चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग
छह साल बाद हुआ ऐतिहासिक दौरा
चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का उत्तर कोरिया दौरा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण घटना माना जा रहा है। 2019 के बाद पहली बार शी जिनपिंग प्योंगयांग पहुंचे और उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग-उन ने उनका भव्य स्वागत किया। एयरपोर्ट से लेकर आधिकारिक कार्यक्रमों तक हर जगह किम खुद मौजूद रहे। रेड कार्पेट, सैन्य सम्मान और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि दोनों देशों के रिश्ते अभी भी मजबूत हैं।
भव्य स्वागत के बावजूद उठे सवाल
हालांकि दौरा बेहद गर्मजोशी भरा दिखाई दिया, लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान एक दूसरी बात पर भी गया। इतनी बड़ी यात्रा के बावजूद कोई बड़ा आर्थिक, सैन्य या रणनीतिक समझौता सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया। आमतौर पर ऐसे उच्चस्तरीय दौरों के बाद नई परियोजनाओं या सहयोग योजनाओं की घोषणा की जाती है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। यही वजह है कि विशेषज्ञ इस यात्रा को केवल औपचारिक मित्रता प्रदर्शन से आगे बढ़कर देखने लगे हैं।
रूस से बढ़ती नजदीकी बनी चिंता
हाल के वर्षों में उत्तर कोरिया और रूस के रिश्तों में तेजी से मजबूती आई है। यूक्रेन युद्ध के बाद मॉस्को और प्योंगयांग के बीच सैन्य और आर्थिक सहयोग बढ़ने की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। माना जा रहा है कि चीन इस बढ़ती नजदीकी पर नजर बनाए हुए है। बीजिंग नहीं चाहता कि उसका पारंपरिक सहयोगी उत्तर कोरिया पूरी तरह रूस के प्रभाव क्षेत्र में चला जाए।
शी जिनपिंग का रणनीतिक संदेश
विश्लेषकों का मानना है कि इस दौरे का एक बड़ा उद्देश्य किम जोंग-उन को यह याद दिलाना भी था कि उत्तर कोरिया का सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक और आर्थिक साझेदार अभी भी चीन ही है। उत्तर कोरिया की अर्थव्यवस्था काफी हद तक चीन पर निर्भर है। व्यापार, खाद्य आपूर्ति और ऊर्जा सहयोग के क्षेत्र में चीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
कहां दिखे संभावित मतभेद?
राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार मतभेद खुलकर सामने नहीं आए, लेकिन कुछ संकेत जरूर दिखाई दिए। सबसे पहला संकेत यह रहा कि दोनों नेताओं ने सार्वजनिक मंचों से रिश्तों की मजबूती पर जोर तो दिया, लेकिन भविष्य की किसी बड़ी संयुक्त योजना की घोषणा नहीं की। दूसरा, उत्तर कोरिया ने हाल के महीनों में रूस के साथ अपने संबंधों को जिस स्तर तक बढ़ाया है, उस पर चीन की ओर से स्पष्ट समर्थन नहीं दिखा।
इसके अलावा कई विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर कोरिया अपनी विदेश नीति में अधिक स्वतंत्रता चाहता है, जबकि चीन क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने पर जोर देता है। यही सोच दोनों देशों के बीच कुछ मुद्दों पर अलग-अलग प्राथमिकताओं को दर्शाती है।
अमेरिका और क्षेत्रीय राजनीति का प्रभाव
चीन और उत्तर कोरिया दोनों ही अमेरिका की नीतियों को लेकर चिंतित रहते हैं।
लेकिन दोनों देशों की रणनीति हमेशा एक जैसी नहीं होती। चीन जहां
आर्थिक और कूटनीतिक संतुलन बनाए रखना चाहता है, वहीं उत्तर कोरिया
अक्सर आक्रामक सैन्य बयानबाजी और मिसाइल परीक्षणों के जरिए अपनी शक्ति दिखाने की कोशिश करता है।
यह अंतर भी दोनों देशों के बीच दृष्टिकोण में मौजूद फर्क को दर्शाता है।
दुनिया की नजर इस रिश्ते पर
चीन और उत्तर कोरिया के संबंध केवल द्विपक्षीय मुद्दा नहीं हैं। इनका असर पूरे
पूर्वी एशिया की राजनीति, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय सुरक्षा पर पड़ता है।
यही कारण है कि शी जिनपिंग के इस दौरे को दुनिया भर में बेहद ध्यान से देखा गया।
प्योंगयांग में शी जिनपिंग का भव्य स्वागत जरूर हुआ, लेकिन इस यात्रा ने कई
नए सवाल भी खड़े कर दिए। रूस के साथ उत्तर कोरिया की बढ़ती नजदीकी,
बड़े समझौतों की अनुपस्थिति और दोनों देशों की अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताओं ने
यह संकेत दिया कि रिश्ते मजबूत होने के बावजूद कुछ मुद्दों पर मतभेद मौजूद हो सकते हैं।
हालांकि दोनों देशों ने सार्वजनिक रूप से एकजुटता का संदेश दिया है, लेकिन आने वाले
समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह साझेदारी किस दिशा में आगे बढ़ती है।
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