RSS 15 अगस्त के बाद
कानपुर। देश की युवा पीढ़ी यानी Gen Z के बदलते नजरिए, सवालों और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर उसकी सोच को समझने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने व्यापक संवाद की तैयारी शुरू की है। 15 अगस्त के बाद संघ के प्रचारक अलग-अलग क्षेत्रों में युवाओं के बीच जाकर उनसे सीधे बातचीत करेंगे। इस दौरान यह जानने की कोशिश होगी कि युवा केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों, शासन व्यवस्था तथा मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों को किस नजर से देखते हैं और उनके मन में किन मुद्दों को लेकर असहमति या सवाल हैं।
संघ की इस पहल को 2027 में होने वाले कई राज्यों के विधानसभा चुनावों से पहले महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासतौर पर उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में युवा मतदाताओं की सोच चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकती है। संघ का प्रयास युवाओं को केवल अपनी बात बताने तक सीमित रहने के बजाय पहले उनकी बात सुनने और उनके मुद्दों को समझने पर केंद्रित बताया जा रहा है।
युवाओं के सवाल समझने पर जोर
Gen Z सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के दौर में बड़ी हुई पीढ़ी है। यह वर्ग सामाजिक, राजनीतिक और सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी राय तेजी से व्यक्त करता है। ऐसे में संघ अब युवाओं के बीच पहुंचकर यह समझना चाहता है कि उन्हें वर्तमान व्यवस्था में क्या अच्छा लगता है और किन मुद्दों पर असहजता या असहमति है।
प्रांत स्तर पर होने वाले संवाद में युवाओं से सीधे बातचीत की जाएगी। इसमें सरकारों की नीतियों और शासन व्यवस्था से जुड़े सवालों के साथ-साथ युवाओं की अपेक्षाओं को भी समझने की कोशिश होगी। प्राप्त फीडबैक के आधार पर युवा और सामाजिक क्षेत्र में आगे की रणनीति को आकार देने की तैयारी है।
15 अगस्त के बाद शुरू होंगे युवा सम्मेलन
स्वतंत्रता दिवस के बाद संघ की ओर से विभिन्न प्रांतों में युवा सम्मेलन आयोजित किए जाने की तैयारी है। रिपोर्ट के अनुसार कानपुर, काशी, गोरक्ष और अवध प्रांत के अलावा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ और ब्रज प्रांत में भी युवाओं के साथ संवाद कार्यक्रम होंगे।
इन कार्यक्रमों में खास तौर पर Gen Z को संवाद का हिस्सा बनाने पर जोर रहेगा। महत्वपूर्ण बात यह है कि संपर्क केवल उन युवाओं तक सीमित नहीं रहेगा जो पहले से किसी संगठन से जुड़े हैं। सोशल मीडिया पर सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को लेकर सक्रिय रहने वाले स्वतंत्र युवाओं तक भी पहुंच बनाने की कोशिश होगी।
Gen Alpha पर भी दीर्घकालिक नजर
संघ की योजना में केवल Gen Z ही नहीं, बल्कि Gen Alpha को भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह वह पीढ़ी है जो आने वाले वर्षों में सामाजिक विमर्श और सार्वजनिक जीवन में अपनी भूमिका बढ़ाएगी।
इसी वजह से इस आयु वर्ग को भी संघ की विचारधारा और कार्यपद्धति से परिचित कराने तथा भविष्य में संवाद और जुड़ाव की संभावनाएं तैयार करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
इस रणनीति को तत्काल राजनीतिक गतिविधि के बजाय लंबे समय के सामाजिक संपर्क कार्यक्रम के रूप में भी देखा जा सकता है। युवाओं की बदलती सोच को समझना और उनके साथ संवाद की निरंतरता बनाए रखना इस पहल का प्रमुख उद्देश्य बताया जा रहा है।
मोहन भागवत के संवाद के बाद बढ़ी सक्रियता
संघ की युवा पहुंच की योजना के बीच 6 अगस्त को मुंबई में संघ प्रमुख मोहन भागवत का Gen Z और Gen Alpha के युवाओं के साथ संवाद भी महत्वपूर्ण रहा। इस बातचीत में युवाओं की शिकायतों और उनके सवालों को गंभीरता से सुनने की जरूरत पर जोर दिया गया था।
इसके बाद प्रांत स्तर पर युवाओं से सीधे संवाद की तैयारी को और महत्व मिला है। संघ का प्रयास बताया जा रहा है कि युवाओं के साथ संवाद एकतरफा न होकर उनकी चिंताओं और अनुभवों को समझने का माध्यम बने।
हालिया युवा आंदोलनों ने बढ़ाया ध्यान
पिछले कुछ समय में युवाओं से जुड़े कई मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहे हैं। शिक्षा, परीक्षाओं की पारदर्शिता, रोजगार और भविष्य की संभावनाओं जैसे विषयों को लेकर युवाओं के बीच असंतोष और सक्रियता दिखाई दी है।
दिल्ली में हुए युवा प्रदर्शनों ने भी राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों का ध्यान इस वर्ग की ओर खींचा। इसी व्यापक पृष्ठभूमि में Gen Z से सीधे संवाद की पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
युवाओं के बीच सोशल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ी है। वे पारंपरिक राजनीतिक संवाद की तुलना में डिजिटल माध्यमों के जरिए मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने और अपनी बात रखने में अधिक सक्रिय नजर आते हैं।
2027 के चुनावों से पहले अहम पहल
वर्ष 2027 में उत्तर प्रदेश के साथ उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, गुजरात, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में युवा मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रहने की संभावना है।
उत्तर प्रदेश में युवाओं की बड़ी आबादी और सोशल मीडिया की व्यापक पहुंच को देखते हुए युवा मुद्दे राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं। हालांकि संघ सीधे चुनावी राजनीति का दल नहीं है, लेकिन उसका सामाजिक नेटवर्क और विभिन्न क्षेत्रों में संपर्क व्यापक है। ऐसे में युवा वर्ग के साथ होने वाले संवाद से सामाजिक और राजनीतिक विमर्श को समझने में मदद मिल सकती है।
‘पहले सुनो, फिर अपनी बात रखो’ पर जोर
इस पहल की खास बात यह बताई जा रही है कि युवाओं को अपनी विचारधारा समझाने से पहले उनकी बात सुनने की कोशिश की जाएगी। यानी संवाद का केंद्र युवाओं के सवाल और उनकी चिंताएं होंगी।
युवाओं से यह जानने की कोशिश की जाएगी कि मौजूदा शासन व्यवस्था को लेकर उनके अनुभव क्या हैं, सरकारी योजनाओं और नीतियों को वे किस नजर से देखते हैं और भविष्य को लेकर उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं।
यह तरीका युवा वर्ग के साथ संवाद की प्रकृति को अधिक सहभागी बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है।
सोशल मीडिया से बदला युवाओं का संवाद
तकनीक और सोशल मीडिया ने युवाओं के सोचने, प्रतिक्रिया देने और संवाद करने के तौर-तरीकों में बड़ा बदलाव किया है। आज युवा किसी मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया कुछ ही मिनटों में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंचा सकते हैं।
राजनीतिक और सामाजिक संगठनों के सामने चुनौती भी यही है कि वे इस पीढ़ी से केवल पारंपरिक माध्यमों से संवाद न करें, बल्कि उनके डिजिटल व्यवहार और प्राथमिकताओं को भी समझें।
संघ की ओर से युवाओं से सीधे संवाद की तैयारी को
इसी बदलते सामाजिक वातावरण के संदर्भ में देखा जा रहा है।
तीन साल पहले तैयार हुआ था खाका
संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक के हवाले से बताया गया है कि
किशोरों और युवाओं तक पहुंचने के लिए शाखाओं के
माध्यम से पहले से काम होता रहा है। युवा सम्मेलनों की कार्ययोजना करीब तीन साल पहले तैयार की गई थी,
लेकिन बदलते सामाजिक और राजनीतिक माहौल में अब इसका महत्व बढ़ गया है।
इसका अर्थ यह है कि मौजूदा पहल को पूरी तरह अचानक तैयार हुई
योजना के रूप में नहीं देखा जा रहा।
बल्कि पहले से मौजूद युवा संपर्क कार्यक्रम को वर्तमान
परिस्थितियों के अनुरूप अधिक व्यापक बनाने की कोशिश की जा रही है।
युवाओं की नाराजगी को समझने की कोशिश
Gen Z के बीच शिक्षा, रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, डिजिटल स्वतंत्रता और सामाजिक
अवसर जैसे कई विषय चर्चा में रहते हैं। हालिया घटनाक्रमों ने भी यह दिखाया है कि
युवा अपने मुद्दों को लेकर सार्वजनिक तौर पर आवाज उठा सकते हैं।
ऐसे में संघ की कोशिश यह समझने की है कि युवाओं को किन विषयों पर वास्तविक चिंता है और
किन मुद्दों पर उन्हें वर्तमान व्यवस्था से शिकायत महसूस होती है।
हालांकि इस संवाद से मिलने वाले फीडबैक को किस तरह संगठनात्मक या
सामाजिक रणनीति में बदला जाएगा, यह आगे स्पष्ट होगा।
युवा मतदाता बन रहे महत्वपूर्ण शक्ति
भारत में युवा आबादी का आकार बहुत बड़ा है। सोशल मीडिया के
विस्तार ने युवा मतदाताओं को केवल वोट देने वाले वर्ग तक
सीमित नहीं रखा है। वे राजनीतिक बहस, नीतियों और सामाजिक मुद्दों पर सक्रिय राय रखने लगे हैं।
इसी वजह से राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों के लिए युवाओं की सोच को समझना
लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है। Gen Z की प्राथमिकताओं को नजरअंदाज करना आने वाले वर्षों में किसी भी
व्यापक सामाजिक या राजनीतिक रणनीति के लिए चुनौती बन सकता है।
संघ के सामने चुनौती भी बड़ी
युवाओं से संवाद करना आसान नहीं होगा। Gen Z सवाल पूछने,
तर्क मांगने और सीधे जवाब की अपेक्षा रखने वाली
पीढ़ी के रूप में सामने आती है। इसलिए केवल विचारधारा या संगठनात्मक परिचय देना पर्याप्त नहीं होगा।
युवा यह जानना चाहेंगे कि उनकी शिक्षा, रोजगार, भविष्य, तकनीक और सामाजिक
जीवन से जुड़े वास्तविक सवालों पर क्या समाधान संभव हैं।
इसलिए आने वाले युवा सम्मेलन संघ के लिए केवल संपर्क कार्यक्रम नहीं,
बल्कि युवाओं की बदलती सोच को समझने की परीक्षा भी हो सकते हैं।
आगे क्या होगा?
15 अगस्त के बाद होने वाले प्रांत स्तरीय युवा सम्मेलनों पर अब नजर रहेगी। इन कार्यक्रमों में
युवाओं की भागीदारी, उनके सवाल और संवाद के दौरान सामने आने वाले प्रमुख मुद्दे महत्वपूर्ण होंगे।
यदि इन कार्यक्रमों के जरिए बड़ी संख्या में ऐसे युवाओं से संपर्क होता है जो किसी संगठन से
सीधे जुड़े नहीं हैं, तो संघ के युवा संपर्क अभियान को व्यापक आधार मिल सकता है।
वहीं यह भी महत्वपूर्ण होगा कि युवाओं की ओर से उठाए गए
सवालों पर आगे किस तरह की चर्चा और प्रतिक्रिया सामने आती है।
निष्कर्ष
Gen Z के बदलते नजरिए और युवाओं के बीच बढ़ती सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के
बीच संघ ने इस वर्ग के साथ सीधे संवाद की तैयारी तेज कर दी है।
15 अगस्त के बाद कानपुर, काशी, गोरक्ष, अवध, मेरठ और ब्रज सहित विभिन्न प्रांतों में
युवा सम्मेलन आयोजित किए जाने की योजना है। इन कार्यक्रमों में युवाओं के सवाल, शिकायतें और
सरकार की नीतियों को लेकर उनकी राय समझने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब 2027 में
उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं और
युवा मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जा रही है। संघ की रणनीति में Gen Z के साथ-साथ
Gen Alpha को भी दीर्घकालिक रूप से जोड़ने की कोशिश दिखाई दे रही है।
अब सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि युवाओं से होने वाले संवाद में कौन-कौन से मुद्दे सामने आते हैं और
उन मुद्दों पर संघ अपनी सामाजिक एवं युवा रणनीति में किस तरह बदलाव करता है।
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