ईरान युद्ध के बीच अमेरिका ने
वॉशिंगटन। ईरान के साथ जारी युद्ध के बीच अमेरिका ने प्रशांत क्षेत्र में तैनात अपने आखिरी बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर को पश्चिम एशिया की ओर रवाना कर दिया है। USS George Washington को ईरान के खिलाफ चल रहे अमेरिकी सैन्य अभियान में इस्तेमाल किए जा रहे USS Abraham Lincoln की जगह भेजा जा रहा है। इस बदलाव के बाद पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में फिलहाल अमेरिकी नौसेना का कोई प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर मौजूद नहीं रहेगा।
अमेरिकी नौसेना का यह कदम ऐसे समय में आया है जब चीन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य गतिविधियां बढ़ा रहा है। ऐसे में अमेरिका की कैरियर मौजूदगी का अस्थायी रूप से खत्म होना क्षेत्रीय सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
ईरान युद्ध के कारण बढ़ा अमेरिकी नौसेना पर दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में ईरान के खिलाफ चल रहे सैन्य अभियान ने अमेरिकी नौसेना के एयरक्राफ्ट कैरियर बेड़े पर दबाव बढ़ा दिया है। USS Abraham Lincoln लंबे समय से पश्चिम एशिया में सक्रिय है और इसकी तैनाती सामान्य अवधि से काफी आगे बढ़ चुकी है। अब इसकी जगह USS George Washington को भेजने की तैयारी की गई है।
इस बदलाव का सीधा असर हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर दिखाई दे रहा है। अमेरिकी नौसेना के पास सीमित संख्या में बड़े परमाणु-संचालित एयरक्राफ्ट कैरियर हैं, इसलिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में उनकी तैनाती करने पर कहीं न कहीं सैन्य मौजूदगी में अंतर पैदा होता है।
पश्चिमी प्रशांत में नहीं रहेगा अमेरिकी कैरियर
अमेरिका के लिए पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण है। यही वह इलाका है जहां चीन अपनी सैन्य ताकत लगातार बढ़ा रहा है और ताइवान, दक्षिण चीन सागर तथा पूर्वी चीन सागर को लेकर तनाव बना रहता है।
अब जब USS George Washington भी पश्चिम एशिया की ओर जा रहा है, तो पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी नौसेना का पारंपरिक कैरियर स्ट्राइक ग्रुप मौजूद नहीं रहेगा। हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिका ने इस क्षेत्र से अपनी पूरी सैन्य शक्ति हटा ली है। जापान, दक्षिण कोरिया, गुआम और अन्य स्थानों पर अमेरिकी सैन्य ठिकाने, विमान, युद्धपोत और अन्य क्षमताएं मौजूद हैं।
फिर भी एक बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर की मौजूदगी अमेरिकी शक्ति प्रदर्शन और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया की क्षमता का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
चीन के लिए क्यों अहम है यह घटनाक्रम?
चीन लंबे समय से पश्चिमी प्रशांत में अपनी सैन्य गतिविधियों का विस्तार कर रहा है। बीजिंग की नौसेना पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सक्षम हो चुकी है और वह दक्षिण चीन सागर, ताइवान के आसपास तथा जापान के निकट समुद्री क्षेत्रों में नियमित सैन्य गतिविधियां करता रहा है।
ऐसे समय में अमेरिकी कैरियर की अनुपस्थिति चीन के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक इसे चीन के लिए खुला सैन्य रास्ता मानना सही नहीं होगा, क्योंकि अमेरिका के पास इस क्षेत्र में एयरक्राफ्ट कैरियर के अलावा भी कई सैन्य विकल्प मौजूद हैं।
फिर भी यह स्थिति बीजिंग को क्षेत्रीय गतिविधियों में अधिक आत्मविश्वास दे सकती है और अमेरिका के सहयोगी देशों के बीच सवाल खड़े कर सकती है कि वॉशिंगटन एक साथ कई मोर्चों पर अपनी सैन्य शक्ति को किस तरह संभालेगा।
जापान और दूसरे सहयोगियों की बढ़ सकती है चिंता
पश्चिमी प्रशांत में अमेरिका की सैन्य मौजूदगी जापान, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया और फिलीपींस जैसे सहयोगी देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
विशेषकर जापान और फिलीपींस के आसपास चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों को देखते हुए अमेरिकी कैरियर की अनुपस्थिति पर नजर रखी जाएगी। क्षेत्रीय सहयोगियों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि अमेरिका ईरान युद्ध के कारण अपनी एशिया नीति को कितनी देर तक प्रभावित होने देगा।
हालांकि अमेरिकी अधिकारियों और रणनीतिक विशेषज्ञों के लिए यह एक अस्थायी सैन्य पुनर्संयोजन भी हो सकता है, क्योंकि कैरियर को एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में भेजना अमेरिकी नौसैनिक रणनीति का हिस्सा रहा है।
USS Abraham Lincoln की तैनाती ने बढ़ाई चिंता
USS Abraham Lincoln की लंबी तैनाती पहले से ही चर्चा में रही है। यह एयरक्राफ्ट कैरियर कई महीनों से लगातार समुद्र में है और ईरान युद्ध में अमेरिकी अभियान का अहम हिस्सा रहा है।
रिपोर्टों के मुताबिक जहाज ने बेहद लंबी अवधि तक बिना सामान्य पोर्ट विजिट के अभियान जारी रखा। इससे जहाज पर तैनात सैनिकों की थकान, रहने की परिस्थितियों और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अमेरिकी सांसदों तथा सैन्य विशेषज्ञों ने सवाल उठाए हैं।
राष्ट्रपति ट्रंप ने हालांकि USS Abraham Lincoln की लंबी तैनाती को लेकर उठाई गई आलोचनाओं को खारिज किया है। उन्होंने कहा कि जहाज का मिशन जरूरी था और तैनाती की अवधि को लेकर उठाए जा रहे सवालों को महत्व नहीं दिया।
अमेरिका के सामने दो मोर्चों की चुनौती
मौजूदा स्थिति अमेरिका के सामने एक बड़ी रणनीतिक चुनौती को दिखाती है। एक तरफ ईरान में सैन्य अभियान जारी है, वहीं दूसरी तरफ चीन को रोकने के लिए हिंद-प्रशांत में मजबूत सैन्य मौजूदगी बनाए रखना अमेरिका की प्राथमिकता रही है।
अगर ईरान युद्ध लंबा चलता है तो अमेरिकी नौसेना को अपने सीमित संसाधनों का इस्तेमाल अलग-अलग मोर्चों पर करना पड़ेगा। इससे जहाजों, विमानों और सैनिकों पर परिचालन दबाव बढ़ सकता है।
यही कारण है कि एशिया में अमेरिका के सहयोगी देश ईरान
युद्ध के क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिंतित हैं।
क्या चीन इस मौके का फायदा उठा सकता है?
यह सवाल सबसे ज्यादा चर्चा में है। पश्चिमी प्रशांत में अमेरिकी कैरियर की अस्थायी
अनुपस्थिति चीन के लिए एक रणनीतिक अवसर पैदा कर सकती है, लेकिन
इसका मतलब यह नहीं है कि चीन तत्काल किसी बड़े सैन्य कदम की ओर बढ़ेगा।
अमेरिका के पास जापान और अन्य सहयोगी देशों के साथ मजबूत सैन्य नेटवर्क है।
इसके अलावा पनडुब्बियां, लंबी दूरी के बमवर्षक, लड़ाकू विमान,
मिसाइल सिस्टम और अन्य नौसैनिक जहाज भी अमेरिकी शक्ति का हिस्सा हैं।
इसलिए चीन के लिए तस्वीर केवल एक अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर की मौजूदगी या
अनुपस्थिति से तय नहीं होती। फिर भी कैरियर की गैरमौजूदगी अमेरिका की तत्काल
शक्ति-प्रदर्शन क्षमता को कुछ समय के लिए कम कर सकती है।
ताइवान पर भी नजर
चीन और ताइवान के बीच तनाव के कारण भी अमेरिकी सैन्य गतिविधियों पर पूरी दुनिया की नजर रहती है।
अमेरिका ताइवान की सुरक्षा को लेकर लंबे समय से रणनीतिक नीति अपनाता रहा है,
जबकि चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा मानता है।
ऐसे में अगर अमेरिका का ध्यान लंबे समय तक पश्चिम एशिया पर केंद्रित रहता है तो बीजिंग की
गतिविधियों को लेकर नई रणनीतिक चर्चाएं शुरू हो सकती हैं। हालांकि फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि
अमेरिकी कैरियर के हटने से ताइवान के खिलाफ चीन ने कोई बड़ा सैन्य कदम उठाया है।
ट्रंप की रणनीति पर उठ रहे सवाल
अमेरिकी प्रशासन का ध्यान फिलहाल ईरान और पश्चिमी गोलार्ध से जुड़े मुद्दों पर भी केंद्रित है।
इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने हिंद-प्रशांत को लेकर अमेरिकी रणनीति को महत्वपूर्ण बताया था,
लेकिन ईरान युद्ध ने सैन्य प्राथमिकताओं को बदल दिया है।
विशेषज्ञों के बीच अब यह चर्चा है कि अमेरिका कितने समय तक एक साथ
पश्चिम एशिया और चीन से जुड़े एशियाई मोर्चे पर समान स्तर का सैन्य दबाव बनाए रख सकता है।
एयरक्राफ्ट कैरियर की भूमिका भी बदल रही है
इस घटनाक्रम ने एक और बहस को जन्म दिया है—क्या आधुनिक युद्ध में
बड़े एयरक्राफ्ट कैरियर अभी भी उतने ही प्रभावी हैं?
ड्रोन, हाइपरसोनिक मिसाइलों, लंबी दूरी की एंटी-शिप मिसाइलों और आधुनिक निगरानी प्रणालियों के
बढ़ते इस्तेमाल ने बड़े युद्धपोतों के लिए नए खतरे पैदा किए हैं।
अमेरिकी नौसेना के भीतर भी भविष्य में छोटे और
ज्यादा मोबाइल युद्धपोतों तथा विभिन्न प्रकार की सैन्य क्षमताओं के मिश्रण को लेकर चर्चा होती रही है।
फिर भी वर्तमान समय में एयरक्राफ्ट कैरियर अमेरिका की वैश्विक सैन्य शक्ति का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर इस बात पर है कि USS George Washington पश्चिम एशिया में
कितने समय तक रहेगा और USS Abraham Lincoln की तैनाती कब समाप्त होगी।
यदि ईरान युद्ध लंबा खिंचता है तो अमेरिकी नौसेना को
अपने कैरियर बेड़े को लगातार अलग-अलग मोर्चों के बीच स्थानांतरित करना पड़ सकता है।
दूसरी ओर, चीन की गतिविधियां भी यह तय करेंगी कि अमेरिका को हिंद-प्रशांत में
अपनी कैरियर मौजूदगी कितनी जल्दी फिर से मजबूत करनी होगी।
निष्कर्ष
अमेरिका का पश्चिमी प्रशांत से अपना आखिरी प्रमुख एयरक्राफ्ट कैरियर हटाकर
पश्चिम एशिया भेजना केवल एक सैन्य तैनाती का बदलाव नहीं है। यह दिखाता है कि
ईरान युद्ध ने अमेरिकी नौसेना के संसाधनों पर कितना दबाव बढ़ा दिया है।
चीन के लिए यह निश्चित रूप से एक ऐसी स्थिति है जिस पर वह करीब से नजर रखेगा।
हालांकि अमेरिका ने एशिया से अपनी पूरी सैन्य शक्ति नहीं हटाई है, लेकिन पश्चिमी प्रशांत में कैरियर की
अस्थायी अनुपस्थिति क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस जरूर पैदा कर रही है।
आने वाले दिनों में असली तस्वीर इस बात से साफ होगी कि ईरान युद्ध कितना लंबा चलता है,
अमेरिका अपने नौसैनिक संसाधनों को कैसे संतुलित करता है और चीन
इस रणनीतिक अंतराल के दौरान अपनी गतिविधियों को किस स्तर तक बढ़ाता है।
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