का ताना-बाना खराब कर रही है? ‘मोटी चमड़ी रखो’ टिप्पणी के साथ काल्पनिक कहानी पर जोर।

फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर से अंतरधार्मिक विवाह और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अपनी मजबूत राय रखी। मामला फिल्म ‘यादव जी की लव स्टोरी’ पर प्रतिबंध लगाने की याचिका से जुड़ा था। याचिकाकर्ता (विश्व यादव परिषद के प्रमुख) का दावा था कि फिल्म का शीर्षक और कहानी यादव समाज की हिंदू लड़की को मुस्लिम युवक के साथ प्रेम संबंध में दिखाकर समुदाय की छवि खराब करती है। यह कथित तौर पर एक वास्तविक घटना से प्रेरित बताई जा रही थी।
- सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा, “मोटी चमड़ी रखिए” (Thick skin rakho)।
- कोर्ट ने पूछा, “क्या हिंदू लड़की का मुस्लिम से विवाह देश के तानाबाने को खराब कर रहा है?”
- यह टिप्पणी न केवल याचिका को बेवजह बताया, बल्कि समाज में बढ़ती असहिष्णुता पर भी करारा प्रहार थी।
- कोर्ट ने स्पष्ट किया कि फिल्म का शीर्षक किसी समुदाय को नकारात्मक रूप से
- नहीं दर्शाता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट का रुख: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पहले
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर कहा है कि कला, साहित्य और सिनेमा में सामाजिक मुद्दों को उठाना जरूरी है, भले ही वह किसी को असहज करे। इस मामले में कोर्ट ने कहा कि अगर कोई फिल्म किसी समुदाय की संवेदनशीलता को छूती है, तो उसके लिए “मोटी चमड़ी” रखनी चाहिए।
- यह टिप्पणी नई नहीं है। कोर्ट पहले भी इसी तरह की याचिकाओं में सख्त रहा है,
- जहां छोटी-छोटी बातों पर फिल्में या किताबें बैन करने की मांग की जाती है।
- उदाहरण के तौर पर, कोर्ट ने कहा कि यादव समाज या किसी भी समुदाय को
- इतना संवेदनशील नहीं होना चाहिए कि एक काल्पनिक कहानी से उसकी छवि खराब हो जाए।
- समाज में विविधता और प्रेम की कहानियां स्वीकार्य होनी चाहिए।
हिंदू मुस्लिम विवाह विवाद: अंतरधार्मिक विवाह
भारत में स्पेशल मैरिज एक्ट, 1954 अंतरधार्मिक विवाहों को वैध बनाता है। हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के की शादी बिना धर्मांतरण के भी कानूनी रूप से मान्य है, बशर्ते दोनों बालिग हों और सहमति से शादी करें। सुप्रीम कोर्ट ने कई फैसलों में कहा है कि ऐसे विवाह संवैधानिक हैं और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा हैं।
- 2019 में कोर्ट ने अंतरधार्मिक जोड़ों के हितों की रक्षा पर जोर दिया।
- कोर्ट ने कहा कि अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाह समाजवाद को बढ़ावा देते हैं, क्योंकि वे जाति-धर्म के भेद मिटाते हैं।
- हालांकि, कुछ हाई कोर्ट्स (जैसे इलाहाबाद) ने बिना धर्मांतरण के कुछ मामलों में सवाल उठाए हैं, ले
- किन सुप्रीम कोर्ट का रुख स्पष्ट है—सहमति से शादी मौलिक अधिकार है।
फिर भी, समाज में चुनौतियां बनी हुई हैं। “लव जिहाद” जैसे आरोप, परिवार का विरोध, सामाजिक बहिष्कार और कभी-कभी हिंसा तक की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसे में कोर्ट की “मोटी चमड़ी” वाली टिप्पणी उन लोगों के लिए संदेश है जो छोटी-छोटी बातों पर आपत्ति जताते हैं।
समाज में असहिष्णुता और बदलाव की जरूरत
- आज के भारत में अंतरधार्मिक विवाह अब कोई नई बात नहीं।
- युवा पीढ़ी धर्म से ऊपर प्रेम को प्राथमिकता दे रही है।
- लेकिन कुछ संगठन और व्यक्ति इसे “राष्ट्रीय तानाबाना” के लिए खतरा बताते हैं।
- सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे दावों को खारिज किया और पूछा कि
- एक व्यक्तिगत फैसला पूरे देश की एकता कैसे बिगाड़ सकता है?
यह टिप्पणी हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र में असहमति सहन करना जरूरी है। अगर कोई फिल्म, किताब या व्यक्तिगत चुनाव किसी को चुभता है, तो जवाब बहस से देना चाहिए, न कि प्रतिबंध से। “मोटी चमड़ी” रखने का मतलब है—सामाजिक बदलाव को स्वीकारना और विविधता में एकता देखना।
निष्कर्ष
- सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सिर्फ एक याचिका खारिज करने तक सीमित नहीं।
- यह पूरे समाज को संदेश है कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता,
- प्रेम और अभिव्यक्ति को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
- हिंदू-मुस्लिम या किसी भी अंतरधार्मिक जोड़े को डरने की जरूरत नहीं—कानून उनके साथ है।
अगर समाज “मोटी चमड़ी” रख ले, तो ऐसे विवाह “तानाबाना खराब” नहीं, बल्कि उसे और मजबूत बनाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर साबित किया कि संविधान सबसे ऊपर है, और प्रेम किसी धर्म या जाति से बड़ा नहीं होता।
